नई दिल्ली: भारत और चीन के बीच कारोबार भले ही जारी हो, लेकिन चीन जाने वाले भारतीय कारोबारियों और पेशेवरों के सामने वीजा की नई चुनौती खड़ी होती दिखाई दे रही है। हाल के महीनों में चीन के बिजनेस वीजा आवेदन की प्रक्रिया कथित तौर पर पहले से अधिक सख्त हो गई है। उद्योग जगत से जुड़े लोगों के मुताबिक, कई मामलों में आवेदन खारिज किए जा रहे हैं और दोबारा आवेदन करने के बावजूद मंजूरी की कोई निश्चितता नहीं है।
बताया जा रहा है कि कुछ श्रेणियों में भारतीय आवेदकों के बिजनेस वीजा आवेदन रद्द होने की दर 95 फीसदी तक पहुंच गई है। वहीं, चीन में काम करने वाली कुछ भारतीय कंपनियों का कहना है कि उनके कर्मचारियों के वीजा आवेदन भी पहले की तुलना में कम संख्या में स्वीकृत हो रहे हैं।
बिजनेस मीटिंग से लेकर तकनीकी काम तक पर असर
चीन भारतीय कंपनियों के लिए सिर्फ एक बड़ा व्यापारिक बाजार नहीं है, बल्कि मशीनरी, इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स, ऑटोमोबाइल पार्ट्स और औद्योगिक उपकरणों की सप्लाई का भी महत्वपूर्ण स्रोत है।
ऐसे में भारतीय कंपनियों के अधिकारियों और तकनीकी विशेषज्ञों का चीन जाना कई बार जरूरी हो जाता है। मशीनरी में तकनीकी खराबी, उत्पादन संबंधी समस्या, सप्लाई चेन की समीक्षा, नई तकनीक की जानकारी और कारोबारी समझौतों के लिए आमने-सामने बैठकें महत्वपूर्ण होती हैं।
वीजा मिलने में देरी या आवेदन खारिज होने से इन गतिविधियों पर असर पड़ सकता है।
कंपनियों को थाईलैंड और सिंगापुर का रुख करना पड़ रहा
वीजा प्रक्रिया में कथित सख्ती का एक सीधा असर यह बताया जा रहा है कि कुछ भारतीय कंपनियां अपनी कारोबारी बैठकों के लिए चीन के बजाय थाईलैंड और सिंगापुर जैसे देशों को विकल्प के तौर पर इस्तेमाल कर रही हैं।
कंपनियों के लिए यह व्यवस्था अतिरिक्त खर्च और समय दोनों बढ़ा सकती है। खासकर तब, जब किसी चीनी कंपनी के साथ मशीनरी, उत्पादन या सप्लाई से जुड़ी तकनीकी बातचीत जरूरी हो।
विनिर्माण क्षेत्र पर सबसे ज्यादा चिंता
इस पूरी स्थिति का असर सबसे अधिक विनिर्माण क्षेत्र पर पड़ने की आशंका है। भारतीय इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल और कॉन्ट्रैक्ट मैन्युफैक्चरिंग कंपनियां चीन से बड़ी मात्रा में मशीनरी, उपकरण और विभिन्न प्रकार के पुर्जों का आयात करती हैं।
उद्योग जगत से जुड़े अनुमानों के अनुसार, कुछ क्षेत्रों में पूंजीगत सामान और पुर्जों के लिए चीन पर निर्भरता 50 फीसदी तक बनी हुई है। ऐसी स्थिति में चीन की यात्रा से जुड़ी बाधाएं कंपनियों के उत्पादन और तकनीकी सहायता की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती हैं।
क्या है चीन का बिजनेस वीजा?
चीन का बिजनेस वीजा आम तौर पर M Visa के नाम से जाना जाता है। यह चीन में व्यापारिक गतिविधियों के लिए यात्रा करने वाले विदेशी नागरिकों को दिया जाता है।
इस वीजा का इस्तेमाल आम तौर पर बिजनेस मीटिंग, व्यापारिक बातचीत, प्रशिक्षण और अन्य व्यावसायिक गतिविधियों के लिए किया जाता है। खास तौर पर ऐसे लोगों के लिए यह उपयोगी है जो चीन की किसी स्थानीय कंपनी के कर्मचारी नहीं हैं, लेकिन सीमित अवधि के लिए कारोबारी उद्देश्य से चीन की यात्रा करना चाहते हैं।
भारतीय कंपनियों के सामने बढ़ रही अनिश्चितता
भारतीय कंपनियों के लिए सबसे बड़ी परेशानी सिर्फ आवेदन खारिज होना नहीं, बल्कि दोबारा आवेदन करने के बाद भी मंजूरी को लेकर अनिश्चितता है।
कंपनियों का कहना है कि वीजा आवेदन प्रक्रिया में दस्तावेजों और जांच को लेकर सख्ती बढ़ी है। ऐसे में कारोबारी यात्रा की योजना बनाना पहले की तुलना में मुश्किल हो रहा है।
अगर यह स्थिति लंबे समय तक जारी रहती है तो इसका असर भारत-चीन कारोबारी संबंधों के साथ-साथ उन भारतीय उद्योगों पर भी पड़ सकता है, जो चीन से मशीनरी और कंपोनेंट्स पर निर्भर हैं।
भारत-चीन कारोबार के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह मुद्दा?
भारत और चीन के बीच व्यापारिक संबंध कई क्षेत्रों में गहरे हैं। भारत की बड़ी संख्या में कंपनियां चीन से इलेक्ट्रॉनिक सामान, मशीनरी, औद्योगिक उपकरण और विभिन्न प्रकार के कंपोनेंट्स खरीदती हैं।
ऐसे में व्यापारिक यात्रा से जुड़ी किसी भी अतिरिक्त बाधा का असर केवल अधिकारियों की आवाजाही तक सीमित नहीं रहता। इसका प्रभाव कारोबारी बातचीत, तकनीकी सहयोग, उत्पादन व्यवस्था और सप्लाई चेन पर भी पड़ सकता है।
हालांकि, वीजा आवेदन खारिज होने की 95 फीसदी दर और अलग-अलग श्रेणियों में स्वीकृति प्रतिशत जैसे आंकड़ों की स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि आवश्यक है। इसलिए इन आंकड़ों को अंतिम सरकारी आंकड़े के तौर पर नहीं, बल्कि उद्योग जगत से सामने आए दावों के रूप में देखा जाना चाहिए।
भारतीय कारोबारियों और कंपनियों की चिंता बढ़ा दी
चीन के बिजनेस वीजा नियमों में कथित सख्ती ने भारतीय कारोबारियों और कंपनियों की चिंता बढ़ा दी है। अगर वीजा प्रक्रिया लंबे समय तक इसी तरह कठिन बनी रहती है, तो कंपनियों को वैकल्पिक देशों में बैठकें आयोजित करने और अपनी कारोबारी रणनीति बदलने पर मजबूर होना पड़ सकता है।
खासकर विनिर्माण और इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र के लिए यह स्थिति इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि चीन से जुड़ी सप्लाई चेन और तकनीकी सहयोग पर बड़ी संख्या में भारतीय कंपनियां निर्भर हैं।
Written & Edit by : Chandan Patel

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