देवरिया/प्रयागराज। जिस सीसीटीवी कैमरे की रिकॉर्डिंग पुलिस थाने के भीतर की गतिविधियों का सबसे अहम सबूत हो सकती थी, वही रिकॉर्डिंग कथित अवैध हिरासत के मामले में गायब मिली। ऊपर से कैमरा खराब होने का दावा किया गया, लेकिन उसकी खराबी की कोई प्रविष्टि सामान्य डायरी में तक नहीं की गई। इस पूरे मामले पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पुलिस अधिकारियों को कड़े सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया।
देवरिया के गौरी बाजार थाने में चार लोगों को कथित तौर पर अवैध हिरासत में रखे जाने के मामले की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति दिवेश चंद्र सामंत की पीठ ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर नाराजगी जताई। अदालत ने व्यक्तिगत रूप से पेश हुए देवरिया के पुलिस अधीक्षक और थाना प्रभारी से सीसीटीवी रिकॉर्डिंग, उसकी खराबी और पुलिस कार्रवाई को लेकर जवाब मांगा।
10 दिन तक अवैध हिरासत में रखने का आरोप
मामला चार लोगों की ओर से दाखिल बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका से जुड़ा है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि चारों लोगों को देवरिया के गौरी बाजार थाने में कथित रूप से अवैध तरीके से हिरासत में रखा गया है।
आरोप के मुताबिक, कुछ याचिकाकर्ताओं को करीब 10 दिन तक और अन्य को अलग-अलग अवधि के लिए 13 अप्रैल से 24 अप्रैल 2026 के बीच हिरासत में रखा गया था।
इन आरोपों की सच्चाई सामने लाने के लिए हाईकोर्ट ने पहले थाने के अंदर की सीसीटीवी रिकॉर्डिंग अदालत में पेश करने का निर्देश दिया था। लेकिन रिकॉर्डिंग उपलब्ध नहीं होने के बाद मामला और गंभीर हो गया।
‘अगर 14 अप्रैल से कैमरा चल रहा था तो रिकॉर्डिंग कहां है?’
सुनवाई के दौरान अदालत ने एसएचओ से सीसीटीवी रिकॉर्डिंग को लेकर सीधे सवाल किए। पीठ ने पूछा कि अगर 14 अप्रैल से कैमरा काम कर रहा था तो उसकी रिकॉर्डिंग कहां है।
अदालत ने यह भी सवाल किया कि जब एसएचओ करीब दो महीने तक थाने के प्रभारी रहे, तो सीसीटीवी रिकॉर्डिंग का रखरखाव और उसकी सुरक्षा क्यों नहीं सुनिश्चित की गई।
एसएचओ की ओर से बताया गया कि 12 अप्रैल 2026 को सीसीटीवी व्यवस्था में खराबी आ गई थी। इस पर अदालत ने पूछा कि खराबी की मरम्मत के लिए क्या कदम उठाए गए और क्या इसकी जानकारी सामान्य डायरी यानी जीडी में दर्ज की गई थी।
एसएचओ ने अदालत को बताया कि इस संबंध में कोई जीडी प्रविष्टि नहीं की गई थी।
जीडी में एंट्री तक नहीं, पुलिस के दावे पर कोर्ट नाराज
सीसीटीवी खराब होने की बात सामने आने के बाद अदालत का अगला सवाल पुलिस की सामान्य डायरी को लेकर था। अदालत यह जानना चाहती थी कि अगर वास्तव में सीसीटीवी सिस्टम खराब हुआ था तो पुलिस रिकॉर्ड में इसकी जानकारी क्यों नहीं दर्ज की गई।
जब एसएचओ ने स्वीकार किया कि इस संबंध में कोई जीडी एंट्री नहीं की गई, तो अदालत ने पुलिस के स्पष्टीकरण पर गंभीर सवाल उठाए।
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन ने अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर तीखी मौखिक टिप्पणी भी की कहा ‘झूठ बोलने वालों का झुंड’ और पुलिस के जवाबों पर कड़ा असंतोष जताया।

एसपी से कहा- अदालत से नहीं, जनता से माफी मांगिए
सुनवाई के दौरान देवरिया के पुलिस अधीक्षक ने अदालत से माफी मांगी। इस पर न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन ने कहा कि अदालत से माफी मांगने के बजाय जनता से माफी मांगिए।
पीठ ने एसपी से यह भी पूछा कि थाने की सीसीटीवी व्यवस्था में कथित लापरवाही सामने आने के बाद संबंधित एसएचओ के खिलाफ क्या कार्रवाई की गई।
अदालत ने पूछा कि क्या एसएचओ को निलंबित किया गया है या सेवा से बर्खास्त किया गया है।
एसपी ने बताया कि संबंधित एसएचओ को अपराध शाखा भेज दिया गया है। हालांकि, अदालत इस कार्रवाई से संतुष्ट नजर नहीं आई।
‘जीडी में जांच तक नहीं कर सकता तो सेवा में क्यों?’
सुनवाई के दौरान अदालत ने पुलिस अधिकारियों की जवाबदेही को लेकर भी सख्त टिप्पणी की। न्यायमूर्ति श्रीधरन ने सवाल उठाया कि यदि थाना प्रभारी सामान्य डायरी में सीसीटीवी व्यवस्था की खराबी की जांच तक दर्ज नहीं कर सकता, तो ऐसे अधिकारी को सेवा में बनाए रखने का क्या औचित्य है।
अदालत की टिप्पणी से साफ था कि वह मामले में केवल सीसीटीवी रिकॉर्डिंग गायब होने को तकनीकी समस्या मानने के बजाय पुलिस अधिकारियों की जिम्मेदारी और जवाबदेही की भी जांच कर रही है।
एसपी को सीसीटीवी खराब होने की जानकारी क्यों नहीं दी गई?
अदालत ने देवरिया के एसपी से भी पूछा कि यदि थाने की सीसीटीवी व्यवस्था खराब थी तो उन्हें इसकी जानकारी क्यों नहीं दी गई।
एसपी ने अदालत को बताया कि उन्हें सीसीटीवी सिस्टम के खराब होने की जानकारी नहीं थी।
इस जवाब पर भी पीठ ने सवाल उठाया। अदालत ने पूछा कि थाना स्तर पर इतनी महत्वपूर्ण सुरक्षा व्यवस्था खराब होने के बावजूद वरिष्ठ अधिकारी को इसकी जानकारी क्यों नहीं दी गई और संबंधित अधिकारी के खिलाफ समय पर कार्रवाई क्यों नहीं की गई।
सीसीटीवी के लिए जारी हुए थे 46.46 लाख रुपये
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने जिले के थानों में सीसीटीवी व्यवस्था के लिए जारी धनराशि को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए।
अदालत के समक्ष बताया गया कि सीसीटीवी व्यवस्था के लिए 46.46 लाख रुपये जारी किए गए थे। इस पर पीठ ने पूछा कि जब सीसीटीवी का काम पूरी तरह पूरा नहीं हुआ था, तो संबंधित एजेंसी को पूरी राशि क्यों जारी कर दी गई।
अदालत ने इस बात पर भी नाराजगी जताई कि एजेंसी के खिलाफ कार्रवाई या उसे काली सूची में डालने के बजाय भुगतान कर दिया गया और केवल आश्वासन के आधार पर सरकारी धन जारी कर दिया गया।
हाईकोर्ट पहुंचने के बाद ही कार्रवाई का आरोप
दो सितंबर के आदेश में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने प्रथम दृष्टया इस बात पर सवाल उठाया था कि जिला अधिकारियों ने याचिका दाखिल होने और चार अगस्त के आदेश के बाद ही सीसीटीवी व्यवस्था को लेकर कार्रवाई शुरू की।
अदालत ने यह भी सवाल उठाया था कि सीसीटीवी व्यवस्था के लिए जारी धनराशि और उससे संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी हलफनामे में स्पष्ट रूपसेक्योंनहीं दी गई।
पीठ ने इसे महत्वपूर्ण और आवश्यक जानकारी माना था।
चारों याचिकाकर्ताओं को 65 हजार रुपये मुआवजा
मामले में हाईकोर्ट ने कथित अवैध हिरासत को गंभीरता से लेते हुए चारों याचिकाकर्ताओं को कुल 65 हजार रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया।
अदालत के आदेश के अनुसार, याचिकाकर्ता संख्या दो, तीन और चार को 20-20 हजार रुपये, जबकि याचिकाकर्ता संख्या एक को 5 हजार रुपये दिए जाएंगे।
खास बात यह है कि अदालत ने निर्देश दिया कि मुआवजे की राशि संबंधित एसएचओ के वेतन से वसूल की जाए।
सीसीटीवी व्यवस्था पर हाईकोर्ट की सख्ती से उठे बड़े सवाल
गौरी बाजार थाने का यह मामला केवल चार लोगों की कथित हिरासत तक सीमित नहीं है। सुनवाई के दौरान सीसीटीवी रिकॉर्डिंग, उसके रखरखाव, सामान्य डायरी में प्रविष्टि, वरिष्ठ अधिकारियों को सूचना और सरकारी धन के इस्तेमाल को लेकर अदालत के सवालों ने पुलिस व्यवस्था की जवाबदेही पर कई गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं।
हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणियों से यह संदेश भी स्पष्ट है कि थानों में लगे सीसीटीवी कैमरे केवल औपचारिकता नहीं हो सकते। पुलिस थानों में होने वाली गतिविधियों की निगरानी और रिकॉर्डिंग की जिम्मेदारी तय होना जरूरी है, खासकर तब जब किसी व्यक्ति की हिरासत या उसके साथ पुलिस व्यवहार पर गंभीर आरोप लगाए जाएं।
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Written & Edit by : Chandan Patel

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