Karwa Chauth 2026: करवाचौथ हिंदू धर्म का एक खास त्योहार है, जिसका नाम सुनते ही सज-संवरकर चांद का इंतजार करती महिलाओं की तस्वीर सामने आ जाती है। इस दिन विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र, अच्छी सेहत और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना करते हुए व्रत रखती हैं। शाम को पूजा करने के बाद चांद के दर्शन किए जाते हैं और फिर व्रत खोला जाता है।

लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर करवाचौथ मनाने की शुरुआत कैसे हुई? इस दिन मिट्टी के करवे का इस्तेमाल क्यों किया जाता है? महिलाएं छलनी से चांद देखने के बाद अपने पति का चेहरा क्यों देखती हैं? इस व्रत का महाभारत और सावित्री-सत्यवान की कथा से क्या संबंध है?

करवाचौथ केवल एक दिन भूखे-प्यासे रहने का त्योहार नहीं है, बल्कि यह प्रेम, विश्वास, समर्पण, पारिवारिक रिश्तों और भारतीय लोक परंपराओं से भी जुड़ा हुआ है। आइए जानते हैं करवाचौथ का इतिहास, धार्मिक महत्व, प्रचलित व्रत कथा और इससे जुड़ी कुछ ऐसी कहानियां, जिनके बारे में बहुत कम चर्चा होती है।

करवाचौथ 2026 कब है?

साल 2026 में करवाचौथ का त्योहार गुरुवार, 29 अक्टूबर 2026 को मनाया जा रहा है। यह पर्व कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है। उत्तर भारत में इसे करवाचौथ के नाम से जाना जाता है, जबकि धार्मिक परंपराओं में इसे करक चतुर्थी भी कहा जाता है।

इस दिन महिलाएं सुबह सरगी खाने के बाद व्रत शुरू करती हैं। इसके बाद दिनभर व्रत रखकर शाम को भगवान शिव, माता पार्वती, भगवान गणेश और चंद्रमा की पूजा करती हैं। चांद के दर्शन और पूजा के बाद व्रत खोलने की परंपरा है।

करवाचौथ क्यों मनाया जाता है?

करवाचौथ मनाने के पीछे धार्मिक मान्यताएं, लोककथाएं और सामाजिक परंपराएं जुड़ी हुई हैं।

पारंपरिक मान्यता के अनुसार, विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और परिवार की खुशहाली के लिए यह व्रत रखती हैं। माना जाता है कि सच्चे मन से की गई पूजा और प्रार्थना से वैवाहिक जीवन में सुख-शांति बनी रहती है।

पुराने समय में जब कई पुरुष कामकाज, व्यापार या सैनिक अभियानों के लिए लंबे समय तक घर से दूर रहते थे, तब उनकी सुरक्षित वापसी की कामना भी इस तरह की प्रार्थनाओं से जुड़ी मानी जाती थी। हालांकि, करवाचौथ की शुरुआत कब और किस घटना से हुई, इसका कोई एक सर्वमान्य ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है।

समय के साथ यह त्योहार पति-पत्नी के रिश्ते, पारिवारिक मेल-मिलाप और महिलाओं की आपसी एकजुटता का प्रतीक बन गया।

आज कई पति भी अपनी पत्नी के साथ व्रत रखते हैं। इससे यह संदेश मिलता है कि रिश्ते की मजबूती केवल एक व्यक्ति के त्याग से नहीं, बल्कि दोनों के प्रेम, सम्मान और सहयोग से बनती है।

करवाचौथ का इतिहास क्या है?

करवाचौथ के इतिहास को समझने के लिए धार्मिक कथाओं और पुरानी सामाजिक परंपराओं, दोनों को देखना जरूरी है।

इतिहासकारों और सांस्कृतिक लेखों में इस त्योहार के विकास को लेकर अलग-अलग व्याख्याएं मिलती हैं। कुछ मान्यताएं इसे सैनिकों और दूर रहने वाले पतियों की सुरक्षा की कामना से जोड़ती हैं, जबकि कुछ लोक परंपराएं इसे विवाहित महिलाओं के आपसी संबंधों और कृषि जीवन से जोड़कर देखती हैं।

1. सैनिकों की सुरक्षा से जुड़ी मान्यता

एक प्रचलित व्याख्या के अनुसार, पुराने समय में उत्तर भारत के कई इलाकों से पुरुष सैनिक अभियानों पर जाते थे। उनकी पत्नियां उनकी सुरक्षा और सकुशल वापसी के लिए प्रार्थना करती थीं।

समय के साथ पति की लंबी उम्र और परिवार की खुशहाली के लिए रखे जाने वाले व्रतों की परंपरा मजबूत हुई। हालांकि, इसे करवाचौथ की निश्चित ऐतिहासिक शुरुआत मानने के लिए पर्याप्त प्रमाण नहीं हैं।

2. महिलाओं की दोस्ती और आपसी सहयोग की परंपरा

कुछ लोक मान्यताओं में करवाचौथ को विवाहित महिलाओं के बीच दोस्ती और सहयोग की परंपरा से भी जोड़ा जाता है।

पुराने समय में जब कोई नई दुल्हन अपने ससुराल जाती थी, तो उसके लिए नए परिवार और माहौल में घुलना-मिलना आसान नहीं होता था। ऐसी परंपराओं में महिलाएं एक-दूसरे से जुड़ती थीं और सुख-दुख में साथ देने का संकल्प लेती थीं।

इस तरह की मान्यताएं बताती हैं कि भारतीय त्योहारों का संबंध केवल धार्मिक अनुष्ठानों से नहीं, बल्कि सामाजिक रिश्तों से भी रहा है।

3. कृषि और मिट्टी के बर्तनों से संबंध

करवाचौथ का संबंध कृषि जीवन से जोड़ने वाली व्याख्याएं भी मिलती हैं। पुराने समय में मिट्टी के बर्तन अनाज और पानी रखने के काम आते थे। मिट्टी का करवा पूजा का महत्वपूर्ण हिस्सा बना।

हालांकि, कृषि परंपरा से इस त्योहार की शुरुआत होने की बात को भी एक संभावित सांस्कृतिक व्याख्या के रूप में देखना चाहिए, न कि पूरी तरह प्रमाणित इतिहास के रूप में।

करवाचौथ नाम कैसे पड़ा?

करवाचौथ दो शब्दों से मिलकर बना है – ‘करवा’ और ‘चौथ’।

करवा का अर्थ मिट्टी के उस बर्तन से है, जिसका इस्तेमाल परंपरागत रूप से पानी रखने और पूजा में किया जाता है। वहीं, चौथ का अर्थ चतुर्थी यानी चौथा दिन है।

यह त्योहार कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाता है। पूजा में करवे का इस्तेमाल करना इस पर्व की प्रमुख परंपराओं में शामिल है।

करवे में जल भरकर चंद्रमा को अर्घ्य देने की परंपरा भी प्रचलित है। अलग-अलग क्षेत्रों में पूजा की विधि और करवे की सजावट में कुछ अंतर देखने को मिलता है।

करवाचौथ की सबसे प्रसिद्ध कथा: वीरावती की कहानी

करवाचौथ पर सुनाई जाने वाली सबसे प्रसिद्ध कथाओं में रानी वीरावती की कहानी शामिल है। यह एक पारंपरिक धार्मिक कथा है, जिसे अलग-अलग क्षेत्रों में कुछ भिन्न रूपों में सुनाया जाता है।

सात भाइयों की इकलौती बहन थी वीरावती

कथा के अनुसार, वीरावती एक राजा की बेटी थी। वह अपने सात भाइयों की इकलौती बहन थी और सभी उससे बहुत प्यार करते थे।

विवाह के बाद वीरावती ने पहली बार करवाचौथ का व्रत रखा। सुबह से भूखी-प्यासी रहने के कारण शाम होते-होते उसकी हालत कमजोर होने लगी।

अपनी बहन को परेशान देखकर उसके भाइयों को दुख हुआ। वे चाहते थे कि उनकी बहन जल्द से जल्द कुछ खा-पी ले।

भाइयों ने चांद निकलने का झूठ बोला

कथा के मुताबिक, भाइयों ने एक पेड़ के पीछे आग जलाकर या रोशनी का ऐसा भ्रम पैदा करके वीरावती को बताया कि चांद निकल आया है।

भाइयों की बात पर विश्वास करके वीरावती ने चांद निकलने से पहले ही व्रत खोल लिया।

लेकिन इसके बाद कथा में दुखद मोड़ आता है। उसे अपने पति के साथ अनहोनी होने का समाचार मिलता है।

वीरावती की प्रार्थना से जुड़ी मान्यता

पति के बारे में ऐसी खबर सुनकर वीरावती दुखी हो गई। उसने अपनी भूल के लिए प्रायश्चित किया और पूरी श्रद्धा से देवी-देवताओं से प्रार्थना की।

कथा के अनुसार, उसकी भक्ति और तपस्या से प्रसन्न होकर देवी ने उसके पति को जीवनदान दिया।

इस कहानी से यह धार्मिक संदेश लिया जाता है कि व्रत में श्रद्धा, नियम और संकल्प का विशेष महत्व है।

ध्यान देने वाली बात यह है कि वीरावती की कहानी धार्मिक लोककथा है। इसे ऐतिहासिक घटना के रूप में प्रमाणित नहीं माना जाना चाहिए।

करवाचौथ की दूसरी कथा: करवा और मगरमच्छ की कहानी

करवाचौथ से जुड़ी एक दूसरी लोककथा में करवा नाम की एक पतिव्रता महिला का वर्णन मिलता है।

कहानी के अनुसार, एक दिन करवा का पति नदी में स्नान कर रहा था। तभी एक मगरमच्छ ने उसका पैर पकड़ लिया।

अपने पति को संकट में देखकर करवा ने भगवान से प्रार्थना की और यमराज से मगरमच्छ को दंड देने की मांग की।

कथा के अनुसार, करवा ने अपने पतिव्रत और साहस के बल पर अपने पति की रक्षा करने का संकल्प लिया। उसकी दृढ़ता से प्रसन्न होकर उसके पति को बचा लिया गया।

इस कहानी का मुख्य संदेश है कि संकट के समय साहस, प्रेम और अपने प्रियजनों के प्रति जिम्मेदारी बहुत मायने रखती है।

यह भी एक लोककथा है, जिसके अलग-अलग रूप प्रचलित हैं।

सावित्री और सत्यवान की कहानी का करवाचौथ से क्या संबंध है?

भारतीय धार्मिक परंपराओं में सावित्री और सत्यवान की कथा पत्नी के दृढ़ संकल्प और पति के प्रति प्रेम का महत्वपूर्ण उदाहरण मानी जाती है।

कथा के अनुसार, सावित्री को पहले ही पता था कि उसके पति सत्यवान की आयु सीमित है। इसके बावजूद उसने सत्यवान को अपने जीवनसाथी के रूप में चुना।

एक दिन भविष्यवाणी के अनुसार सत्यवान की मृत्यु हो गई। इसके बाद यमराज उनकी आत्मा को लेकर जाने लगे।

सावित्री ने हार नहीं मानी और यमराज के पीछे चलती रही। अपनी बुद्धिमत्ता, तर्क और दृढ़ निश्चय से उसने यमराज को प्रसन्न कर लिया।

अंततः सत्यवान के जीवन की रक्षा हुई।

इस कथा को अक्सर करवाचौथ जैसे व्रतों के भाव से जोड़कर देखा जाता है। हालांकि, सावित्री और सत्यवान की कथा तथा करवाचौथ की शुरुआत को एक ही घटना मानने के बजाय इन्हें भारतीय धार्मिक परंपरा में निष्ठा और संकल्प से जुड़ी अलग-अलग कथाओं के रूप में समझना बेहतर है।

महाभारत में भी मिलता है करवाचौथ जैसी परंपरा का उल्लेख?

महाभारत से जुड़ी एक प्रचलित कथा में अर्जुन, द्रौपदी और भगवान श्रीकृष्ण का प्रसंग सुनाया जाता है।

कथा के अनुसार, जब अर्जुन तपस्या के लिए दूर चले गए और लंबे समय तक वापस नहीं लौटे, तो द्रौपदी चिंतित हो गईं। उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण से सहायता मांगी।

कहा जाता है कि श्रीकृष्ण ने उन्हें व्रत और पूजा के माध्यम से अर्जुन की कुशलता के लिए प्रार्थना करने की सलाह दी। द्रौपदी ने उनकी सलाह मानी।

इस कथा को भी करवाचौथ की धार्मिक भावना से जोड़कर सुनाया जाता है। हालांकि, इसे करवाचौथ की वर्तमान परंपरा की ऐतिहासिक शुरुआत का निर्णायक प्रमाण नहीं समझना चाहिए।

इस कहानी का मूल भाव अपने प्रियजन की सुरक्षा के लिए प्रार्थना करना और कठिन समय में धैर्य बनाए रखना है।

करवाचौथ पर छलनी से चांद और पति का चेहरा क्यों देखते हैं?

करवाचौथ की सबसे खास परंपराओं में से एक है छलनी से चांद देखना और उसके बाद पति का चेहरा देखना।

इस रस्म को लेकर अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग मान्यताएं प्रचलित हैं।

एक मान्यता के अनुसार, चांद को देखने और अर्घ्य देने के बाद पति का चेहरा देखकर व्रत खोला जाता है। इसे पति की लंबी उम्र और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना से जोड़ा जाता है।

छलनी का इस्तेमाल इस रस्म को पारंपरिक और प्रतीकात्मक रूप देता है। कुछ लोक व्याख्याओं में इसे सम्मान और मर्यादा से भी जोड़ा जाता है।

हालांकि, छलनी से चांद देखने की परंपरा की शुरुआत कब हुई, इस बारे में कोई एक सर्वमान्य ऐतिहासिक व्याख्या नहीं है।

आज कई परिवारों में पति अपनी पत्नी को पानी पिलाकर और मिठाई खिलाकर व्रत खुलवाते हैं। यह पल कई दंपतियों के लिए भावनात्मक और यादगार होता है।

करवाचौथ में सरगी क्यों खाई जाती है?

सरगी करवाचौथ की सुबह से पहले खाया जाने वाला भोजन है। खासकर पंजाब और उत्तर भारत के कई इलाकों में इसकी परंपरा प्रचलित है।

परंपरागत रूप से सास अपनी बहू को सरगी देती हैं। इसमें फल, मिठाई, सूखे मेवे और दूसरी खाने-पीने की चीजें शामिल हो सकती हैं।

सरगी का उद्देश्य व्रत शुरू होने से पहले भोजन करना और दिनभर के लिए शरीर को ऊर्जा देना है।

यह परंपरा सास-बहू के रिश्ते में अपनापन और आशीर्वाद का प्रतीक भी मानी जाती है।

हालांकि, सरगी की सामग्री और समय परिवार तथा क्षेत्र के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं।

करवाचौथ से जुड़ी कुछ कम चर्चित बातें

करवाचौथ के बारे में ज्यादातर लोग यही जानते हैं कि इस दिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र के लिए व्रत रखती हैं। लेकिन इस त्योहार से जुड़ी कुछ और दिलचस्प बातें भी हैं।

1. करवाचौथ केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, सामाजिक उत्सव भी है

पहले के समय में महिलाएं समूह में बैठकर पूजा करती थीं, व्रत की कथा सुनती थीं और एक-दूसरे के साथ अपने अनुभव साझा करती थीं।

आज भी कई जगह महिलाएं एक साथ पूजा करती हैं, गीत गाती हैं और पारंपरिक रीति-रिवाज निभाती हैं।

इस तरह करवाचौथ महिलाओं के सामाजिक मेल-मिलाप का अवसर भी बन जाता है।

2. करवा बदलने की परंपरा भी प्रचलित रही है

कुछ क्षेत्रों में महिलाएं पूजा के दौरान करवा एक-दूसरे को देती या बदलती हैं। इस परंपरा में सामूहिक पूजा और आपसी जुड़ाव का भाव दिखाई देता है।

हालांकि, करवा बदलने की विधि हर जगह एक जैसी नहीं होती।

3. हर जगह करवाचौथ एक ही तरीके से नहीं मनाया जाता

पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, दिल्ली और उत्तर प्रदेश के कई इलाकों में करवाचौथ खास लोकप्रिय है।

लेकिन अलग-अलग राज्यों और समुदायों में पूजा की विधि, पहनावे, भोजन और लोकगीतों में अंतर देखने को मिलता है।

यानी करवाचौथ की मूल भावना समान हो सकती है, लेकिन इसे मनाने का तरीका स्थानीय संस्कृति के अनुसार बदलता रहता है।

4. अब पति भी रखने लगे हैं व्रत

बदलते समय के साथ कई परिवारों में पति भी अपनी पत्नी के साथ करवाचौथ का व्रत रखते हैं।

इससे त्योहार को आपसी प्रेम, समान जिम्मेदारी और एक-दूसरे की सेहत के लिए प्रार्थना करने के अवसर के रूप में भी देखा जाने लगा है।

यह बदलाव दिखाता है कि परंपराएं समय के साथ नए अर्थ भी अपना सकती हैं।

5. करवाचौथ का सबसे खास पल चांद का इंतजार माना जाता है

दिनभर पूजा और तैयारियों के बाद महिलाओं को चांद निकलने का इंतजार रहता है।

कई बार बादल या मौसम के कारण चांद दिखाई देने में देर हो जाती है। ऐसे में परिवार के लोग छत या खुले स्थान से चांद देखने की कोशिश करते हैं।

यह इंतजार करवाचौथ की परंपरा का एक भावनात्मक हिस्सा बन चुका है।

करवाचौथ का धार्मिक महत्व क्या है?

हिंदू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, करवाचौथ का व्रत पति की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य, वैवाहिक सुख और परिवार की खुशहाली की कामना के लिए रखा जाता है।

इस दिन माता पार्वती और भगवान शिव की पूजा को विशेष महत्व दिया जाता है। भगवान गणेश की पूजा भी कई परंपराओं में शामिल होती है।

चंद्रमा को अर्घ्य देना और उसके दर्शन के बाद व्रत खोलना इस पर्व का प्रमुख हिस्सा है।

धार्मिक दृष्टि से इस दिन का महत्व श्रद्धा, संकल्प और प्रार्थना से जुड़ा हुआ है।

वहीं, सामाजिक दृष्टि से यह पर्व पति-पत्नी के रिश्ते को समय देने, परिवार के साथ जुड़ने और पुरानी परंपराओं को आगे बढ़ाने का अवसर बनता है।

क्या करवाचौथ का व्रत केवल महिलाएं ही रख सकती हैं?

परंपरागत रूप से करवाचौथ का व्रत विवाहित महिलाएं रखती आई हैं। कई महिलाएं विवाह से पहले भी मनचाहा जीवनसाथी पाने की कामना से यह व्रत रखती हैं।

लेकिन आज कई पति भी अपनी पत्नी के साथ व्रत रखते हैं।

धार्मिक और पारिवारिक परंपराओं का पालन व्यक्ति की आस्था और परिस्थितियों पर निर्भर करता है। इसलिए करवाचौथ को केवल एक ही तरीके से मनाना जरूरी नहीं है।

इस त्योहार का एक महत्वपूर्ण संदेश यह भी है कि पति-पत्नी एक-दूसरे के प्रति प्रेम, सम्मान और जिम्मेदारी निभाएं।

करवाचौथ पर व्रत रखते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?

करवाचौथ में कई महिलाएं सूर्योदय से चंद्रोदय तक निर्जला व्रत रखती हैं। हालांकि, लंबे समय तक भोजन और पानी न लेना हर व्यक्ति के लिए सुरक्षित नहीं होता।

व्रत रखने से पहले कुछ बातों का ध्यान रखना उपयोगी है:

  • सरगी में अपनी क्षमता के अनुसार पौष्टिक भोजन लें।
  • व्रत शुरू होने से पहले पर्याप्त पानी पिएं।
  • यदि कमजोरी, चक्कर या बेहोशी जैसा महसूस हो, तो इसे नजरअंदाज न करें।
  • मधुमेह, किडनी की बीमारी, गर्भावस्था या नियमित दवा लेने की स्थिति में व्रत रखने से पहले डॉक्टर की सलाह लें।
  • अपनी सेहत को ध्यान में रखकर ही व्रत का तरीका तय करें।

धार्मिक आस्था के साथ-साथ स्वास्थ्य का ध्यान रखना भी जरूरी है। किसी भी परंपरा को निभाते समय अपनी शारीरिक स्थिति को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

करवाचौथ का बदलता स्वरूप: परंपरा से आधुनिक जीवन तक

पहले करवाचौथ का आयोजन मुख्य रूप से घर और परिवार तक सीमित रहता था। महिलाएं पारंपरिक कपड़े पहनती थीं, पूजा करती थीं और परिवार की बुजुर्ग महिलाओं से कथा सुनती थीं।

आज इस त्योहार का स्वरूप काफी बदल गया है।

सोशल मीडिया पर करवाचौथ की तस्वीरें, वीडियो, शुभकामना संदेश और मेहंदी के डिजाइन खूब साझा किए जाते हैं। बाजारों में कपड़े, गहने, सजावटी करवे और पूजा सामग्री की मांग बढ़ जाती है।

कई परिवार इसे पारंपरिक तरीके से मनाते हैं, जबकि कुछ परिवार अपनी सुविधा और पसंद के अनुसार रस्मों में बदलाव करते हैं।

इसके बावजूद करवाचौथ की मूल भावना प्रेम, विश्वास, साथ और एक-दूसरे की खुशहाली की कामना से जुड़ी रहती है।

क्या करवाचौथ का मतलब सिर्फ पति की लंबी उम्र के लिए व्रत रखना है?

करवाचौथ को पारंपरिक रूप से पति की लंबी उम्र और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना से जोड़ा जाता है। लेकिन आज कई लोग इसे पति-पत्नी के आपसी प्रेम और साथ का प्रतीक भी मानते हैं।

किसी भी रिश्ते की मजबूती केवल व्रत या रस्मों से नहीं आती। इसके लिए आपसी सम्मान, भरोसा, बातचीत, जिम्मेदारी और एक-दूसरे की भावनाओं को समझना भी जरूरी है।

इसलिए करवाचौथ का संदेश सिर्फ पूजा तक सीमित नहीं होना चाहिए। यह दिन पति-पत्नी को अपने रिश्ते की अहमियत समझने और एक-दूसरे के प्रति आभार जताने का अवसर भी दे सकता है।

करवाचौथ प्रेम, आस्था और विश्वास का त्योहार

करवाचौथ भारतीय संस्कृति का एक ऐसा त्योहार है, जिसमें धार्मिक आस्था, लोककथाएं, पारिवारिक परंपराएं और भावनाएं एक साथ दिखाई देती हैं।

वीरावती की कथा हो, करवा और मगरमच्छ की कहानी हो या सावित्री और सत्यवान का प्रसंग – इन कहानियों में संकल्प, साहस, प्रेम और अपने प्रियजनों के लिए खड़े रहने का संदेश मिलता है।

हालांकि, इन सभी कथाओं को प्रमाणित इतिहास के बजाय धार्मिक और लोक परंपराओं के रूप में समझना चाहिए।

समय के साथ करवाचौथ मनाने के तरीके बदले हैं, लेकिन इसका भावनात्मक महत्व आज भी बना हुआ है।

आखिरकार, किसी भी रिश्ते की असली ताकत केवल रस्मों में नहीं, बल्कि उस प्रेम, विश्वास, सम्मान और साथ में होती है, जिसे पति-पत्नी हर दिन अपने व्यवहार से निभाते हैं।

Written & Edit by : Chandan Patel

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By Chandan Patel

चंदन पटेल AVN News से लंबे समय से जुड़े पत्रकार हैं। उन्होंने वर्ष 2020 से रिपोर्टर के रूप में पत्रकारिता की शुरुआत की और जमीनी स्तर की खबरों को प्रमुखता से उठाते हुए लगातार अपनी पहचान बनाई। वर्तमान में वे AVN News के एडिटर-इन-चीफ के रूप में समाचार संपादन, कवरेज और डिजिटल पत्रकारिता का नेतृत्व कर रहे हैं। राजनीति, खेल,स्थानीय मुद्दों, जनसमस्याओं, प्रशासनिक गतिविधियों और सामाजिक सरोकारों से जुड़ी खबरों को तथ्यपरक और सरल भाषा में पाठकों तक पहुंचाना उनकी पत्रकारिता की प्रमुख विशेषता है। उनका उद्देश्य आम लोगों की आवाज को प्रमुखता देना और विश्वसनीय खबरों के माध्यम से समाज को जागरूक करना है।

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