नई दिल्ली। जंतर-मंतर पर 10 अक्टूबर को हुए प्रदर्शन के बाद दिल्ली में पुलिस की कार्रवाई, प्रदर्शनकारियों की कथित गैरकानूनी हिरासत और मेट्रो सेवाओं पर लगाई गई पाबंदियों का मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। सुनवाई के दौरान वकीलों ने पुलिस पर मारपीट, बिना पहचान बताए हिरासत में लेने और लोगों की आवाजाही रोकने जैसे गंभीर आरोप लगाए। अदालत में इस दौरान वकीलों और पुलिस अधिकारियों के बीच बहस भी हुई। सुप्रीम कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए संबंधित अधिकारियों से जवाब मांगा और शहर में बैरिकेडिंग की समीक्षा, इंटरनेट सेवाएं बाधित नहीं करने तथा मेट्रो सेवाएं सामान्य रखने जैसे निर्देश दिए।

सुनवाई के दौरान पुलिस की कार्रवाई, फोन जब्त किए जाने, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 के इस्तेमाल और सुप्रीम कोर्ट के पिछले आदेशों के कथित उल्लंघन का मुद्दा भी उठा। अदालत ने स्पष्ट किया कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन जरूरी है। मामले से जुड़े विभिन्न पक्षों को अब मंगलवार को होने वाली सुनवाई में अपना पक्ष रखना होगा।

कोर्टरूम में वकीलों और पुलिस अधिकारियों के बीच बहस

दिल्ली में जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन से जुड़ी याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान कोर्टरूम में वकीलों और पुलिस अधिकारियों के बीच बहस हो गई। वकीलों ने आरोप लगाया कि पुलिस ने 10 अक्टूबर को प्रदर्शन के दौरान उनकी पिटाई की थी। इस दौरान कुछ वकीलों ने कोर्ट में पुलिसकर्मियों के बैठने की जगह को लेकर भी आपत्ति जताई। 10 अक्टूबर को कथित रूप से पिटाई का शिकार हुए वकील भी खुद अदालत में पेश हुए।

सुनवाई के दौरान कोर्ट रूम नंबर 18 में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग का लिंक काम नहीं कर रहा था। इस पर वकीलों ने अदालत से कोर्टरूम बदलने की मांग की। उन्होंने कहा कि वरिष्ठ अधिवक्ता केके वेणुगोपाल को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पेश होना है। ऐसे में लिंक का काम करना जरूरी है। वकीलों ने कोर्ट स्टाफ से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग लिंक को तुरंत ठीक करने की मांग की।

वकील मेनका गुरुस्वामी ने भी इस मुद्दे पर आपत्ति जताई। उन्होंने कोर्ट स्टाफ से कहा कि बाहर की दुनिया को यह नहीं लगना चाहिए कि किसी एक पक्ष का साथ दिया जा रहा है। उन्होंने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग लिंक बहाल करने की मांग की। इस दौरान कोर्टरूम में चल रही गतिविधियों की रिकॉर्डिंग किए जाने की बात भी सामने आई।

इसके बाद सुनवाई को 15 मिनट के लिए रोक दिया गया। सुनवाई को कोर्ट रूम नंबर 5 में स्थानांतरित किया गया। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में दोबारा सुनवाई शुरू हुई।

फोन जब्ती और पुलिस के बल प्रयोग पर सुप्रीम कोर्ट ने मांगा जवाब

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पुलिस अधिकारियों के बिना बैज के कार्रवाई करने, जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग और गैरकानूनी हिरासत के आरोपों पर जवाब देना होगा। कोर्ट ने बैरिकेडिंग की तत्काल समीक्षा करने का निर्देश दिया और कहा कि वह संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए बाध्य है।

सुनवाई के दौरान वकीलों ने प्रदर्शनकारियों के फोन जब्त किए जाने का मुद्दा भी उठाया। इस पर कोर्ट ने कहा कि संबंधित पक्ष आवेदन दाखिल करें। इस मुद्दे पर मंगलवार को सुनवाई होगी। कोर्ट ने अन्य वकीलों को भी मामले में पक्षकार बनने के लिए आवेदन दाखिल करने की इजाजत दी है। इसके लिए आवेदन की प्रति आज ही सॉलिसिटर जनरल के कार्यालय को देनी होगी। मामले से जुड़े सभी पक्षों की सुनवाई अब मंगलवार को होगी।

गैरकानूनी हिरासत पर रोक, इंटरनेट और मेट्रो सेवाएं सामान्य रखने का आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि कानून के मुताबिक कार्रवाई के अलावा किसी को हिरासत में नहीं लिया जा सकता। कोर्ट ने निर्देश दिया कि मेट्रो और रेल सेवाएं सामान्य रूप से चलेंगी। सार्वजनिक व्यवस्था में गड़बड़ी की आशंका होने पर ही नियमानुसार प्रतिबंध लगाए जा सकेंगे। दिल्ली में लोगों और ट्रैफिक की आवाजाही भी ट्रैफिक नियमों के अधीन जारी रहेगी। बैरिकेडिंग की तुरंत समीक्षा करने को कहा गया है।

कोर्ट ने इंटरनेट सेवाएं बाधित नहीं करने का निर्देश दिया। साथ ही सुप्रीम कोर्ट और अन्य अदालतों में आने-जाने पर किसी तरह की रोक नहीं लगाने को कहा। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट परिसर के बाहर धारा 163 BNSS लागू होने की सूचना वाला बोर्ड तत्काल हटाने का आदेश भी दिया, ताकि वकीलों और आम लोगों की न्याय तक पहुंच बाधित न हो। जस्टिस बागची ने स्पष्ट किया कि इंटरनेट के मामले में भी कानून के प्रावधान लागू रहेंगे।

अवमानना कार्रवाई पर सुप्रीम कोर्ट ने मांगा जवाब

सुप्रीम कोर्ट ने 9 अक्टूबर के आदेश के उल्लंघन के आरोपों पर संबंधित अधिकारियों को कारण बताओ नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने पूछा कि उनके खिलाफ अवमानना की कार्यवाही क्यों न शुरू की जाए। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इस पर आपत्ति जताई। इस पर जस्टिस बागची ने कहा कि कारण बताओ नोटिस और अवमानना नोटिस में अंतर होता है।

सुप्रीम कोर्ट
जस्टिस बागची

कोर्ट ने अवमानना याचिकाओं और बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाओं (किसी व्यक्ति को हिरासत से छुड़ाने के लिए अदालत में लगाई गई अर्जी) पर भी सभी संबंधित अधिकारियों से जवाब मांगा है।

कोर्ट ने अपने पिछले आदेश का जिक्र करते हुए कहा कि अधिकारियों को 57 मेट्रो स्टेशनों को बंद करने के फैसले पर दोबारा विचार करने को कहा गया था। साथ ही बदले हुए फैसले का व्यापक प्रचार करने का निर्देश दिया गया था। ट्रैफिक की आवाजाही को लेकर नई एडवाइजरी जारी करने और मंगलवार तक अनुपालन रिपोर्ट सौंपने को भी कहा गया था। अब अधिकारियों को हलफनामा दाखिल कर बताना होगा कि अवमानना की कार्यवाही क्यों न शुरू की जाए।

धारा 163 को लेकर कोर्ट ने मांगी जानकारी

सुप्रीम कोर्ट में गोपाल शंकरनारायणन ने कहा कि कोर्ट के बाहर धारा 163 लागू होने का बोर्ड लगा है। वकीलों को अंदर आने से रोका जा रहा है। एक वकील ने भी कहा कि प्रदर्शन नहीं करने के बावजूद उन्हें अंदर जाने से रोका गया।

सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट धारा 163 के तहत घोषित क्षेत्र में आता है। इस मामले में जानकारी लेकर जवाब देंगे।

इस पर जस्टिस बागची ने कहा कि कोर्ट चिंता बढ़ाना नहीं चाहती, लेकिन संवेदनशील सरकारी प्रतिष्ठानों के आसपास धारा 163 लागू होने और उसके वास्तविक इस्तेमाल के बीच अंतर पर ध्यान देना जरूरी है।

हिरासत की वजह बताने के लिए सरकार को देना होगा जवाब

कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि उन्हें शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने और संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत मिले अधिकारों का इस्तेमाल करने की अनुमति मिलनी चाहिए। उन्होंने कहा कि प्रदर्शन के लिए जगह तय है, लेकिन लोगों को वहां जाने नहीं दिया जा रहा। इस पर सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि प्रदर्शन की इजाजत के लिए आवेदन नहीं किया गया था।

जस्टिस बागची ने कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार है, लेकिन प्रदर्शन का तरीका पुलिस कानून के दायरे में होना चाहिए। कोर्ट इस मुद्दे पर सुनवाई करेगा कि पुलिस की पाबंदियां संविधान के अनुच्छेद 19(2) के अनुरूप किस हद तक हैं। सिब्बल ने कहा कि सार्वजनिक व्यवस्था की जरूरतों से बाहर जाकर कोई कानून प्रदर्शन के अधिकार का उल्लंघन नहीं कर सकता।

सिब्बल ने यह भी कहा कि पत्रकारों को काम करने से रोका जा रहा है। वहीं, वकील केके वेणुगोपाल ने बताया कि उनकी महिला जूनियर वकील को सुप्रीम कोर्ट आते समय जबरन बस में बैठाकर 12 किलोमीटर दूर ले जाया गया। उन्होंने कहा कि उन्हें हिरासत में लेने वाले व्यक्ति के पास बैज नहीं था।

मेनका गुरुस्वामी ने हिरासत में लिए गए लोगों की आधिकारिक संख्या जारी करने की मांग की। जस्टिस बागची ने कहा कि सरकार को हिरासत की परिस्थितियों, तरीके और उसके औचित्य पर जवाब देने के लिए समय देना होगा। सॉलिसिटर जनरल ने बुधवार तक का समय मांगा, लेकिन कोर्ट ने कहा कि मामले की सुनवाई मंगलवार को होगी।

शहर में लगे बैरिकेड्स की होगी समीक्षा

सुप्रीम कोर्ट ने शहरभर में इंटरनेट सेवा बहाल करने और वकीलों को उनके पेशेवर काम में बाधा नहीं पहुंचाने का निर्देश दिया। कोर्ट ने कहा कि सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़ी स्थिति पैदा होने तक मेट्रो सेवाएं सामान्य समय-सारणी के अनुसार चलती रहनी चाहिए और शहर में लोगों की आवाजाही बहाल की जानी चाहिए। साथ ही कोर्ट ने कहा कि शहर में लगे बैरिकेड्स की भी समीक्षा की जाएगी। जहां जरूरत हो, सिर्फ वहीं बैरिकेडिंग की जानी चाहिए।

सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने सुप्रीम कोर्ट परिसर के बाहर धारा 163 लागू होने पर सवाल उठाया। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि उन्हें इस बारे में जानकारी नहीं है। कोर्ट ने उन्हें जानकारी हासिल करने को कहा।

सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन के अध्यक्ष ने कहा कि वकीलों को परिसर के बाहर धारा 163 लागू होने की सूचना नहीं दी गई थी। वकीलों को उनके चैंबर से हिरासत में लिया गया था। इस पर जस्टिस बागची ने कहा कि अगर इसकी सूचना नहीं दी गई थी, तो यह धारा 163 के आदेश को रद्द करने का ठोस आधार हो सकता है।

वकील गोपाल शंकरनारायणन ने भगवान दास रोड पर धारा 163 लागू होने का बोर्ड दिखाने की बात कही। उन्होंने बताया कि सुप्रीम कोर्ट के बाहर बैरिकेड लगे हैं और हाई कोर्ट तक पहुंचने पर भी पाबंदी है।

कपिल सिब्बल ने अंतरिम आदेश की मांग करते हुए कहा कि दिल्ली आने वाली सभी ट्रेनें अपने मूल स्टेशन से चलनी चाहिए। उन्होंने यह भी मांग की कि जंतर-मंतर से 4 किलोमीटर के दायरे के बाहर धारा 163 लागू न हो और उस दायरे से बाहर किसी को हिरासत में न लिया जाए।

45 मेट्रो स्टेशनों पर पाबंदी क्यों लगी? सुप्रीम कोर्ट ने DMRC से मांगा नक्शा

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से सभी याचिकाओं पर जवाब दाखिल करने को कहा। कोर्ट ने निर्देश दिया कि मेट्रो सेवाएं सामान्य समय-सारणी के अनुसार चलेंगी। साथ ही, शहरभर में लगाए गए बैरिकेड हटाने और इंटरनेट बंद नहीं करने का निर्देश दिया।

जस्टिस बागची ने DMRC से उन मेट्रो स्टेशनों का नक्शा देने को कहा, जहां एंट्री और एग्जिट बंद या सीमित किए गए थे। कोर्ट ने पूछा कि शुरुआत में 57 स्टेशन बंद करने का प्रस्ताव था, फिर 45 स्टेशनों पर पाबंदी क्यों लगाई गई। कोर्ट ने कहा कि उसे यह समझना है कि किन स्टेशनों को बंद किया गया और किन्हें खुला रखा गया, ताकि यात्रियों की आवाजाही पर पड़े असर का आकलन हो सके।

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बताया कि सभी मेट्रो स्टेशन पिछली रात 10 बजे तक खोल दिए गए थे। कोर्ट ने रेलवे को कोई एडवाइजरी भेजे जाने के बारे में भी सवाल किया। मेहता ने इंटरनेट बहाल होने की जानकारी दी।

सॉलिसिटर जनरल बोले- मेट्रो सेवाओं में कटौती नहीं हुई

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि दिल्ली मेट्रो के 303 स्टेशनों में से 45 पर ही एंट्री और एग्जिट सीमित किया गया था। इन स्टेशनों के आसपास के स्टेशन खुले थे। सामान्य समय-सारणी के मुताबिक 7,981 ट्रेन ट्रिप चलीं।

तुषार मेहता ने कहा कि लोगों को दोपहर करीब 2 बजे प्रदर्शन स्थल से हटाया गया और शाम 6 बजे तक रिहा कर दिया गया। उन्होंने दलील दी कि ऐसे में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका की जरूरत नहीं है। कार्रवाई की वैधता पर फैसला कोर्ट को करना है। उन्होंने मामले में जवाब दाखिल करने की बात कही।

मेनका गुरुस्वामी ने गृह सचिव, पुलिस और DMRC के खिलाफ अवमानना की मांग करते हुए मेट्रो और ट्रेन सेवाएं बहाल करने की अपील की। उन्होंने सवाल उठाया कि आदेश का पालन नहीं करने वालों को जवाब देने के लिए मंगलवार तक का समय क्यों दिया जा रहा है? सुप्रीम कोर्ट परिसर के बाहर धारा 163 क्यों लागू है? जस्टिस बागची ने कहा कि सॉलिसिटर जनरल की दलीलें कोर्ट के आदेशों के अधीन होंगी।

सुप्रीम कोर्ट ने पूछा- क्या हिरासत को अवैध घोषित करने की मांग पर्याप्त होगी?

वकील मेनका गुरुस्वामी ने कहा कि मेट्रो बंद करने और ट्रेनें रोकने से लोगों के आने-जाने के अधिकार का उल्लंघन हुआ है। उन्होंने दावा किया कि करीब 7,000 लोगों को हिरासत में लिया गया और 45 हिरासत केंद्र बनाए गए।

मेनका गुरुस्वामी ने कहा कि यह याचिका किसी एक नेता या सांसद की हिरासत के लिए नहीं, बल्कि संविधान के अधिकारों की रक्षा के लिए है। उन्होंने आपातकाल का जिक्र करते हुए सवाल उठाया कि क्या यह अघोषित आपातकाल जैसी स्थिति है। उन्होंने कहा कि पिछली बार इस तरह अधिकारों के निलंबन की स्थिति आपातकाल के दौरान आई थी, जब सुप्रीम कोर्ट ने एडीएम जबलपुर मामले में फैसला दिया था।

सुप्रीम कोर्ट ने मेनका गुरुस्वामी से बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका की मांग पर दोबारा विचार करने को कहा। कोर्ट ने पूछा कि क्या हिरासत को अवैध घोषित करने की मांग पर्याप्त होगी। मेनका ने जवाब दिया कि याचिका दाखिल करते समय इंटरनेट बंद होने के कारण हिरासत में लिए गए नेताओं, पत्रकारों, वकीलों और आम नागरिकों की सही संख्या उपलब्ध नहीं थी।

जस्टिस बागची ने कहा कि कोर्ट अपने पिछले आदेश के अंतिम पैराग्राफ पर ध्यान दे रहा है, जिसमें मंगलवार तक अनुपालन रिपोर्ट मांगी गई थी। कोर्ट राज्य सरकार और जिन लोगों पर आदेश की अवमानना का आरोप है, उनसे जवाब दाखिल करने को कहेगा।

कार्रवाई पर सरकार से जवाब मांगा जाएगा

वकील शोएब आलम ने कहा कि लोगों को उनके घरों से हिरासत में लिया गया और ट्रेनों से उतारा गया। उन्होंने दावा किया कि धारा 163 के दायरे से बाहर के इलाकों में जाने वाले लोगों को भी हिरासत में लिया गया। उन्होंने कहा कि तीन पूर्व मुख्यमंत्री, विपक्षी दलों के नेता और 6,000 से ज्यादा लोग हिरासत में लिए गए हैं।

जस्टिस बागची ने कहा कि कोर्ट हिरासत में लिए गए लोगों की बड़ी संख्या और मामले की गंभीरता को समझता है। सरकार से इस पर जवाब मांगा जाएगा।

पुलिस अधिकारियों पर हमले से जुड़ी याचिका पर जस्टिस बागची ने कहा कि अगर किसी पुलिसकर्मी को व्यक्तिगत रूप से नुकसान पहुंचा है, तो वह अलग से याचिका दायर कर सकता है। पुलिसकर्मी, वकील या आम नागरिक, सभी के अधिकारों की रक्षा करना कोर्ट की समान जिम्मेदारी है।

पूर्व पुलिस कमिश्नर की ओर से भी हस्तक्षेप याचिका दायर की गई। कोर्ट ने कहा कि सभी हस्तक्षेप याचिकाओं पर विचार किया जाएगा, लेकिन पहले सूचीबद्ध मामलों और हिरासत से जुड़े मामलों पर सुनवाई होगी।

सुनवाई के दौरान वकीलों ने की नारेबाजी

सुप्रीम कोर्ट में वकील सुमिता हजारिका ने बताया कि करीब 150 वकील सेतलवाड़ ब्लॉक के बाहर खड़े थे। जब वे वहां से चलने लगे तो पुलिस ने उन्हें हिरासत में लेना शुरू कर दिया। उन्होंने एक महिला पुलिसकर्मी से बैज या नाम दिखाने को कहा, लेकिन आरोप है कि पुलिसकर्मी ने कोई जवाब नहीं दिया और उन्हें घसीटकर पुलिस वैन में बैठा दिया।

वकील कीर्ति उप्पल ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसलों या कार्रवाई के खिलाफ ट्वीट करना भी अवमानना का मामला बन सकता है। उन्होंने कहा कि वकीलों की जिम्मेदारी न्यायपालिका की संस्था की रक्षा करना है। इस दौरान कुछ वकीलों ने विरोध में ‘शेम-शेम’ के नारे लगाए, जिस पर कोर्ट ने सभी वकीलों को शांत रहने के लिए कहा।

जस्टिस बागची ने कहा कि याचिकाओं में सभी मुद्दों को विस्तार से उठाया गया है। कोर्ट पूरे मामले को सुनेगा। वहीं, परिवहन संघ की ओर से भी दलील दी गई कि प्रतिबंधों के कारण कारोबार करने का अधिकार प्रभावित हुआ है।

वकीलों ने पुलिस कार्रवाई पर उठाए सवाल

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने अलग-अलग याचिकाओं और आवेदनों का जिक्र किया। इनमें एमए बेबी, मेनका गुरुस्वामी, मनोज झा और अमन शर्मा की याचिकाएं शामिल हैं। सॉलिसिटर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (SCAORA) ने भी वकीलों के साथ कथित मारपीट के मामले में याचिका दायर की है।

एडवोकेट शादान फरासत ने अदालत को बताया कि प्रदर्शन के दौरान उनके साथ भी मारपीट की गई। उन्होंने कहा कि उन्हें चलती बस में फेंक दिया गया। वह अकेले नहीं हैं, बल्कि कई अन्य लोगों के साथ भी ऐसा व्यवहार किया गया। उस दिन हालात दमनकारी थे। लोगों के विरोध करने के अधिकार को खत्म कर दिया गया।

दिल्ली हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष हरिहरन ने भी कहा कि प्रदर्शन के दौरान प्रैक्टिस करने वाले वकीलों के साथ मारपीट की गई। उन्होंने इस संबंध में तस्वीरें पेश करने की कोशिश की। हालांकि, कोर्ट ने कहा कि तस्वीरें सीधे बार के जरिए न दी जाएं। उन्हें संबंधित आवेदन के साथ रिकॉर्ड पर रखा जाए।

वरिष्ठ वकील गोपाल शंकरनारायणन ने कहा कि एडवोकेट दिनेश द्विवेदी, शादान फरासत और उत्तरा बब्बर को जंतर-मंतर के प्रतिबंधित क्षेत्र से काफी दूर हिरासत में लिया गया था। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि सुप्रीम कोर्ट परिसर के बाहर धारा 163 लागू की गई। उन्होंने शांतिपूर्वक जा रहे लोगों को हिरासत में लेने की जरूरत पर सवाल उठाया और आवाजाही पर लगे प्रतिबंध तुरंत हटाने की मांग की।

अधिवक्ता संजय हेगड़े ने कहा कि न्याय तक पहुंचने के अधिकार में वकीलों तक पहुंच भी शामिल है। उन्होंने आरोप लगाया कि हिरासत में लिए गए लोगों से मिलने गए वकीलों को भी रोका गया और उनके साथ मारपीट की गई। उन्होंने मैदान गढ़ी की संजय कॉलोनी पुलिस चौकी में वकीलों को कथित तौर पर हिरासत में लेने और पीटने का मामला भी उठाया।

वकीलों ने कहा कि इंटरनेट बंद होने के कारण निचली अदालतों और ट्रिब्यूनल में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए होने वाला काम प्रभावित हुआ। उन्होंने आरोप लगाया कि इंटरनेट सेवाएं जंतर-मंतर के चार किलोमीटर के दायरे से बाहर भी बंद की गईं। कुछ वकीलों ने अपने चैंबर से हिरासत में लिए जाने का मुद्दा भी उठाया।

सुनवाई के दौरान कुछ वकीलों ने नाराजगी जताते हुए नारे लगाए। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने सभी से शांत रहने और अनुशासन बनाए रखने को कहा। कोर्ट ने वकीलों से प्रदर्शन के दौरान हुई घटनाओं के वीडियो और स्क्रीनशॉट संबंधित आवेदनों के साथ रिकॉर्ड पर रखने को कहा।

जस्टिस बागची बोले- सभी को एक-एक कर सुनेंगे

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई शुरू होते ही जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने कहा कि अदालत के सामने दो मामले हैं। हालांकि, कुछ वकील ऐसे मामलों का भी उल्लेख करना चाहते हैं, जो सुनवाई की सूची में शामिल नहीं हैं। इस पर अदालत ने कहा कि सभी वकीलों को एक-एक करके सुना जाएगा। पहले मौखिक रूप से मामलों का उल्लेख सुना जाएगा और उसके बाद सूचीबद्ध मामलों पर सुनवाई होगी।

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि अगर वकील सिर्फ मामले का उल्लेख करने और उसे सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का अनुरोध कर रहे हैं, तो उन्हें कोई आपत्ति नहीं है। जस्टिस बागची ने कहा कि यह असाधारण और जरूरी सुनवाई है। इस दौरान वकीलों ने सुझाव दिया कि वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल और केके वेणुगोपाल को पहले अपनी बात रखने दी जाए। अदालत ने कहा कि केके वेणुगोपाल पहले बोलेंगे। जस्टिस बागची ने कहा कि अदालत में उनके जैसे वरिष्ठ और सम्मानित वकील मौजूद हैं, इसलिए उन्हें पहले सुना जाएगा।

जस्टिस बागची ने कहा कि अदालत के सामने दो विकल्प हैं। पहला, अवमानना याचिका पर सोमवार को सुनवाई की जाए। दूसरा, दोनों पक्षों को सुनकर सभी संबंधित मामलों को एक साथ जोड़ दिया जाए। केके वेणुगोपाल ने अदालत से पूछा कि क्या इस मामले में नोटिस जारी किया जाएगा। इस पर जस्टिस बागची ने कहा कि सॉलिसिटर जनरल को सुनने के बाद इस बारे में फैसला लिया जाएगा।

कपिल सिब्बल ने कहा कि एक याचिका अवमानना के मुद्दे से कहीं बड़े सवाल उठाती है। अदालत ने बताया कि मेनका गुरुस्वामी की ओर से हिरासत के खिलाफ बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की गई है। इसके अलावा एक दूसरी याचिका भी है। अदालत ने सॉलिसिटर जनरल से कहा कि उन्हें अपना पक्ष रखने का पर्याप्त मौका दिया जाएगा।

सुनवाई के दौरान कपिल सिब्बल ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 163 लागू करने और प्रतिबंधित क्षेत्र से बाहर लोगों को हिरासत में लिए जाने का मुद्दा उठाया। उन्होंने आरोप लगाया कि चार किलोमीटर के दायरे से बाहर भी लोगों को हिरासत में लिया जा रहा है। कुछ लोगों को ट्रेनों से भी उठाए जाने का दावा किया गया। सिब्बल ने दिल्ली मेट्रो बंद करने का मुद्दा भी उठाया। इस पर अदालत ने कहा कि एमए बेबी की याचिका में मेट्रो बंद करने से जुड़ा एक अंतरिम आवेदन पहले से मौजूद है।

वकीलों ने बिना आदेश सार्वजनिक किए इंटरनेट सेवाएं बंद करने का मुद्दा भी उठाया। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह माहौल को तनावपूर्ण नहीं बनाना चाहता। अदालत ने कहा कि वह जानती है कि इन घटनाओं से वकीलों को गहरी तकलीफ पहुंची है और वह किसी भी मुद्दे को छोटा करके नहीं देखना चाहती। सुनवाई के दौरान कपिल सिब्बल ने इस असाधारण सुनवाई के लिए अदालत का धन्यवाद किया। जस्टिस बागची ने जवाब दिया कि अदालत हमेशा देश की सेवा के लिए तैयार है।

प्रदर्शन के बाद सुप्रीम कोर्ट में चार से अधिक याचिकाएं

दरअसल, दिल्ली में 10 अक्टूबर को हुए प्रदर्शन के बाद सुप्रीम कोर्ट में चार से अधिक याचिकाएं दायर की गई हैं। इनमें नेताओं, वकीलों और आम लोगों को गैरकानूनी तरीके से हिरासत में लेने का मुद्दा उठाया गया है। पुलिस की कार्रवाई और प्रदर्शन के दौरान वकीलों के साथ मारपीट पर भी सवाल उठाए गए हैं।

वरिष्ठ वकील मेनका गुरुस्वामी ने राजनीतिक नेताओं और वकीलों की कथित गैरकानूनी हिरासत का मुद्दा उठाया है। वहीं, मनोज कुमार झा की याचिका में बड़े पैमाने पर हिरासत और पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाए गए हैं। इसमें आरोप लगाया गया है कि कुछ नेताओं को उनके घरों से बाहर निकलने से भी रोका गया।

वकील अमन प्रसाद ने भी वकीलों और मीडियाकर्मियों के साथ मारपीट और हिरासत का मामला उठाया है। उनकी याचिका में प्रदर्शन स्थल से दूर के इलाकों में आम लोगों को हिरासत में लेने का आरोप भी शामिल है।

मेट्रो स्टेशन बंद करने का मामला भी पहुंचा कोर्ट

वकील शैलेंद्र मणि त्रिपाठी ने दिल्ली मेट्रो के स्टेशन बंद करने के मामले में अवमानना याचिका दायर की थी। इसमें सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का उल्लंघन करने का आरोप लगाया गया है। याचिकाकर्ता का कहना है कि कोर्ट के निर्देश के बावजूद कई मेट्रो स्टेशनों के गेट बंद रखे गए।

इससे पहले 9 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि सुरक्षा के नाम पर सार्वजनिक परिवहन को पूरी तरह बंद नहीं किया जाना चाहिए। प्रशासन व्यवस्था को नियंत्रित कर सकता है, लेकिन आम यात्रियों, छात्रों और कामगारों की आवाजाही बाधित नहीं होनी चाहिए।

इस मामले में परिवहन से जुड़े एक संगठन ने भी सड़कें बंद होने से परिवहन सेवाओं और कारोबार पर असर पड़ने का मुद्दा उठाया है। फिलहाल सुनवाई के दौरान वकीलों ने पुलिस की कार्रवाई और कोर्टरूम में हुई व्यवस्थाओं को लेकर आपत्तियां दर्ज कराई हैं।

Written & Edit by : Chandan Patel

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By Chandan Patel

चंदन पटेल AVN News से लंबे समय से जुड़े पत्रकार हैं। उन्होंने वर्ष 2020 से रिपोर्टर के रूप में पत्रकारिता की शुरुआत की और जमीनी स्तर की खबरों को प्रमुखता से उठाते हुए लगातार अपनी पहचान बनाई। वर्तमान में वे AVN News के एडिटर-इन-चीफ के रूप में समाचार संपादन, कवरेज और डिजिटल पत्रकारिता का नेतृत्व कर रहे हैं। राजनीति, खेल,स्थानीय मुद्दों, जनसमस्याओं, प्रशासनिक गतिविधियों और सामाजिक सरोकारों से जुड़ी खबरों को तथ्यपरक और सरल भाषा में पाठकों तक पहुंचाना उनकी पत्रकारिता की प्रमुख विशेषता है। उनका उद्देश्य आम लोगों की आवाज को प्रमुखता देना और विश्वसनीय खबरों के माध्यम से समाज को जागरूक करना है।

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