जब शिक्षा की बात होती है तो बड़े-बड़े मंचों से डिजिटल इंडिया, स्मार्ट क्लास और विश्वस्तरीय शिक्षा की बातें सुनाई देती हैं। लेकिन देश के गांवों और गरीब बस्तियों के सरकारी स्कूलों में आज भी कई बच्चों के सामने साफ पानी, शौचालय, पर्याप्त शिक्षक और ठीक-ठाक भवन जैसी बुनियादी जरूरतें सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई हैं।
भारत में शिक्षा को हर बच्चे का अधिकार माना गया है। फिर सवाल यह है कि अगर सरकारी स्कूल में पढ़ने वाला बच्चा अपने स्कूल में पानी और शौचालय जैसी सुविधा के लिए भी संघर्ष करे, तो हम उससे बेहतर भविष्य की उम्मीद कैसे कर सकते हैं?
सरकारी स्कूलों में पढ़ता है देश का बड़ा हिस्सा
सरकारी स्कूल सिर्फ एक इमारत नहीं है। यह उस मजदूर, किसान, गरीब परिवार और छोटे दुकानदार के बच्चे की उम्मीद है, जिसके पास महंगे निजी स्कूल की फीस भरने की क्षमता नहीं है।
यही बच्चा आगे चलकर डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षक, वैज्ञानिक, अधिकारी या जनप्रतिनिधि बन सकता है। लेकिन इसके लिए उसे सबसे पहले ऐसा स्कूल चाहिए जहां वह सम्मान और सुरक्षित माहौल में पढ़ सके।
सरकार के UDISE+ आंकड़ों के अनुसार देश की स्कूली शिक्षा व्यवस्था में करोड़ों बच्चे और लाखों स्कूल शामिल हैं। सरकार ने स्कूलों में पानी, शौचालय, बिजली और डिजिटल सुविधाओं को बेहतर करने के लिए योजनाएं भी चला रखी हैं।
फिर भी जमीन पर तस्वीर हर जगह एक जैसी नहीं है।
ताजा उदाहरण बता रहे हैं कि बच्चों की आवाज अब दब नहीं रही
अगस्त 2026 में देश के कई राज्यों में सरकारी स्कूलों के बच्चे खुद बुनियादी सुविधाओं की मांग को लेकर सड़क पर उतरते दिखाई दिए। एक रिपोर्ट के अनुसार जुलाई और अगस्त 2026 में कम से कम 10 राज्यों और 25 जिलों में बच्चों के विरोध-प्रदर्शन सामने आए, जिनमें शिक्षक की कमी, खराब कक्षाएं, पीने का पानी, भोजन, बिजली और स्कूल तक सुरक्षित पहुंच जैसे मुद्दे शामिल थे।
यानी अब सवाल सिर्फ अभिभावक नहीं पूछ रहे हैं, बच्चे भी पूछ रहे हैं—हमें पढ़ने के लिए आखिर कैसा स्कूल मिलेगा?
महाराष्ट्र में सरकारी स्कूलों की स्थिति को लेकर हाल के दिनों में ‘स्कूल ठीक करो’ अभियान और बच्चों की मांगों ने भी बहस तेज की है। कुछ जगहों पर बच्चों ने शिक्षक, पानी, शौचालय और बेहतर स्कूल व्यवस्था की मांग उठाई है।
हरियाणा के गुरुग्राम में भी शिक्षकों की कमी का असर बच्चों की पढ़ाई और मूल्यांकन पर पड़ने की खबर सामने आई। रिपोर्ट के मुताबिक कई सरकारी प्राथमिक स्कूलों में शिक्षक उपलब्ध नहीं होने के कारण शैक्षणिक गतिविधियां प्रभावित हुईं।
कागज पर सुविधा, जमीन पर कितनी हकीकत?
यह भी सच है कि सरकारी आंकड़ों में पिछले वर्षों में स्कूलों की बुनियादी सुविधाओं में सुधार हुआ है। UDISE+ 2024-25 से जुड़े आंकड़ों में बड़ी संख्या में स्कूलों में पेयजल और शौचालय की सुविधा उपलब्ध होने की बात सामने आती है।
लेकिन असली सवाल सिर्फ यह नहीं है कि सुविधा दर्ज है या नहीं।
सवाल यह है कि:
- क्या पानी वास्तव में पीने लायक है?
- क्या शौचालय साफ और इस्तेमाल करने योग्य है?
- क्या स्कूल में पर्याप्त शिक्षक हैं?
- क्या बच्चियों के लिए सुरक्षित और अलग शौचालय है?
- क्या बारिश में कक्षा की छत सुरक्षित रहती है?
- क्या बच्चों को पढ़ने के लिए पर्याप्त किताबें और सीखने का माहौल मिलता है?
- इन सवालों का जवाब सिर्फ सरकारी फाइलों से नहीं, बल्कि स्कूल के बच्चों और उनके अभिभावकों से मिल सकता है।
सबसे बड़ा सवाल: नेताओं और अफसरों के बच्चे कहां पढ़ते हैं?
यह सवाल थोड़ा कड़वा है, लेकिन पूछना जरूरी है।
जिस सरकारी स्कूल को देश के गरीब बच्चे के लिए बेहतर बनाने की जिम्मेदारी राजनेताओं और नौकरशाहों की है, क्या उनके अपने बच्चे उसी व्यवस्था में पढ़ते हैं?
अगर देश के मंत्री, सांसद, विधायक, बड़े अधिकारी और शिक्षा विभाग के जिम्मेदार लोग अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में पढ़ाने लगें, तो क्या सरकारी स्कूलों की हालत ऐसी ही रहेगी? शायद नहीं।
क्योंकि जिस दिन सत्ता और व्यवस्था से जुड़े परिवारों के बच्चे भी उसी सरकारी स्कूल में बैठेंगे, उसी दिन स्कूल की टूटी कुर्सी, खराब शौचालय, गंदा पानी, शिक्षक की कमी और खराब सड़क सिर्फ किसी गरीब परिवार की समस्या नहीं रहेगी।
वह व्यवस्था की अपनी समस्या बन जाएगी।
गरीब का बच्चा सरकारी स्कूल में क्यों मजबूर है?
भारत में हर परिवार अपने बच्चे को बेहतर शिक्षा देना चाहता है। लेकिन गरीब मजदूर के सामने विकल्प सीमित हैं।
दिनभर मजदूरी करने वाला पिता महंगी स्कूल फीस, किताबें, यूनिफॉर्म, परिवहन और दूसरी फीस का खर्च नहीं उठा सकता। किसान की आमदनी मौसम पर निर्भर है। छोटे दुकानदार और दिहाड़ी मजदूर के लिए निजी स्कूल की बढ़ती फीस एक बड़ा बोझ है।
इसलिए सरकारी स्कूल उनके लिए कोई विकल्प नहीं, बल्कि बच्चों के भविष्य की सबसे बड़ी उम्मीद है।
अगर यही व्यवस्था कमजोर होगी तो इसका सीधा असर गरीब परिवार के बच्चों पर पड़ेगा।

सिर्फ स्कूल की इमारत बनाने से शिक्षा बेहतर नहीं होगी
शिक्षा सुधार का मतलब केवल नया भवन बनाना नहीं है।
एक अच्छे सरकारी स्कूल के लिए जरूरी है—
- पर्याप्त और नियमित शिक्षक
- साफ पीने का पानी
- लड़के और लड़कियों के लिए उपयोगी शौचालय की व्यवस्था
- बिजली और पंखे
- सुरक्षित कक्षाएं
- पुस्तकालय और प्रयोगशाला
- खेल का मैदान
- डिजिटल संसाधन
- गुणवत्तापूर्ण मध्याह्न भोजन
- बच्चों की सुरक्षा
- दिव्यांग बच्चों के लिए सुविधाएं
सरकार की ‘समग्र शिक्षा’ जैसी योजनाओं में स्कूल भवन, शौचालय, पेयजल, बिजली और डिजिटल सुविधाओं को मजबूत करने के लिए राज्यों को सहायता देने का प्रावधान है।
अब जरूरत इस बात की है कि इन योजनाओं का फायदा जमीन पर दिखाई दे।
शिक्षक नहीं होंगे तो स्मार्ट क्लास भी बेकार है
आज शिक्षा में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, स्मार्ट क्लास, डिजिटल बोर्ड और ऑनलाइन पढ़ाई की बातें हो रही हैं।
लेकिन एक ग्रामीण सरकारी स्कूल में अगर दो सौ बच्चों के लिए पर्याप्त शिक्षक नहीं हैं, तो डिजिटल बोर्ड लगाने से समस्या पूरी तरह हल नहीं होगी।
बच्चे को मशीन नहीं, एक अच्छा शिक्षक भी चाहिए।
शिक्षक सिर्फ किताब नहीं पढ़ाता। वह बच्चे को समझता है, उसकी कमजोरी पहचानता है, सवाल पूछने कासाहस देताहै और उसके भीतर आगे बढ़ने का विश्वास पैदा करता है।
इसलिए शिक्षक की कमी को सिर्फ प्रशासनिक आंकड़ा नहीं माना जा सकता। यह सीधे बच्चों के भविष्य से जुड़ा सवाल है।
स्कूल बंद होने का असर सिर्फ एक इमारत पर नहीं पड़ता
कई जगह कम नामांकन या दूसरे प्रशासनिक कारणों से स्कूलों के विलय और युक्तिकरण की चर्चा होती है।
सरकार के स्तर पर शून्य नामांकन और एकल-शिक्षक स्कूलों की संख्या कम करने के प्रयास की जानकारी दी गई है। UDISE+ 2025-26 के अनुसार एकल-शिक्षक स्कूलों में भी कमी दर्ज की गई है।
लेकिन किसी गांव का स्कूल बंद या दूर होने का असर समझना हो तो सिर्फ आंकड़े देखना काफी नहीं है।
एक गरीब परिवार के लिए बच्चे को कई किलोमीटर दूर स्कूल भेजना अतिरिक्त खर्च, सुरक्षा और समय की समस्या बन सकता है।
खासकर बच्चियों की पढ़ाई पर इसका असर और गंभीर हो सकता है।
भारत के बच्चों से बड़ा कोई वोट बैंक नहीं
राजनीति में अक्सर जाति, धर्म, सड़क, बिजली और दूसरी योजनाओं पर बहस होती है।
होनी भी चाहिए।
लेकिन शिक्षा पर राजनीति से ऊपर उठकर बात करने की जरूरत है।
क्योंकि आज स्कूल में बैठा बच्चा ही कल का भारत है।
अगर उसे अच्छी शिक्षा मिली तो वह देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करेगा। अगर उसे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा नहीं मिली तो गरीबी और असमानता की समस्या आने वाली पीढ़ियों में भी बनी रह सकती है।
इसलिए भारत के बच्चों को चुनावी भाषण नहीं, मजबूत सरकारी स्कूल चाहिए।
समाधान क्या है?
सरकारी स्कूलों को बचाने और मजबूत करने के लिए कुछ सवालों पर गंभीरता से काम करना होगा।
पहला : हर स्कूल का बुनियादी सुविधाओं के आधार पर नियमित सोशल ऑडिट हो।
दूसरा : शिक्षकों की कमी को प्राथमिकता के आधार पर दूर किया जाए।
तीसरा : पानी और शौचालय जैसी सुविधाओं की सिर्फ कागज पर उपलब्धता नहीं, उनकी कार्यशील स्थिति भी जांची जाए।
चौथा : अभिभावकों और स्कूल प्रबंधन समितियों को ज्यादा अधिकार दिए जाएं।
पांचवां : स्कूल बंद करने या विलय करने से पहले स्थानीय बच्चों की दूरी, सुरक्षा और परिवहन की स्थिति को देखा जाए।
छठा : सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को भी वही सम्मान और अवसर मिले जो महंगे निजी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को मिलता है।
आखिर कब बदलेगी तस्वीर?
भारत दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होने की ओर बढ़ रहा है। हम चंद्रमा तक पहुंचने, डिजिटल तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की बात कर रहे हैं।
लेकिन उसी देश का कोई बच्चा अगर स्कूल में बैठकर सोच रहा है कि आज पानी मिलेगा या नहीं, शौचालय साफ है या नहीं और पढ़ाने के लिए शिक्षक आएंगे या नहीं, तो हमें अपनी प्राथमिकताओं पर फिर से सोचना होगा।
शिक्षा पर खर्च को खर्च नहीं, देश के भविष्य में निवेश समझना होगा।
गरीब मजदूर का बच्चा हो या किसान का बेटा, आदिवासी गांव का बच्चा हो या शहर की झुग्गी में रहने वाला बच्चा—हर बच्चे को ऐसा स्कूल मिलना चाहिए जहां वह सपने देखने से पहले बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष न करे।
क्योंकि सवाल सिर्फ सरकारी स्कूल का नहीं है।
सवाल है—हम भारत के बच्चों को कैसा भविष्य देना चाहते हैं?
और शायद इसका सबसे ईमानदार जवाब तब मिलेगा, जब देश चलाने वाले लोग भी अपने बच्चों की शिक्षा के लिए उसी सरकारी स्कूल पर भरोसा करने लगेंगे, जिस पर आज करोड़ों गरीब परिवार भरोसा करने को मजबूर हैं।
शिक्षा व्यवस्था में सुधार किसी एक पार्टी, सरकार या विभाग का मुद्दा नहीं
सरकारी स्कूल कमजोर होंगे तो सबसे ज्यादा नुकसान उस भारत का होगा, जिसके पास निजी स्कूल की फीस देने की क्षमता नहीं है।
इसलिए शिक्षा व्यवस्था में सुधार किसी एक पार्टी, सरकार या विभाग का मुद्दा नहीं होना चाहिए। यह पूरे देश की प्राथमिकता होनी चाहिए।
क्योंकि किसी देश का भविष्य संसद की इमारतों में नहीं, उसके स्कूलों की कक्षाओं में तैयार होता है।
Written & Edit by : Chandan Patel

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