गणेश चतुर्थी 2026: ढोल-नगाड़े, गणपति बप्पा मोरया के जयकारे, सजते पंडाल, घरों में विराजते गणेश जी और फिर विसर्जन का भावुक दृश्य… गणेश चतुर्थी आते ही पूरा माहौल भक्तिमय हो जाता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर गणेश चतुर्थी की शुरुआत कब हुई? भगवान गणेश की पूजा इस दिन ही क्यों की जाती है? और घरों में मनाया जाने वाला यह त्योहार आगे चलकर इतना बड़ा सार्वजनिक उत्सव कैसे बन गया?
इन सवालों के पीछे धार्मिक मान्यताओं के साथ-साथ इतिहास का भी एक दिलचस्प और कम चर्चित अध्याय छिपा है।
2026 में कब मनाई जाएगी गणेश चतुर्थी?
साल 2026 में गणेश चतुर्थी 14 सितंबर, सोमवार यानी आज मनाई जाएगी। यह पर्व भाद्रपद महीने के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है। इसी दिन भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित कर पूजा-अर्चना शुरू की जाती है। कई जगह यह उत्सव डेढ़ दिन, 5, 7, 10 या 11 दिनों तक चलता है और फिर गणेश विसर्जन के साथ इसका समापन होता है।
गणेश चतुर्थी की शुरुआत कब हुई?
इस सवाल का सीधा जवाब देना आसान नहीं है। गणेश चतुर्थी की धार्मिक परंपरा बहुत पुरानी है, लेकिन इतिहास में यह निश्चित रूप से बताना मुश्किल है कि पहली बार यह पर्व किस साल मनाया गया था।
इतिहास और धार्मिक परंपराओं में गणेश पूजा के प्रमाण बहुत पुराने समय से मिलते हैं। समय के साथ गणेश जी की पूजा और उनकी प्रतिमा का स्वरूप भी बदलता गया। इतिहासकारों के अनुसार गणेश की मूर्तियों में हाथों की संख्या, मोदक, मूषक और दूसरे प्रतीकों का विकास अलग-अलग कालखंडों में हुआ।
यानी आज जिस रूप में हम गणेश चतुर्थी देखते हैं, वह एक दिन में नहीं बना, बल्कि सदियों की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं से धीरे-धीरे विकसित हुआ।
भगवान गणेश को सबसे पहले क्यों पूजा जाता है?
गणेश जी को हिंदू परंपरा में विघ्नहर्ता और सिद्धिदाता माना जाता है। यानी ऐसी मान्यता है कि किसी शुभ काम की शुरुआत से पहले गणेश जी की पूजा करने से रास्ते में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं।
इसके पीछे एक लोकप्रिय पौराणिक कथा भी है।
कहा जाता है कि एक बार देवताओं के बीच यह सवाल उठा कि सबसे पहले पूजा किसकी होनी चाहिए। सभी देवताओं को अपनी श्रेष्ठता साबित करनी थी। शर्त रखी गई कि जो पूरी दुनिया का चक्कर सबसे पहले लगाकर वापस आएगा, वही सबसे पहले पूजनीय होगा।
दूसरे देवता अपने-अपने वाहनों पर निकल पड़े, लेकिन गणेश जी ने अपने माता-पिता भगवान शिव और माता पार्वती की तीन परिक्रमा की और कहा कि मेरे लिए माता-पिता ही पूरी दुनिया हैं।
उनकी बुद्धिमानी से प्रसन्न होकर उन्हें अग्रपूजा का वरदान मिला। इसी वजह से आज भी शुभ काम की शुरुआत गणेश पूजा से करने की परंपरा है।
गणेश जी के जन्म की कहानी भी है बेहद रोचक
गणेश जी के जन्म को लेकर सबसे प्रसिद्ध पौराणिक कथा माता पार्वती से जुड़ी है।
कथा के अनुसार, एक बार माता पार्वती ने अपने शरीर के उबटन से एक बालक की रचना की और उसे अपना द्वारपाल बना दिया। उन्होंने गणेश को आदेश दिया कि जब तक वह स्नान कर रही हैं, किसी को अंदर नहीं आने देना।
उसी समय भगवान शिव वहां पहुंचे। गणेश ने उन्हें अंदर जाने से रोक दिया। इससे विवाद बढ़ गया और भगवान शिव ने क्रोध में गणेश का सिर काट दिया।
माता पार्वती को जब इसकी जानकारी हुई तो वे बेहद क्रोधित हो गईं। इसके बाद भगवान शिव ने गणेश को हाथी का सिर लगाकर फिर से जीवन प्रदान किया।
इसी कथा से गणेश जी के गजानन स्वरूप की धार्मिक मान्यता जुड़ी हुई है।
लेकिन असली ‘अनकहा किस्सा’ यहां से शुरू होता है
गणेश चतुर्थी का सबसे दिलचस्प इतिहास सिर्फ पौराणिक कथाओं में नहीं, बल्कि आधुनिक भारत के इतिहास में भी छिपा है।
आज जिस बड़े सार्वजनिक गणेशोत्सव को हम देखते हैं, उसका विस्तार महाराष्ट्र में हुआ। पुणे में सार्वजनिक स्तर पर गणेश उत्सव की शुरुआत को लेकर इतिहासकारों के बीच 1892 और 1893 को लेकर अलग-अलग मत मिलते हैं।
पुणे के समाजसेवी और स्वतंत्रता सेनानी भाऊसाहेब रंगारी से 1892 में सार्वजनिक गणेश उत्सव शुरू करने का श्रेय जोड़ा जाता है। वहीं लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने अगले दौर में इसे बड़े पैमाने पर संगठित और लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
लोकमान्य तिलक ने गणेश उत्सव को क्यों बनाया सार्वजनिक?
यह कहानी भारत की आजादी की लड़ाई से जुड़ती है।
ब्रिटिश शासन के दौरान भारतीयों के बड़े सार्वजनिक जमावड़ों और राजनीतिक गतिविधियों पर कई तरह की पाबंदियां थीं। ऐसे समय में लोकमान्य तिलक ने गणेश उत्सव को सिर्फ धार्मिक आयोजन न रहने देकर सामाजिक एकता और जनजागरण का माध्यम बनाया।
1893 के आसपास तिलक ने गणेश उत्सव को बड़े सार्वजनिक आयोजन का रूप देने में अहम भूमिका निभाई। पूजा के साथ-साथ लोगों के लिए भाषण, नाटक, गीत, सांस्कृतिक कार्यक्रम और सामाजिक चर्चा होने लगी।
यानी एक तरह से गणेश पंडाल उस समय सिर्फ पूजा की जगह नहीं था, बल्कि लोगों को एक साथ जोड़ने वाला मंच भी बन गया।
गणेश उत्सव ने लोगों को कैसे जोड़ा?
उस दौर में समाज जाति और वर्ग के आधार पर काफी बंटा हुआ था। सार्वजनिक गणेश उत्सव ने अलग-अलग समुदायों के लोगों को एक जगह आने का मौका दिया।
गली-मोहल्लों में एक साथ चंदा जमा होता था, पंडाल बनता था, पूजा होती थी और फिर सामूहिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते थे।
इस तरह गणेश उत्सव धीरे-धीरे घर की पूजा से मोहल्ले की पूजा और फिर समाज के बड़े उत्सव में बदल गया।
यही वजह है कि गणेशोत्सव का इतिहास केवल धर्म का इतिहास नहीं है, बल्कि भारतीय समाज में सामूहिकता और सांस्कृतिक एकता के विकास की कहानी भी है।
गणेश जी को मोदक और दूर्वा क्यों चढ़ाई जाती है?
गणेश पूजा में मोदक का विशेष महत्व माना जाता है। मोदक को ज्ञान और आनंद से जोड़कर देखा जाता है।
इसी तरह गणेश जी को दूर्वा चढ़ाने की परंपरा भी बहुत पुरानी है। धार्मिक मान्यताओं में 21 दूर्वा अर्पित करने का विशेष महत्व बताया गया है। इसके पीछे अलग-अलग पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं।गणेशजी का वाहन मूषक ही क्यों?
गणेश जी के साथ दिखाई देने वाला छोटा सा मूषक भी अपने आप में एक दिलचस्प कहानी रखता है।
पौराणिक कथाओं में मूषक को गणेश जी का वाहन बताया गया है। इसका एक अर्थ यह भी निकाला जाता है कि गणेश जी बड़े से बड़े और छोटे से छोटे सभी जीवों के स्वामी हैं।
यानी विशाल शरीर वाले गणेश जी का छोटा सा मूषक पर बैठना अपने आप में अहंकार छोड़कर विनम्रता अपनाने का संदेश माना जाता है।
विसर्जन क्यों किया जाता है?
गणेश उत्सव के अंतिम दिन गणेश प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है। इसके पीछे धार्मिक रूप से यह भाव माना जाता है कि भगवान गणेश अपने धाम लौटते हैं और भक्तों के दुख-दर्द तथा बाधाएं अपने साथ ले जाते हैं।
मिट्टी की प्रतिमा का पानी में मिल जाना एक बड़ा संदेश भी देता है – जो आया है, उसे एक दिन वापस प्रकृति में मिल जाना है।
इसीलिए आज गणेश उत्सव में पर्यावरण के प्रति जागरूकता पर भी जोर दिया जा रहा है। प्राकृतिक मिट्टी से बनी प्रतिमाओं और पर्यावरण-अनुकूल विसर्जन को बढ़ावा दिया जाता है।
आज का गणेश उत्सव सिर्फ महाराष्ट्र तक सीमित नहीं
कभी महाराष्ट्र के कुछ इलाकों में बड़े स्तर पर मनाया जाने वाला गणेशोत्सव आज देश के अलग-अलग हिस्सों में पहुंच चुका है।
महाराष्ट्र के अलावा गुजरात, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, गोवा, आंध्र प्रदेश समेत कई राज्यों में गणेश चतुर्थी बड़े उत्साह से मनाई जाती है। अब उत्तर भारत के शहरों और कस्बों में भी बड़े गणेश पंडाल और सार्वजनिक आयोजन देखने को मिलते हैं।
गणेश चतुर्थी हमें क्या सिखाती है?
गणेश चतुर्थी सिर्फ भगवान गणेश की पूजा करने का त्योहार नहीं है। यह हमें कई बातें सिखाता है –
बुद्धि हो तो मुश्किल रास्ता भी आसान हो सकता है।
एकता हो तो समाज की बड़ी ताकत बन सकती है।
अहंकार छोड़कर विनम्र रहना चाहिए।
और सबसे बड़ी बात – हर शुरुआत उम्मीद के साथ होनी चाहिए।
शायद यही वजह है कि गणेश चतुर्थी आज भी करोड़ों लोगों के दिल के बेहद करीब है।
घर से शुरू हुई आस्था, समाज की पहचान बन गई
गणेश चतुर्थी की सबसे खूबसूरत बात यही है कि इसकी कहानी केवल मंदिरों और धार्मिक किताबों तक सीमित नहीं है।
यह कहानी घर के एक छोटे से गणपति से शुरू होकर पूरे मोहल्ले, शहर और समाज को जोड़ने तक पहुंचती है।
और जब ढोल की आवाज के बीच लोग कहते हैं –
“गणपति बप्पा मोरया, अगले बरस तू जल्दी आ…”
तो यह सिर्फ भगवान को विदाई देने का वाक्य नहीं होता। इसमें अगले साल फिर मिलने की उम्मीद, आस्था और एक साथ रहने की भावना भी छिपी होती है।
यही गणेश चतुर्थी की असली कहानी है- आस्था की, एकता की और नई शुरुआत की।
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Written & Edit by : Chandan Patel

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