जमुई। बिहार में दलितों के वर्गीकरण और महादलित श्रेणी को लेकर सियासी बहस एक बार फिर तेज हो गई है। जमुई पहुंचे लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के सांसद अरुण भारती ने पूर्व मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी पर तीखा राजनीतिक हमला बोला है। सांसद ने कहा कि उन्होंने मांझी से एक गंभीर नीतिगत सवाल पूछा था, लेकिन उसका जवाब तथ्यों और नीति के आधार पर देने के बजाय उनके परिवार और व्यक्तिगत स्तर पर टिप्पणी की जा रही है।
गुरुवार को जमुई परिसदन में पत्रकारों से बातचीत के दौरान अरुण भारती ने कहा कि उनका सवाल आज भी कायम है और इसका जवाब राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि आधिकारिक आंकड़ों और नीतिगत तथ्यों के आधार पर मिलना चाहिए।
2007 में दलित और महादलित की अलग-अलग श्रेणी बनाने का मुद्दा
सांसद अरुण भारती ने बिहार में वर्ष 2007 में हुए दलित वर्गीकरण का जिक्र करते हुए कहा कि उस समय दलित समुदायों को अलग-अलग श्रेणियों में बांटकर ‘दलित’ और ‘महादलित’ के रूप में वर्गीकृत किया गया था।
उन्होंने कहा कि उस समय जीतन राम मांझी बिहार सरकार में एससी-एसटी कल्याण मंत्री थे और बाद में मुख्यमंत्री भी बने। सांसद ने इसी राजनीतिक और प्रशासनिक पृष्ठभूमि के आधार पर महादलित वर्गीकरण की नीति के आधार और उसके प्रभाव को लेकर सवाल उठाया।
अरुण भारती का कहना है कि यदि उस समय किसी सामाजिक-आर्थिक या वैज्ञानिक मूल्यांकन के आधार पर जातियों को अलग-अलग श्रेणियों में रखा गया था, तो सरकार के पास उस मूल्यांकन और बाद की समीक्षा का आधिकारिक रिकॉर्ड होना चाहिए।
‘महादलित श्रेणी से कितना लाभ मिला’, सांसद अरुण भारती ने मांगा जवाब
सांसद ने सवाल उठाया कि जिन जातियों को उस समय महादलित श्रेणी में शामिल किया गया था, उन्हें इस विशेष श्रेणी के माध्यम से पिछले वर्षों में वास्तव में कितना लाभ मिला।
उन्होंने पूछा कि क्या सरकार ने इस नीति के प्रभाव का कोई आधिकारिक मूल्यांकन या समीक्षा रिपोर्ट तैयार की है? यदि ऐसी रिपोर्ट उपलब्ध है तो उसे सार्वजनिक किया जाना चाहिए, ताकि यह पता चल सके कि महादलित वर्गीकरण से शिक्षा, रोजगार, आवास, छात्रवृत्ति और अन्य सरकारी योजनाओं में संबंधित समुदायों को कितना वास्तविक लाभ मिला।
पासी, पासवान, रविदास और रजक को बाहर रखने के आधार पर सवाल
अरुण भारती ने विशेष रूप से पासी, पासवान, रविदास और रजक जातियों का मुद्दा उठाया। उन्होंने सवाल किया कि यदि इन समुदायों को किसी समय महादलित श्रेणी से बाहर रखा गया था, तो इसका आधार क्या था?
सांसद ने पूछा कि क्या इन जातियों को बाहर रखने के पीछे कोई सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण, सरकारी अध्ययन या वैज्ञानिक रिपोर्ट थी? यदि ऐसा कोई अध्ययन हुआ था तो उसके निष्कर्ष क्या थे और उसे किस आधार पर नीति में लागू किया गया?
उनके मुताबिक, इस सवाल का जवाब राजनीतिक बयानबाजी से नहीं बल्कि दस्तावेजों और सरकारी रिकॉर्ड के आधार पर दिया जाना चाहिए।
‘अगर आज का फैसला सही है तो 2007 का फैसला क्या गलत था?’
सांसद अरुण भारती ने महादलित श्रेणी में बाद में किए गए बदलाव को लेकर सबसे बड़ा सवाल यही उठाया कि अगर वर्तमान में इन जातियों को महादलित श्रेणी में शामिल करने का निर्णय सही है, तो फिर वर्ष 2007 में इन्हें अलग रखने का फैसला किस आधार पर लिया गया था?
उन्होंने सवाल किया कि नीतिगत बदलाव के कारण पहले की अवधि में जिन लोगों को विशेष योजनाओं और सुविधाओं का लाभ नहीं मिल पाया, उसके प्रभाव का आकलन किस स्तर पर किया गया।
सांसद ने कहा कि यह सिर्फ राजनीतिक विवाद का विषय नहीं है, बल्कि नीति निर्माण, सामाजिक न्याय और सरकारी योजनाओं के समान लाभ से जुड़ा सवाल है।
जीतन राम मांझी के बेटे का भी किया जिक्र
अरुण भारती ने कहा कि जीतन राम मांझी के पुत्र संतोष कुमार सुमन भी लंबे समय तक संबंधित महत्वपूर्ण विभाग से जुड़े रहे हैं। ऐसे में उन्होंने सवाल किया कि सरकार के पास महादलित वर्गीकरण की नीति के प्रभाव को लेकर कोई विस्तृत समीक्षा रिपोर्ट है या नहीं।
सांसद ने कहा कि यदि रिपोर्ट मौजूद है तो उसे सार्वजनिक किया जाना चाहिए, ताकि जनता यह समझ सके कि वर्षों पहले बनाई गई नीति का जमीन पर क्या असर पड़ा।
प्रेस वार्ता के बाद कार्यकर्ताओं ने लगाए नारे
प्रेस वार्ता समाप्त होने के बाद जमुई परिसदन परिसर में राजनीतिक माहौल उस समय गरमा गया, जब लोजपा (रामविलास) के कुछ कार्यकर्ताओं ने जीतन राम मांझी के खिलाफ नारेबाजी शुरू कर दी।
सांसद अरुण भारती की मौजूदगी में कार्यकर्ताओं ने ‘जीतन राम मांझी मुर्दाबाद’ के नारे लगाए। इससे कुछ देर के लिए मौके पर राजनीतिक गहमागहमी का माहौल बन गया।
कार्यकर्ताओं ने हालिया बयानों को लेकर नाराजगी जताई और कहा कि दलित समाज तथा पार्टी से जुड़े संवेदनशील मुद्दों पर दिए जा रहे बयानों से उनमें असंतोष है।
हालांकि, नारेबाजी के दौरान किसी अप्रिय घटना या टकराव की सूचना नहीं है और स्थिति शांतिपूर्ण रही।
महादलित वर्गीकरण पर फिर गरमाई बिहार की राजनीति
जमुई में सांसद अरुण भारती के बयान और कार्यकर्ताओं की नारेबाजी के बाद दलित-महादलित वर्गीकरण का मुद्दा एक बार फिर बिहार की राजनीति के केंद्र में आता दिख रहा है।
अरुण भारती ने साफ किया कि उनका सवाल व्यक्तिगत नहीं बल्कि नीतिगत है। अब देखना यह होगा कि जीतन राम मांझी या सरकार की ओर से इन सवालों का जवाब किस तरह दिया जाता है और क्या वर्ष 2007 के वर्गीकरण तथा बाद में हुए बदलाव को लेकर कोई आधिकारिक समीक्षा या दस्तावेज सामने आता है।
नोट: खबर में सांसद अरुण भारती द्वारा लगाए गए आरोपों और उठाए गए सवालों को उनके बयान के रूप में प्रस्तुत किया गया है। संबंधित पक्ष का जवाब/प्रतिक्रिया मिलने पर उसे भी खबर में शामिल किया जाना चाहिए।
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Written & Edit by : Chandan Patel

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