भारत में शिक्षा को अधिकार माना गया है, लेकिन अच्छी शिक्षा आज भी हर बच्चे की पहुंच में नहीं है। एक तरफ सरकारी स्कूलों की संख्या और उनमें बच्चों की हिस्सेदारी घटने की चिंता है, दूसरी तरफ निजी स्कूलों की फीस, किताबें, यूनिफॉर्म, परिवहन और दूसरी फीस लगातार परिवारों पर आर्थिक बोझ बढ़ा रही हैं। सवाल सिर्फ शिक्षा का नहीं है, सवाल देश के भविष्य का है-क्या गरीब, किसान और मजदूर का बच्चा भी वही अवसर पा रहा है जो एक संपन्न परिवार के बच्चे को मिलता है?
भारत में स्कूलों का आधिकारिक डेटा UDISE+ के माध्यम से जुटाया जाता है। यह व्यवस्था स्कूलों के नामांकन, शिक्षकों, बुनियादी सुविधाओं और अन्य शैक्षणिक आंकड़ों को दर्ज करती है।
शिक्षा अधिकार है, लेकिन अच्छी शिक्षा कितने लोगों का अधिकार है?
भारत के संविधान और शिक्षा के अधिकार कानून ने बच्चों की शिक्षा को महत्वपूर्ण अधिकार बनाया है। लेकिन जमीन पर तस्वीर अब भी असमान है।
एक गरीब परिवार के लिए बच्चे को स्कूल भेजना सिर्फ फीस भरने का सवाल नहीं है। उसे यूनिफॉर्म, जूते, किताब-कॉपी, स्कूल बैग, आने-जाने का खर्च, परीक्षा शुल्क और कई बार निजी ट्यूशन का खर्च भी उठाना पड़ता है।
यही वजह है कि शिक्षा का खर्च गरीब और निम्न-मध्यम वर्ग के परिवारों के बजट को प्रभावित करता है।
अगर सरकारी स्कूल मजबूत हों, वहां गुणवत्तापूर्ण पढ़ाई हो, पर्याप्त शिक्षक हों, डिजिटल सुविधाएं हों, प्रयोगशाला और पुस्तकालय हों और बच्चों को प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी का मजबूत आधार मिले, तो लाखों परिवारों को निजी स्कूलों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।
सरकारी स्कूलों की संख्या में गिरावट क्यों चिंता का विषय है?
भारत में सरकारी स्कूलों की संख्या को लेकर पिछले वर्षों में लगातार बहस होती रही है। UDISE+ के आंकड़ों पर आधारित विश्लेषणों में सरकारी स्कूलों की संख्या में उल्लेखनीय कमी दिखाई गई है। एक विश्लेषण के अनुसार 2021-22 से 2024-25 के बीच सरकारी स्कूलों की संख्या में करीब 72 हजार की कमी दर्ज हुई। उसी अवधि में निजी गैर-सहायता प्राप्त स्कूलों की संख्या बढ़ी।
यहां यह समझना जरूरी है कि स्कूलों की संख्या में कमी का मतलब हर मामले में किसी स्कूल का स्थायी रूप से बंद होना नहीं है। कई जगह स्कूलों का विलय, पुनर्गठन, कम नामांकन वाले स्कूलों का समायोजन या प्रशासनिक बदलाव भी संख्या को प्रभावित कर सकते हैं।
लेकिन सवाल फिर भी गंभीर है-अगर सरकारी स्कूलों का नेटवर्क लगातार छोटा होता है और निजी स्कूलों की भूमिका बढ़ती है, तो गरीब परिवारों के बच्चों के लिए गुणवत्तापूर्ण और सस्ती शिक्षा की व्यवस्था कौन करेगा?
94 हजार स्कूल बंद होने की चर्चा कितनी सही है?
हाल के वर्षों में यह दावा व्यापक रूप से सामने आया है कि लगभग 94 हजार सरकारी स्कूल एक दशक में बंद हुए। कुछ रिपोर्टों और विश्लेषणों में यह आंकड़ा सामने रखा गया है।
लेकिन पत्रकारिता के लिहाज से यहां सावधानी जरूरी है। “बंद”, “विलय” और “स्कूलों की कुल संख्या में कमी” एक ही बात नहीं हैं।
इसलिए सरकार को सार्वजनिक रूप से यह बताना चाहिए कि:
- कितने सरकारी स्कूल वास्तव में बंद किए गए?
- कितने स्कूल दूसरे स्कूलों में विलय किए गए?
- कितने स्कूल कम नामांकन के कारण पुनर्गठित हुए?
- कितने स्कूलों में शिक्षक और विद्यार्थी दोनों पर्याप्त संख्या में नहीं थे?
- स्कूल बंद या विलय करने के बाद बच्चों के लिए वैकल्पिक स्कूल कितनी दूरी पर उपलब्ध कराया गया?
आंकड़ों की स्पष्टता लोकतंत्र में जवाबदेही का पहला कदम है।
आखिर सरकारी स्कूल कमजोर क्यों होते गए?
सरकारी स्कूलों की समस्या सिर्फ एक कारण से पैदा नहीं हुई है। इसके पीछे कई वर्षों की प्रशासनिक और नीतिगत चुनौतियां हैं।
1. शिक्षकों की कमी
कई सरकारी स्कूलों में पर्याप्त शिक्षक नहीं हैं। कहीं एक शिक्षक को कई कक्षाओं को संभालना पड़ता है तो कहीं विषयवार शिक्षकों की कमी रहती है।
शिक्षक सिर्फ बच्चों को पढ़ाने वाला व्यक्ति नहीं है। वह स्कूल की पूरी शैक्षणिक व्यवस्था की रीढ़ है।
2. बुनियादी सुविधाओं की कमी
आज भी कई स्कूलों में बेहतर भवन, प्रयोगशाला, पुस्तकालय, खेल मैदान, कंप्यूटर, इंटरनेट, साफ पानी और पर्याप्त शौचालय जैसी सुविधाएं समान स्तर पर उपलब्ध नहीं हैं।
हालांकि देश में स्कूलों की बुनियादी सुविधाओं में सुधार भी हुआ है। UDISE+ के हालिया आंकड़ों पर आधारित विश्लेषण के अनुसार 2024-25 में करीब 89.5 प्रतिशत स्कूलों में पुस्तकालय, रीडिंग कॉर्नर या बुक बैंक जैसी सुविधा दर्ज की गई।
लेकिन सवाल यह है कि बाकी स्कूलों तक यह सुविधा कब पहुंचेगी और सुविधा उपलब्ध होने के बाद उसका उपयोग कितना हो रहा है?
3. सरकारी स्कूलों की छवि कमजोर होना
सरकारी स्कूलों की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक उनकी सामाजिक छवि भी है।
जब समाज में यह धारणा बनने लगे कि “अच्छी पढ़ाई निजी स्कूल में होती है”, तो सरकारी स्कूलों में बच्चों का नामांकन घटने लगता है।
फिर कम नामांकन के आधार पर स्कूलों के विलय या पुनर्गठन की प्रक्रिया शुरू होती है।
और यही एक चक्र बन जाता है :
कम सुविधाएं → कम नामांकन → कमजोर छवि → और कम नामांकन → स्कूल का विलय या बंद होना।
प्राइवेट स्कूलों की फीस पर सरकार की सख्ती क्यों जरूरी है?
निजी स्कूलों ने भारत में शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। लेकिन निजी शिक्षा के विस्तार का मतलब यह नहीं होना चाहिए कि शिक्षा पूरी तरह बाजार की वस्तु बन जाए।
आज कई परिवारों की शिकायत है कि स्कूल फीस के अलावा अलग-अलग मदों में खर्च बढ़ता जाता है।
फीस के साथ:
एडमिशन फीस + वार्षिक शुल्क + यूनिफॉर्म + किताबें + परिवहन + गतिविधि शुल्क + परीक्षा शुल्क
जैसे खर्च परिवार के बजट पर भारी पड़ सकते हैं।
इसलिए सरकार को निजी स्कूलों के खिलाफ नहीं, बल्कि अनियंत्रित और अपारदर्शी फीस व्यवस्था के खिलाफ मजबूत नियमन बनाना चाहिए।
RTE में निजी स्कूलों के लिए 25 प्रतिशत सीटों का प्रावधान है
शिक्षा के अधिकार कानून के तहत निजी गैर-सहायता प्राप्त स्कूलों में कमजोर और वंचित वर्ग के बच्चों के लिए प्रवेश का प्रावधान है।
लेकिन कानून बनाना और उसका जमीन पर प्रभावी क्रियान्वयन दो अलग बातें हैं।
जरूरत है कि RTE के तहत मिलने वाले दाखिले की प्रक्रिया को आसान, पारदर्शी और भ्रष्टाचार-मुक्त बनाया जाए तथा पात्र बच्चों के अभिभावकों को पूरीजानकारीउपलब्धकराई जाए।
सरकार को सरकारी स्कूलों को निजी स्कूलों से बेहतर क्यों नहीं बनाना चाहिए?
यह सबसे बड़ा सवाल है।
अगर सरकार चाहती है कि देश की अगली पीढ़ी वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करे, तो सरकारी स्कूलों को सिर्फ गरीबों के बच्चों के स्कूल के रूप में नहीं देखा जा सकता।
सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे भी उसी देश के नागरिक हैं।
- वे किसान के बच्चे हैं।
- वे मजदूर के बच्चे हैं।
- वे छोटे दुकानदार के बच्चे हैं।
- वे सरकारी कर्मचारी के बच्चे हैं।

और उनमें से ही भविष्य के डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, शिक्षक, अधिकारी, उद्यमी और जनप्रतिनिधि निकलेंगे।
इसलिए सरकारी स्कूलों में निवेश को खर्च नहीं बल्कि देश के भविष्य में निवेश माना जाना चाहिए।
सरकार क्या कर सकती है?
सरकारी स्कूलों को मजबूत करने के लिए सरकार को कुछ बुनियादी कदमों पर गंभीरता से काम करना चाहिए।
पहला-हर स्कूल में पर्याप्त शिक्षक
स्कूल में बच्चों की संख्या के हिसाब से शिक्षक नियुक्त किए जाएं और विषयवार शिक्षक उपलब्ध कराए जाएं।
दूसरा-स्कूलों की गुणवत्ता की स्वतंत्र जांच
सिर्फ भवन और उपस्थिति देखकर स्कूल की गुणवत्ता तय नहीं होनी चाहिए।
बच्चे कितना पढ़ पा रहे हैं, उनकी बुनियादी भाषा और गणित की क्षमता क्या है और शिक्षक किस स्तर पर पढ़ा रहे हैं : इसका स्वतंत्र मूल्यांकन होना चाहिए।
तीसरा-सरकारी स्कूलों में आधुनिक सुविधाएं
कंप्यूटर, इंटरनेट, स्मार्ट क्लास, विज्ञान प्रयोगशाला, पुस्तकालय, खेल और कौशल आधारित शिक्षा को सामान्य सुविधा बनाया जाना चाहिए।
PM SHRI योजना का उद्देश्य भी चयनित सरकारी स्कूलों को 21वीं सदी की जरूरतों के अनुरूप मॉडल स्कूलों के रूप में विकसित करना है।
लेकिन सवाल यह है कि क्या सिर्फ कुछ हजार मॉडल स्कूल पर्याप्त हैं, या देश के हर सरकारी स्कूल का स्तर उठाना होगा?
चौथा-निजी स्कूलों की फीस में पारदर्शिता
हर निजी स्कूल को अपनी फीस संरचना सार्वजनिक करनी चाहिए।
अभिभावकों से लिए जाने वाले प्रत्येक शुल्क का स्पष्ट विवरण होना चाहिए।
पांचवां- गरीब परिवारों के लिए शिक्षा सुरक्षा
जरूरतमंद परिवारों के बच्चों के लिए किताब, यूनिफॉर्म, परिवहन और डिजिटल शिक्षा जैसी सुविधाओं को मजबूत किया जाना चाहिए।
शिक्षा में अमीरी और गरीबी का अंतर देश के लिए खतरनाक है
एक तरफ वह बच्चा है जिसके पास महंगा निजी स्कूल, लैपटॉप, इंटरनेट, कोचिंग और अंग्रेजी माध्यम की सुविधा है।
दूसरी तरफ वह बच्चा है जो सरकारी स्कूल में पढ़ता है, जिसके स्कूल में शिक्षक की कमी हो सकती है, घर में पढ़ाई के लिए अलग जगह नहीं होती और कई बार माता-पिता खुद पढ़े-लिखे नहीं होते।
अगर दोनों बच्चों को एक ही परीक्षा में बैठाकर कहा जाए कि अब मुकाबला करो, तो क्या यह वास्तव में समान अवसर है?
समान परीक्षा का मतलब समान अवसर नहीं होता।
समान अवसर तब होगा जब दोनों बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की समान शुरुआत मिले।
गरीब के बच्चे को कमजोर शिक्षा देना देश को कमजोर करना है
भारत दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। लेकिन आर्थिक विकास का लाभ तभी व्यापक होगा जब शिक्षा की गुणवत्ता समाज के हर वर्ग तक पहुंचे।
गरीब बच्चे को अच्छी शिक्षा मिलेगी तो वह बेहतर नौकरी पा सकता है।
किसान का बच्चा बेहतर तकनीक सीख सकता है।
मजदूर का बच्चा इंजीनियर बन सकता है।
छोटे दुकानदार का बच्चा वैज्ञानिक बन सकता है।
और यही सामाजिक गतिशीलता किसी भी मजबूत लोकतंत्र और अर्थव्यवस्था की पहचान है।
सवाल सरकार से है, लेकिन जिम्मेदारी समाज की भी है
सरकार से सवाल करना जरूरी है, लेकिन केवल सरकार को दोष देकर समस्या खत्म नहीं होगी।
अभिभावकों, शिक्षकों, पंचायतों, स्थानीय प्रशासन और समाज को भी सरकारी स्कूलों की निगरानी में भाग लेना होगा।
स्कूल सिर्फ सरकार की इमारत नहीं है।
स्कूल पूरे समाज की संपत्ति है।
अगर किसी सरकारी स्कूल में शिक्षक नहीं आता, बच्चे नहीं पढ़ते, शौचालय खराब है या स्कूल में मूलभूत सुविधाएं नहीं हैं, तो सवाल सिर्फ शिक्षा विभाग से नहीं बल्कि पूरे स्थानीय तंत्र से पूछा जाना चाहिए।
शिक्षा बाजार नहीं, देश का भविष्य है
भारत को अगर विकसित और समान अवसर वाला देश बनना है तो शिक्षा को सिर्फ निजी क्षेत्र के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता।
निजी स्कूल रहें, अच्छी शिक्षा दें और प्रतिस्पर्धा करें- इसमें कोई समस्या नहीं है। समस्या तब है जब सरकारी स्कूल इतने कमजोर हो जाएं कि गरीब परिवार के पास निजी स्कूल की फीस भरने के अलावा कोई विकल्प न बचे।
सरकार को सरकारी स्कूलों को इस स्तर तक मजबूत करना होगा कि माता-पिता सिर्फ इसलिए निजी स्कूल न चुनें कि सरकारी स्कूल में पढ़ाई अच्छी नहीं होती।
देश के बच्चे अमीर और गरीब नहीं होते। उनके सपने भी अमीर और गरीब नहीं होते। फर्क सिर्फ इतना है कि किसी बच्चे को अवसर ज्यादा मिलता है और किसी को कम।
इस अंतर को खत्म करना सरकार की सबसे बड़ी जिम्मेदारियों में से एक है।
क्योंकि जिस देश का गरीब बच्चा अच्छी शिक्षा से वंचित रह जाता है, उस देश की प्रगति भी अधूरी रह जाती है।
Written & Edit by : Chandan Patel

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