भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहलाता है। यहाँ सत्ता जनता की होती है और विपक्ष जनता की आवाज़। लेकिन आज हालात ऐसे बनते जा रहे हैं कि सवाल पूछने वालों को ही कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है। क्या यही वह लोकतंत्र था, जिसकी कल्पना हमारे संविधान निर्माताओं ने की थी?
आज देश का आम नागरिक यह पूछ रहा है — क्या सत्ता का घमंड इतना बढ़ गया है कि अब असहमति भी अपराध बनती जा रही है?
किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में विपक्ष की भूमिका बेहद अहम होती है। सरकार की नीतियों पर सवाल उठाना, गलत फैसलों का विरोध करना और जनता की समस्याओं को संसद तक पहुँचाना — यही विपक्ष का मूल कर्तव्य है।
लेकिन बीते कुछ वर्षों में तस्वीर बदलती नज़र आ रही है। विपक्षी नेताओं पर लगातार छापे, जांच एजेंसियों की कार्रवाई, संसद में बोलने से रोका जाना और कई बार निलंबन — ये सब आम बात सी बनती जा रही है। चाहे बात नेता विपक्ष लोकसभा राहुल गांधी की संसद सदस्यता रद्द होने की हो या फिर लगातार आलोचनाओं का सामना कर रही नरेंद्र मोदी सरकार — सवाल हर तरफ उठ रहे हैं।
हाल के दिनों में सत्ता पक्ष के सांसद कुछ भी गलत बयानबाजी गलत शब्दों का प्रयोग और पूर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू, इंद्रा गांधी और राजीव गांधी के बारे में गलत बयान बाजी ओर उनके कद को कम आंकना ओर उनके चरित्र पर बिना तथ्यों के कुछ भी बोलना। ये सत्ता पक्ष के सांसद आए दिन संसद में बोलते और लोक सभा स्पीकर देख कर के मुस्कराते है और उनको बोलने से रोका भी नहीं जाता। अब सवाल ये है कि सत्ता पक्ष के अंतर आत्मा मर चुकी है ये उनके लिए किसी का चरित्र हनन करने में मजा आता है या संस्कार भूल गए, सत्ता के नशे में चूर सांसद और नेता ये भूल गए है कि पंडित नेहरू ने भारत को आधुनिक भारत और शिक्षा, स्वास्थ्य बड़े बड़े संस्थानों को खोलने में ध्यान दिया वो भी जब जब भारत बटवारे और गुलामी की की जंजीर से आजाद हुआ था और हम उनको कोसते है ।
आज प्रवर्तन निदेशालय (ED) और केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) जैसी संस्थाओं की कार्रवाई अक्सर विपक्षी नेताओं तक ही सीमित क्यों दिखाई देती है?
क्या यह सिर्फ संयोग है, या फिर सत्ता के इशारे पर चल रही व्यवस्था?
जब भी कोई बड़ा आंदोलन होता है या सरकार के खिलाफ आवाज़ उठती है, तुरंत किसी न किसी नेता पर केस दर्ज हो जाता है। इससे आम जनता के मन में यह धारणा बन रही है कि कानून का इस्तेमाल न्याय के लिए नहीं, डर पैदा करने के लिए किया जा रहा है।
एक दौर था जब मीडिया सत्ता से सवाल करता था। आज हालत यह है कि बड़े मीडिया हाउस सरकार की उपलब्धियाँ गिनाने में व्यस्त रहते हैं, जबकि विपक्ष की हर बात को शक की नज़र से दिखाया जाता है।
ग्राउंड रिपोर्टिंग कम होती जा रही है, स्टूडियो डिबेट ज़्यादा। बेरोज़गारी, महंगाई, किसानों की हालत जैसे मुद्दे हाशिये पर चले गए हैं।
नतीजा यह है कि आम आदमी खुद को अकेला महसूस करने लगा है।
जब संसद में आवाज़ दबाई जाए, सड़कों पर प्रदर्शन करने वालों को जेल भेजा जाए और सोशल मीडिया पर लिखने वालों पर मुकदमे दर्ज हों — तब यह सवाल उठना लाज़मी है कि हमारा लोकतंत्र किस दिशा में जा रहा है।
ज़रूरत पड़ने पर सुप्रीम कोर्ट ने कई बार नागरिक अधिकारों की रक्षा की है, लेकिन क्या सिर्फ अदालतों के भरोसे लोकतंत्र बच पाएगा?
लोकतंत्र तभी मजबूत रहेगा जब सत्ता जवाबदेह होगी और विपक्ष बेखौफ होकर सवाल कर पाएगा।

आज देश को ताली बजाने वाली भीड़ नहीं, सवाल पूछने वाले नागरिक चाहिए।
सत्ता पक्ष हो या विपक्ष — दोनों को यह समझना होगा कि लोकतंत्र किसी एक पार्टी की जागीर नहीं है। यह करोड़ों भारतीयों की उम्मीदों और सपनों से जुड़ा है।
अगर आज विपक्ष की आवाज़ दबाई जाएगी, तो कल आम आदमी की बारी आएगी।
यह वक्त आत्ममंथन का है। सत्ता के घमंड से नहीं, संवाद से देश चलता है। विरोध से नहीं डरना चाहिए, बल्कि उसे लोकतंत्र की ताकत समझना चाहिए।
वरना इतिहास गवाह है — जब-जब आवाज़ें दबाई गईं, तब-तब व्यवस्था हिली है।
सवाल सिर्फ इतना है: क्या हम समय रहते समझेंगे, या बहुत देर हो जाएगी?

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