बच्चों के यौन उत्पीड़न से जुड़े मामलों में समय पर कार्रवाई सुनिश्चित करने के उद्देश्य से सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया है कि पॉक्सो (POCSO) अधिनियम के तहत होने वाले अपराध की जानकारी होने के बावजूद उसे छिपाना या पुलिस को सूचना न देना भी कानून के तहत दंडनीय अपराध है। अदालत ने कहा कि बच्चों की सुरक्षा समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है और ऐसे मामलों में चुप्पी अपराधियों को संरक्षण देने के समान है।
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष आए एक मामले की सुनवाई के दौरान अदालत (जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस के. वी. विश्वनाथन की बेंच) ने पॉक्सो अधिनियम की उन धाराओं का उल्लेख किया, जिनमें किसी व्यक्ति को बाल यौन अपराध की जानकारी मिलने पर संबंधित अधिकारियों को इसकी सूचना देना अनिवार्य किया गया है। न्यायालय ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर ऐसी जानकारी छिपाता है या शिकायत दर्ज कराने से बचता है, तो उसके खिलाफ भी कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।

सुप्रीम कोर्ट : जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस के. वी. विश्वनाथन की बेंच ने कहा कि अगर
बच्चों के खिलाफ यौन अपराध अत्यंत गंभीर प्रकृति के होते हैं।
ऐसे मामलों में हर नागरिक की नैतिक और कानूनी जिम्मेदारी है कि वह तुरंत पुलिस या संबंधित प्राधिकरण को सूचना दे।
सूचना छिपाने से पीड़ित बच्चे को न्याय मिलने में देरी होती है और आरोपी को बच निकलने का अवसर मिल सकता है।
कानून का उद्देश्य केवल अपराधी को सजा देना ही नहीं, बल्कि बच्चों को सुरक्षित वातावरण उपलब्ध कराना भी है।

प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंसेज (POCSO) अधिनियम, 2012 के तहत 18 वर्ष से कम आयु के बच्चों के साथ होने वाले सभी प्रकार के यौन अपराधों के लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं।
इस कानून के अनुसार:
किसी भी व्यक्ति को यदि बाल यौन शोषण की जानकारी मिलती है, तो उसे तत्काल पुलिस या विशेष किशोर पुलिस इकाई को सूचित करना चाहिए।
सूचना न देना या जानबूझकर छिपाना भी अपराध माना जा सकता है।
दोषी पाए जाने पर कानून के अनुसार दंड का प्रावधान है।
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विशेषज्ञों के अनुसार स्कूल, कॉलेज, अस्पताल, बाल संरक्षण संस्थान, आश्रय गृह, खेल अकादमियां और बच्चों के साथ काम करने वाले सभी संस्थानों के कर्मचारियों पर विशेष जिम्मेदारी होती है कि वे किसी भी संदिग्ध घटना की तुरंत सूचना दें।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने संदेश में स्पष्ट किया कि बच्चों के अधिकारों और सुरक्षा से कोई समझौता नहीं किया जा सकता। यदि किसी संस्था या व्यक्ति के पास अपराध की जानकारी है, तो उसे छिपाने के बजाय कानून के अनुसार संबंधित एजेंसियों को सूचित करना चाहिए।
विशेषज्ञों का मानना है कि अदालत की यह टिप्पणी समाज में जागरूकता बढ़ाने और बाल यौन अपराधों की रिपोर्टिंग को प्रोत्साहित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। इससे यह संदेश जाता है कि केवल अपराध करने वाला ही नहीं, बल्कि अपराध की जानकारी छिपाने वाला भी कानूनी जांच के दायरे में आ सकता है।
निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट का यह स्पष्ट संदेश है कि बच्चों के खिलाफ होने वाले यौन अपराधों पर किसी भी प्रकार की चुप्पी या लापरवाही स्वीकार नहीं की जाएगी। पॉक्सो अधिनियम के तहत अपराध की जानकारी होने पर उसे संबंधित अधिकारियों तक पहुंचाना प्रत्येक नागरिक का कानूनी दायित्व है। समय पर सूचना देने से न केवल आरोपी के खिलाफ शीघ्र कार्रवाई संभव होती है, बल्कि पीड़ित बच्चे को भी जल्द न्याय और सुरक्षा मिलती है।
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