नई दिल्ली/कोलकाता। भारतीय राजनीति में किसी पार्टी का चुनाव चिह्न सिर्फ एक निशान नहीं होता। यह करोड़ों मतदाताओं के लिए उस राजनीतिक दल की पहचान होता है। यही वजह है कि जब किसी बड़ी पार्टी में टूट होती है तो सबसे बड़ा सवाल सिर्फ यह नहीं होता कि पार्टी किसके हाथ में रहेगी, बल्कि यह भी होता है कि पार्टी का नाम और चुनाव चिह्न किस गुट को मिलेगा।
पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस यानी TMC का मौजूदा विवाद इसी सवाल को लेकर गंभीर हो गया है। ममता बनर्जी और विरोधी गुट के बीच पार्टी के संगठन, नाम और पारंपरिक ‘फूल और घास’ चुनाव चिह्न पर दावा चुनाव आयोग तक पहुंच गया। 17 सितंबर 2026 को निर्वाचन आयोग ने अंतरिम व्यवस्था के तहत दोनों गुटों को ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और उसके आरक्षित चुनाव चिह्न के इस्तेमाल से रोक दिया।
इसके बाद 18 सितंबर को आयोग ने आगामी उपचुनावों के लिए दोनों गुटों को अलग-अलग अस्थायी नाम और चुनाव चिह्न आवंटित किए। ममता बनर्जी के गुट को ‘ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ और ‘फुटबॉल खिलाड़ी’ चुनाव चिह्न मिला, जबकि दूसरे गुट को ‘डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस’ और ‘लिफाफा’ चुनाव चिह्न आवंटित किया गया। यह व्यवस्था अंतिम फैसला आने तक लागू रहेगी।
TMC में विवाद की शुरुआत कैसे हुई?
इस विवाद की जड़ पार्टी के भीतर हुए राजनीतिक और संगठनात्मक मतभेदों में है। 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद तृणमूल कांग्रेस के भीतर विरोधी गुट सामने आया और धीरे-धीरे मामला पार्टी के विधायी दल से बढ़कर संगठन, नेतृत्व और पार्टी की पहचान तक पहुंच गया।
विरोधी गुट ने पार्टी के नेतृत्व और संगठन पर अपना दावा पेश किया, जबकि ममता बनर्जी के नेतृत्व वाला गुट खुद को मूल तृणमूल कांग्रेस बताता रहा। दोनों पक्षों ने अपने दावों के समर्थन में चुनाव आयोग के सामने दस्तावेज और तर्क पेश किए।
सितंबर में आयोग ने दोनों पक्षों को सुनने और अतिरिक्त दस्तावेज लेने के बाद यह माना कि मामला इतना गंभीर है कि पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न को लेकर विस्तृत निर्णय की आवश्यकता है।
17 सितंबर को चुनाव आयोग ने क्या फैसला दिया?
17 सितंबर को चुनाव आयोग ने तत्काल किसी एक गुट को मूल TMC का नाम और ‘फूल-घास’ चुनाव चिह्न देने के बजाय दोनों को आगामी उपचुनावों के लिए अलग पहचान देने का फैसला किया।
आयोग ने दोनों गुटों को निर्देश दिया कि वे नए नाम और उपलब्ध फ्री सिंबल में से विकल्प दें। इसका मकसद चुनाव के दौरान मतदाताओं और उम्मीदवारों के बीच भ्रम की स्थिति रोकना था।
महत्वपूर्ण बात यह है कि यह फैसला अंतिम रूप से यह तय नहीं करता कि असली TMC कौन है।
अब ममता गुट का नाम और चुनाव चिह्न क्या है?
18 सितंबर को आयोग ने ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट को:
- नाम: Mamata All India Trinamool Congress
- चुनाव चिह्न: Football Player यानी फुटबॉल खिलाड़ी
आवंटित किया।
वहीं विरोधी गुट को:
- नाम: Democratic Trinamool Congress
- चुनाव चिह्न: Envelope यानी लिफाफा
दिया गया है।
यह व्यवस्था फिलहाल आगामी उपचुनावों के संदर्भ में है। मूल पार्टी के नाम और ‘फूल-घास’ चिह्न पर अंतिम अधिकार का सवाल अभी अलग प्रक्रिया के तहत तय होना है।
‘फूल और घास’ चुनाव चिह्न इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
तृणमूल कांग्रेस का ‘फूल और घास’ चिह्न पार्टी की पहचान से लंबे समय से जुड़ा रहा है। चुनाव आयोग के रिकॉर्ड में भी AITC के संविधान और पार्टी ध्वज से इस प्रतीक का संबंध दर्ज है।
इसी वजह से दोनों गुटों के लिए इस प्रतीक पर दावा राजनीतिक और संगठनात्मक पहचान से जुड़ा महत्वपूर्ण मुद्दा बन गया है।
चुनाव चिह्न का आवंटन कौन करता है?
भारत में राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों के चुनाव चिह्नों से संबंधित व्यवस्था भारत निर्वाचन आयोग के अधीन है।
इसके लिए Election Symbols (Reservation and Allotment) Order, 1968 महत्वपूर्ण कानूनी ढांचा है। इसी आदेश के तहत मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों के लिए आरक्षित चुनाव चिह्न, फ्री सिंबल और पार्टी के भीतर विभाजन की स्थिति में चुनाव चिह्न से जुड़े विवादों को नियंत्रित किया जाता है।
के आधिकारिक रिकॉर्ड में पार्टी विवाद और विलय से जुड़े कई महत्वपूर्ण आदेश उपलब्ध हैं।
चुनाव चिह्न कितने प्रकार के होते हैं?
सामान्य तौर पर चुनाव चिह्न दो प्रमुख श्रेणियों में समझे जा सकते हैं।
1. आरक्षित चुनाव चिह्न
मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय या राज्य स्तरीय राजनीतिक दलों के लिए आरक्षित चुनाव चिह्न होते हैं। संबंधित नियमों के तहत दूसरे दल उसी आरक्षित चिह्न का इस्तेमाल नहीं कर सकते।
उदाहरण के तौर पर:
- भाजपा – कमल
- कांग्रेस – हाथ
- आम आदमी पार्टी – झाड़ू
- बहुजन समाज पार्टी – हाथी, कुछ क्षेत्रीय अपवादों के साथ
2. फ्री सिंबल
जो चुनाव चिह्न किसी मान्यता प्राप्त दल के लिए आरक्षित नहीं हैं, वे फ्री सिंबल की श्रेणी में आते हैं।
गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल और निर्दलीय उम्मीदवार निर्धारित प्रक्रिया के तहत उपलब्ध फ्री सिंबल में से विकल्प दे सकते हैं।
क्या कोई नई पार्टी अपनी पसंद का चुनाव चिह्न मांग सकती है?
गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल चुनाव आयोग की उपलब्ध सूची में से अपनी पसंद के चुनाव चिह्नों के विकल्प दे सकता है।
कुछ परिस्थितियों में दल नए प्रतीक का प्रस्ताव भी दे सकते हैं, लेकिन किसी प्रतीक को मंजूरी देना आयोग का निर्णय होता है। इसलिए पार्टी द्वारा किसी चिह्न की मांग करने का मतलब यह नहीं है कि वही चिह्न उसे मिलना तय है।
चुनाव चिह्न को ‘फ्रीज’ करने का मतलब क्या है?
जब किसी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल में दो गुट खुद को असली पार्टी बताते हुए उसी नाम और चुनाव चिह्न पर दावा करते हैं, तब चुनाव आयोग विवाद के अंतिम समाधान तक उस नाम या चिह्न के इस्तेमाल को रोक सकता है।
TMC मामले में भी यही अंतरिम व्यवस्था अपनाई गई है।
इसका मतलब यह नहीं है कि चुनाव आयोग ने किसी एक गुट से हमेशा के लिए चुनाव चिह्न छीन लिया है। फिलहाल दोनों गुटों को मूल नाम और चिह्न इस्तेमाल करने से रोका गया है।
चुनाव आयोग कैसे तय करता है कि चुनाव चिह्न किसे मिलेगा?
इसका सबसे महत्वपूर्ण प्रावधान Election Symbols Order, 1968 का पैरा 15 है।
इसके तहत जब किसी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल में प्रतिद्वंद्वी गुट बन जाते हैं और दोनों खुद को वही राजनीतिक दल बताते हैं, तो आयोग उपलब्ध तथ्यों और परिस्थितियों पर विचार कर सकता है।
दोनों पक्षों को सुनने के बाद आयोग यह तय कर सकता है कि:
- कौन-सा गुट मूल मान्यता प्राप्त दल है,
- या परिस्थितियों के आधार पर किसी भी गुट को मूल दल के रूप में मान्यता न दी जाए।
आयोग का ऐसा निर्णय संबंधित गुटों पर बाध्यकारी होता है।
चुनाव आयोग किन बातों को देखता है?
ऐसे विवादों में केवल विधायकों की संख्या देखना ही पूरा परीक्षण नहीं होता। आयोग मामले के उपलब्ध तथ्यों और परिस्थितियों को देखता है। इनमें प्रमुख रूप से शामिल हो सकते हैं:
पार्टी का संविधान
पार्टी के संविधान में नेतृत्व और संगठनात्मक चुनाव की क्या व्यवस्था है?
संगठनात्मक बहुमत
पार्टी के संगठनात्मक ढांचे में किस गुट का समर्थन कितना है?
पार्टी पदाधिकारियों का चुनाव
पदाधिकारी किस प्रक्रिया से चुने गए और उनके चुनाव पार्टी संविधान के अनुरूप हुए या नहीं?
विधायी समर्थन
सांसदों और विधायकों का समर्थन किस गुट के साथ है?
दस्तावेज और रिकॉर्ड
दोनों गुट अपने दावे के समर्थन में कौन-कौन से आधिकारिक दस्तावेज पेश करते हैं?
दोनों पक्षों की सुनवाई
आयोग दोनों पक्षों के प्रतिनिधियों को अपनी बात रखने का अवसर देता है।
सुप्रीम कोर्ट के पुराने निर्णयों में भी चुनाव चिह्न विवाद में आयोग की भूमिका और पैरा 15 की वैधानिकता पर चर्चा की गई है।
सिर्फ विधायकों की संख्या से फैसला क्यों नहीं होता?
चुनाव चिह्न विवादों में विधायी दल का समर्थन महत्वपूर्ण हो सकता है, लेकिन यह अकेला निर्णायक आधार नहीं माना जा सकता।
पार्टी का संगठनात्मक ढांचा, संविधान, पदाधिकारियों की वैधता और अन्य उपलब्ध रिकॉर्ड भी महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
यही कारण है कि किसी विवाद में यह कहना कि “जिसके पास ज्यादा विधायक हैं, उसे ही हमेशा चुनाव चिह्न मिलेगा” नियम की पूरी तस्वीर नहीं बताता।
मूल चुनाव चिह्न नहीं मिलने वाले गुट का क्या होता है?
अगर किसी विवाद के बाद एक गुट को मूल पार्टी का नाम और चिह्न मिलता है, तो दूसरे गुट को अलग राजनीतिक पहचान के साथ आगे बढ़ना पड़ सकता है।
ऐसे गुट को आगे चुनावी प्रदर्शन और पंजीकरण से जुड़े नियमों के तहत अपनी राजनीतिक पहचान स्थापित करनी होती है।
भारत में चुनाव चिह्नों की जरूरत क्यों पड़ी?
आज से कई दशक पहले भारत में साक्षरता का स्तर काफी कम था। ऐसे समय में बड़ी संख्या में मतदाताओं के लिए उम्मीदवार और पार्टी के नाम पढ़ना आसान नहीं था।
इसी पृष्ठभूमि में चुनाव चिह्नों ने मतदाताओं को राजनीतिक दल और उम्मीदवार की पहचान करने में मदद की।
समय के साथ चुनाव चिह्न भारतीय चुनाव व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गए और कई दलों की राजनीतिक पहचान उनके प्रतीक से ही जुड़ गई।
NCP में भी हुआ था नाम और चुनाव चिह्न का विवाद
तृणमूल कांग्रेस का मामला पहली बार नहीं है जब किसी बड़े राजनीतिक दल में टूट के बाद चुनाव चिह्न को लेकर विवाद हुआ हो।
2024 में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी यानी NCP के भीतर शरद पवार और अजित पवार गुट के बीच विवाद चुनाव आयोग तक पहुंचा था।
6 फरवरी 2024 को आयोग ने अजित पवार गुट को NCP के रूप में मान्यता दी और ‘घड़ी’ चुनाव चिह्न उसके पास रखा। शरद पवार गुट को अलग नाम Nationalist Congress Party–Sharadchandra Pawar दिया गया। चुनाव आयोग की वेबसाइट पर इस मामले का अंतिम आदेश उपलब्ध है।
शिवसेना में ‘धनुष-बाण’ की लड़ाई
महाराष्ट्र में शिवसेना का विभाजन भी चुनाव चिह्न विवाद का बड़ा उदाहरण रहा।
एकनाथ शिंदे और उद्धव ठाकरे गुट के बीच पार्टी के नाम और ‘धनुष-बाण’ चुनाव चिह्न पर विवाद हुआ। चुनाव आयोग ने अंतरिम चरण में मूल प्रतीक के इस्तेमाल पर रोक लगाई और दोनों गुटों को अलग-अलग पहचान दी।
बाद में आयोग ने विस्तृत प्रक्रिया के बाद शिंदे गुट को शिवसेना का नाम और ‘धनुष-बाण’ चिह्न आवंटित किया। चुनाव आयोग के रिकॉर्ड में इस मामले का अंतिम आदेश उपलब्ध है।
AIADMK में भी फ्रीज हुआ था चुनाव चिह्न
तमिलनाडु की AIADMK में जयललिता के निधन के बाद पार्टी के भीतर नेतृत्व को लेकर विवाद हुआ।
ओ. पन्नीरसेल्वम और वी.के. शशिकला से जुड़े गुटों के बीच पार्टी और चुनाव चिह्न पर दावा सामने आया। विवाद के दौरान चुनाव आयोग ने मूल चुनाव चिह्न को फ्रीज किया और दोनों पक्षों को अलग-अलग नाम और प्रतीक के साथ चुनावी प्रक्रिया में आगे बढ़ना पड़ा।
बाद में दोनों गुटों का राजनीतिक घटनाक्रम अलग दिशा में गया और अगस्त 2017 में विलय हुआ।
लोक जनशक्ति पार्टी में ‘बंगला’ चिह्न का विवाद
2021 में लोक जनशक्ति पार्टी में चिराग पासवान और पशुपति कुमार पारस गुट के बीच विवाद सामने आया।
दोनों गुटों के दावे के बीच चुनाव आयोग ने पार्टी के ‘बंगला’ चुनाव चिह्न को फ्रीज कर दिया और दोनों पक्षों को उसी प्रतीक के इस्तेमाल से रोक दिया।
यह मामला भी दिखाता है कि पार्टी में टूट होने पर आयोग का पहला उद्देश्य अक्सर चुनावी प्रक्रिया में पहचान को लेकर भ्रम रोकना होता है।
कांग्रेस का 1969 का विभाजन और चुनाव चिह्न
भारत के राजनीतिक इतिहास में कांग्रेस का 1969 का विभाजन सबसे चर्चित उदाहरणों में से एक है।
राष्ट्रपति चुनाव के बाद कांग्रेस के भीतर इंदिरा गांधी और पार्टी के पुराने संगठनात्मक नेतृत्व के बीच टकराव तेज हुआ। अंततः पार्टी दो हिस्सों में बंट गई।
दोनों पक्षों ने कांग्रेस की राजनीतिक पहचान पर दावा किया और चुनाव चिह्न भी विवाद का हिस्सा बना।
बाद के वर्षों में कांग्रेस के विभिन्न गुटों और चुनाव चिह्नों का इतिहास भारतीय चुनाव व्यवस्था में पार्टी विभाजन और प्रतीक की अहमियत का महत्वपूर्ण उदाहरण बना।
CPI का विभाजन भी बना था बड़ा मामला
1964 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में विभाजन हुआ और CPI(M) अस्तित्व में आई।
अलग हुए गुट ने चुनाव आयोग के सामने अपनी राजनीतिक पहचान और समर्थन का दावा पेश किया। इस विवाद ने भी यह दिखाया कि किसी पार्टी में टूट के बाद केवल नेतृत्व ही नहीं, बल्कि संगठनात्मक समर्थन और चुनावी पहचान भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
चुनाव चिह्न विवादों से एक बात साफ होती है
TMC का मौजूदा विवाद भारतीय चुनावी राजनीति में कोई बिल्कुल नई घटना नहीं है। कांग्रेस, CPI, AIADMK, लोक जनशक्ति पार्टी, शिवसेना और NCP जैसे दलों में अलग-अलग समय पर पार्टी की पहचान, संगठन और चुनाव चिह्न को लेकर विवाद सामने आ चुके हैं।
हर मामले के तथ्य अलग होते हैं और चुनाव आयोग का फैसला संबंधित दस्तावेजों, पार्टी संविधान, संगठनात्मक स्थिति, विधायी समर्थन तथा अन्य परिस्थितियों के आधार पर होता है।
TMC के मामले में फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण बात यही है कि 17 सितंबर का मूल नाम और चिह्न फ्रीज करने वाला कदम अंतरिम है और 18 सितंबर को दिए गए नए नाम व प्रतीक भी आगामी उपचुनावों के लिए अंतरिम व्यवस्था का हिस्सा हैं। मूल ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘फूल-घास’ चिह्न पर अंतिम अधिकार का फैसला अभी बाकी है।
TMC का यह विवाद अब सिर्फ दो गुटों की राजनीतिक लड़ाई नहीं
पश्चिम बंगाल की राजनीति में TMC का यह विवाद अब सिर्फ दो गुटों की राजनीतिक लड़ाई नहीं रह गया है। यह मामला इस बात से भी जुड़ गया है कि किसे पार्टी का संगठनात्मक उत्तराधिकारी माना जाएगा और किसे पार्टी की वर्षों पुरानी चुनावी पहचान मिलेगी।
फिलहाल एक तरफ ममता बनर्जी का गुट ‘ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ और फुटबॉल खिलाड़ी के साथ मैदान में है, तो दूसरी तरफ विरोधी गुट ‘डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस’ और लिफाफा चुनाव चिह्न के साथ चुनावी प्रक्रिया में आगे बढ़ रहा है।
आगे की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी चुनाव आयोग का अंतिम निर्णय होगा, जिसमें पैरा 15 के तहत दोनों गुटों के दावों और उपलब्ध रिकॉर्ड पर विस्तृत विचार किया जाएगा।
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Written & Edit by : Chandan Patel

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