Tej Festival 2026: तीज का त्योहार क्यों मनाया जाता है, इसकी शुरुआत कब हुई और इसके पीछे क्या मान्यता है? भारत में त्योहार सिर्फ पूजा-पाठ तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इनके पीछे सदियों पुरानी कहानियां, परंपराएं और परिवार को जोड़ने वाली भावनाएं भी छिपी होती हैं। इन्हीं त्योहारों में से एक है तीज, जिसे खास तौर पर महिलाओं के पर्व के रूप में देखा जाता है।
तीज आते ही घरों में मेहंदी, नए कपड़े, झूले, गीत-संगीत और पूजा की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। कई महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना से व्रत रखती हैं, जबकि अविवाहित लड़कियां अच्छे जीवनसाथी की कामना करती हैं।
लेकिन सवाल यह है कि आखिर तीज क्यों मनाई जाती है? इसकी शुरुआत कब हुई और इसके पीछे कौन सी कहानी है?
तीज क्या है और कितने प्रकार की होती है?
आम तौर पर तीज को एक ही त्योहार माना जाता है, लेकिन हिंदू कैलेंडर में तीज के कई रूप मिलते हैं। उत्तर भारत में मुख्य रूप से तीन तीज प्रसिद्ध हैं –
- हरियाली तीज
- कजरी तीज
- हरतालिका तीज
इनमें हरियाली तीज सावन के मौसम और हरियाली से जुड़ी है, कजरी तीज भाद्रपद कृष्ण पक्ष की तृतीया से जुड़ी मानी जाती है, जबकि हरतालिका तीज भाद्रपद शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाई जाती है।
2026 में कब है हरतालिका तीज?
साल 2026 में हरतालिका तीज 14 सितंबर, सोमवार को मनाई जाएगी। पंचांग के अनुसार यह भाद्रपद शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि है। दिल्ली सहित कई स्थानों के लिए भी 14 सितंबर 2026 को हरतालिका तीज बताई गई है।
तीज क्यों मनाई जाती है?
तीज का सबसे गहरा संबंध भगवान शिव और माता पार्वती से माना जाता है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार माता पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की थी। उनकी तपस्या और दृढ़ संकल्प से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया।
इसी वजह से तीज के व्रत को वैवाहिक सुख, पति की लंबी उम्र और दांपत्य जीवन में सुख-शांति की कामना से जोड़ा जाता है। धार्मिक परंपरा में यह पर्व महिलाओं की आस्था, संकल्प और परिवार के सुख की कामना का प्रतीक बन गया।
क्या है हरतालिका तीज की कहानी?
हरतालिका तीज से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध कथा माता पार्वती और भगवान शिव की है।
मान्यता के अनुसार माता पार्वती ने बचपन से ही भगवान शिव को अपना पति मान लिया था। उन्होंने शिव को पाने के लिए लंबे समय तक कठोर तपस्या की।
कथा के अनुसार माता पार्वती के पिता हिमालयराज उनकी इच्छा के अनुसार विवाह नहीं कराना चाहते थे और भगवान विष्णु से विवाह का विचार सामने आया। जब माता पार्वती को इसकी जानकारी मिली तो वह काफी चिंतित हुईं।
कहा जाता है कि माता पार्वती की एक सखी उन्हें अपने साथ जंगल में ले गईं, ताकि उनका विवाह उनकी इच्छा के विरुद्ध न हो। वहां माता पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए तपस्या जारी रखी।
उनकी तपस्या से भगवान शिव प्रसन्न हुए और उनकी इच्छा पूरी हुई। यही वजह है कि हरतालिका तीज को माता पार्वती की तपस्या, दृढ़ संकल्प और शिव-पार्वती के मिलन से जोड़कर देखा जाता है।
‘हरतालिका’ नाम कैसे पड़ा?
हरतालिका नाम भी इसी कथा से जुड़ा हुआ बताया जाता है।
धार्मिक व्याख्या के अनुसार ‘हरत’ और ‘आलिका’ शब्दों से हरतालिका नाम बना है। यहां ‘आलिका’ का संबंध सखी या महिला मित्र से और ‘हरत’ का संबंध ले जाने या हरण करने की कथा से जोड़ा जाता है।
यानी माता पार्वती की सखी उन्हें अपने साथ जंगल ले गईं और उनकी तपस्या में साथ दिया। इसी वजह से इस पर्व को हरतालिका तीज कहा गया।
तीज में सखी और सहेली की भूमिका क्यों खास है?
तीज की कहानी सिर्फ पति-पत्नी के रिश्ते तक सीमित नहीं है। इसमें दो महिला मित्रों के बीच भरोसे और साथ की कहानी भी दिखाई देती है।
माता पार्वती की सखी ने कठिन समय में उनका साथ दिया और उनकी इच्छा पूरी करने में मदद की। इसलिए तीज को महिलाओं के बीच आपसी प्रेम, दोस्ती और सहयोग का पर्व भी माना जाता है।
तीज में महिलाएं क्या करती हैं?
तीज के मौके पर महिलाएं पारंपरिक रूप से सुबह स्नान करके पूजा की तैयारी करती हैं। कई जगह महिलाएं भगवान शिव और माता पार्वती की प्रतिमा या मिट्टी से बनी आकृति की पूजा करती हैं।
कई महिलाएं निर्जला या अन्य प्रकार का व्रत भी रखती हैं। हालांकि व्रत रखने की परंपरा और पूजा की विधि अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में अलग हो सकती है।
मेहंदी लगाना, नए कपड़े पहनना, झूला झूलना, लोकगीत गाना और महिलाओं का एक साथ मिलकर त्योहार मनाना तीज की खास पहचान है।
तीज में झूला और मेहंदी की परंपरा क्यों है?
सावन और बारिश के मौसम के साथ तीज का गहरा सांस्कृतिक संबंध है। पेड़-पौधों में हरियाली, बारिश की फुहार और गांव-घर का माहौल इस त्योहार को और खास बनाता है।
इसी मौसम में पेड़ों पर झूले लगाए जाते थे। महिलाएं और लड़कियां झूला झूलते हुए लोकगीत गाती थीं। हाथों में मेहंदी और पारंपरिक श्रृंगार भी इस त्योहार की पहचान बन गया।
आज भी कई जगह तीज के अवसर पर इन परंपराओं को उसी उत्साह से निभाया जाता है।
तीज की शुरुआत कब हुई?
यह सवाल बहुत महत्वपूर्ण है। तीज की शुरुआत किस साल या किस शताब्दी में हुई, इसकी कोई एक प्रमाणित ऐतिहासिक तारीख बताना मुश्किल है।
इसके पीछे मुख्य रूप से धार्मिक परंपराएं और पौराणिक कथाएं हैं। हरतालिका तीज की मान्यता माता पार्वती की तपस्या और भगवान शिव से उनके विवाह की कथा से जुड़ी है।
इसलिए इसे किसी एक वर्ष से शुरू हुआ त्योहार बताने के बजाय प्राचीन धार्मिक और लोक परंपरा के रूप में समझना ज्यादा सही है।
इतिहास की दृष्टि से अलग-अलग क्षेत्रों में तीज की परंपराएं समय के साथ विकसित होती गईं और आज यह उत्तर तथा मध्य भारत के कई हिस्सों में बड़े उत्साह से मनाई जाती है। हरतालिका तीज विशेष रूप से राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश,बिहारऔरझारखंड जैसे राज्यों में लोकप्रिय है।
बिहार और झारखंड में तीज का अलग रंग
बिहार और झारखंड में तीज का पर्व घर-परिवार और सामाजिक जीवन से भी गहराई से जुड़ा है। महिलाएं पारंपरिक तरीके से पूजा करती हैं, गीत गाती हैं और परिवार के सुख-समृद्धि की कामना करती हैं।
ग्रामीण इलाकों में आज भी तीज के मौके पर पारंपरिक लोकगीत और रीति-रिवाज देखने को मिलते हैं। बदलते समय के साथ पूजा का तरीका भले बदला हो, लेकिन त्योहार से जुड़ी भावनाएं आज भी काफी मजबूत हैं।
तीज का असली संदेश क्या है?
तीज को सिर्फ व्रत और पूजा का त्योहार मानना इसके व्यापक अर्थ को छोटा कर देना होगा।
इस पर्व में आस्था, प्रेम, संकल्प, दोस्ती, परिवार और प्रकृति – इन सभी का मेल दिखाई देता है।
माता पार्वती की कथा महिलाओं के दृढ़ संकल्प और अपनी इच्छा के लिए संघर्ष का संदेश देती है। वहीं शिव-पार्वती का संबंध वैवाहिक जीवन में प्रेम और साथ का प्रतीक माना जाता है।
आज के समय में भी तीज लोगों को अपनी संस्कृति और परंपराओं से जोड़ने का काम करती है।
तीज सदियों से चली आ रही ऐसी परंपरा है
तीज सदियों से चली आ रही ऐसी परंपरा है, जिसमें धार्मिक आस्था के साथ लोक संस्कृति भी शामिल है। खासकर हरतालिका तीज का संबंध माता पार्वती की तपस्या और भगवान शिव को पति के रूप में पाने की उनकी इच्छा से जोड़ा जाता है।
इस पर्व की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि इसमें पूजा के साथ महिलाओं की दोस्ती, परिवार के प्रति प्रेम, वैवाहिक जीवन की मंगलकामना और प्रकृति के प्रति जुड़ाव भी दिखाई देता है।
यही वजह है कि समय बदलने के बावजूद तीज का रंग आज भी फीका नहीं पड़ा है। बल्कि सोशल मीडिया और आधुनिक जीवन के दौर में भी यह त्योहार अपनी पारंपरिक पहचान के साथ नई पीढ़ी तक पहुंच रहा है।
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Written & Edit by : Chandan Patel

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