महिला आरक्षण बिल गिरने के बाद नई बहस: महिला आरक्षण से जुड़ा 131वां संविधान संशोधन विधेयक लोकसभा में पारित नहीं हो सका। केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार इस विधेयक को पास कराने के लिए आवश्यक दो-तिहाई बहुमत जुटाने में असफल रही। इसके बाद देशभर में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी और अधिकारों को लेकर बहस तेज हो गई है।
आर्थिक सूचकांकों के आधार पर बिहार को देश के पिछड़े राज्यों में गिना जाता है, लेकिन महिलाओं को अधिकार देने और उन्हें सशक्त बनाने के मामले में यह राज्य एक मिसाल बनकर उभरा है। बिहार ने कई ऐसे कदम उठाए हैं, जो महिलाओं को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से मजबूत बनाते हैं।
महिला सशक्तिकरण की चर्चा बिहार में कर्पूरी ठाकुर के बिना अधूरी है। उन्होंने अपने कार्यकाल में आरक्षण का वर्गीकरण करते हुए महिलाओं के लिए अलग से 3 प्रतिशत आरक्षण लागू किया। साथ ही, लड़कियों की शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए स्कूल फीस माफ करने का ऐतिहासिक निर्णय लिया।
बिहार देश का पहला राज्य बना, जहां महिलाओं को ‘पीरियड लीव’ (मासिक धर्म अवकाश) की सुविधा दी गई। इसका श्रेय लालू प्रसाद यादव को जाता है। 1990 से महिला सरकारी कर्मचारियों को हर महीने दो दिन की विशेष आकस्मिक छुट्टी दी जाती है, जो सामान्य अवकाश से अलग होती है।
साल 2006 में नीतीश कुमार ने पंचायत और नगर निकाय चुनावों में महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण देने का ऐतिहासिक फैसला लिया। इसका परिणाम यह हुआ कि लाखों महिलाएं मुखिया, सरपंच और पार्षद के पद तक पहुंचीं, जिससे जमीनी स्तर पर नेतृत्व में महिलाओं की भागीदारी बढ़ी।
इसी वर्ष ‘मुख्यमंत्री बालिका साइकिल योजना’ की शुरुआत की गई, जिसने लड़कियों की शिक्षा को नई दिशा दी। इस योजना के तहत छात्राओं को साइकिल खरीदने के लिए आर्थिक सहायता दी जाती है, जिससे स्कूल छोड़ने की दर में कमी आई और शिक्षा का स्तर बेहतर हुआ।
बिहार सरकार ने 2016 में सरकारी नौकरियों में महिलाओं के लिए 35 प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण लागू किया। इसके अलावा, शिक्षक नियोजन में भी 50 प्रतिशत आरक्षण दिया गया, जिससे बड़ी संख्या में महिलाओं को रोजगार मिला।
पुलिस बल में भी महिलाओं के लिए करीब 35 प्रतिशत आरक्षण लागू करने की दिशा में काम हुआ है। इसका परिणाम है कि बिहार पुलिस में महिला कर्मियों की संख्या देश में सबसे अधिक है। साथ ही, इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेजों में छात्राओं के लिए 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित की गई हैं।
साल 2016 में लागू शराबबंदी कानून महिलाओं की मांग पर आधारित एक बड़ा फैसला था। इस निर्णय के बाद घरेलू हिंसा में कमी और परिवारों की आर्थिक स्थिति में सुधार देखने को मिला। कई सर्वे रिपोर्ट्स में इसके सकारात्मक प्रभाव सामने आए हैं।
बिहार सरकार की ‘जीविका’ योजना महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण का बड़ा माध्यम बनी है। स्वयं सहायता समूहों (SHGs) के जरिए करीब 1.3 करोड़ महिलाएं इससे जुड़ी हैं और छोटे-छोटे व्यवसाय कर आत्मनिर्भर बन रही हैं।

हाल के वर्षों में ‘मुख्यमंत्री महिला उद्यमी योजना’ और ‘मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना’ शुरू की गई हैं। इन योजनाओं के तहत महिलाओं को व्यवसाय शुरू करने के लिए 10 लाख रुपये तक की सहायता (अनुदान + ब्याज मुक्त ऋण) दी जा रही है, जिससे वे स्वरोजगार की ओर बढ़ रही हैं।
इन सभी पहलों ने बिहार की महिलाओं को घर की चारदीवारी से निकालकर समाज और शासन के केंद्र में ला खड़ा किया है। आज महिलाएं न सिर्फ परिवार बल्कि प्रशासन और राजनीति में भी सक्रिय भूमिका निभा रही हैं।
भारत की संविधान सभा में 15 महिला सदस्य थीं, जिन्होंने देश के संविधान निर्माण में अहम योगदान दिया। इसके बाद से संसद और राजनीति में महिलाओं की भागीदारी लगातार बढ़ी है, लेकिन अभी भी संतुलन की जरूरत महसूस की जाती है।
महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में बिहार ने कई ऐसे कदम उठाए हैं, जो अन्य राज्यों के लिए प्रेरणा बन सकते हैं। आर्थिक रूप से चुनौतियों का सामना करने के बावजूद, महिलाओं के उत्थान में राज्य की यह प्रगति इसे एक ‘फ्रंट रनर’ के रूप में स्थापित करती है।

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