गया /इमामगंज। एक तरफ देश-दुनिया विकास और आधुनिक सुविधाओं की बात कर रही है, दूसरी तरफ गया जिले का एक गांव आज भी बारिश आते ही बाकी दुनिया से कट जाने को मजबूर है। इमामगंज विधानसभा क्षेत्र का भगहर गांव इस बार फिर टापू बन गया है। नेपाल में आई बाढ़ और झारखंड में लगातार हो रही भारी बारिश के बाद नदियों का जलस्तर बढ़ा तो करीब 2 हजार की आबादी चारों तरफ पानी से घिर गई।
गांव तक पहुंचने का सुरक्षित रास्ता नहीं बचा है। मोरहर नदी का उफान ग्रामीणों की जिंदगी और मौत के बीच की दूरी बन गया है। जरूरी सामान लेने से लेकर बीमार को अस्पताल पहुंचाने तक लोगों को जान हथेली पर रखकर नदी पार करनी पड़ रही है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि 1976 से हर साल बाढ़ झेल रहे इस गांव को आज तक एक स्थायी पुल क्यों नहीं मिल सका? चुनावों के दौरान ग्रामीणों से विकास के वादे करने वाले जनप्रतिनिधियों और सत्ता में बैठे जिम्मेदार लोगों से अब ग्रामीण जवाब मांग रहे हैं।
10 दिनों से स्कूल बंद, बच्चों की पढ़ाई पर लगा ताला
बाढ़ का सबसे बड़ा असर गांव के बच्चों पर पड़ा है। ग्रामीणों के मुताबिक पिछले करीब 10 दिनों से स्कूल बंद है। शिक्षक भी गांव तक नहीं पहुंच पा रहे हैं।
इसका सीधा असर बच्चों की पढ़ाई पर पड़ रहा है। हर साल बारिश के मौसम में यही स्थिति बनने से ग्रामीण परिवारों को डर है कि उनके बच्चों की शिक्षा लगातार पिछड़ती जाएगी।
ग्रामीणों का सवाल है कि जब प्रशासन को हर साल पता रहता है कि भगहर पानी से घिर जाता है, तो बाढ़ के दिनों में वैकल्पिक शिक्षा और आवागमन की स्थायी व्यवस्था क्यों नहीं की गई?
बीमार भतीजी को खाट पर लादकर पार करनी पड़ी नदी
गांव के युवा अंदीप कुमार बताते हैं कि स्थिति बेहद गंभीर है। आने-जाने का कोई सुरक्षित साधन नहीं है। राशन और गैस की आपूर्ति प्रभावित है।
उनके मुताबिक उनकी भतीजी की तबीयत बिगड़ने पर उसे खाट पर लादकर उफनती मोरहर नदी पार कर इमामगंज ले जाना पड़ा। इसके बाद उसका इलाज संभव हो सका।
सोचिए, जिस गांव में एंबुलेंस पहुंचने का रास्ता नहीं हो और मरीज को खाट पर लादकर नदी पार करनी पड़े, वहां विकास के दावों की जमीनी हकीकत क्या होगी?
बेटी नदी में बहने लगी, ग्रामीणों ने बचाई जान
ग्रामीण अजय प्रसाद की कहानी इस संकट की भयावहता को और सामने रखती है।
उनकी बेटी बैंकें बाजार में एडमिशन कराने गई थी। लौटते समय मोरहर नदी का जलस्तर अचानक बढ़ गया और वह नदी के तेज बहाव में बहने लगी। ग्रामीणों ने किसी तरह उसकी जान बचाई।
अजय प्रसाद राजमिस्त्री का काम करते हैं। उनका कहना है कि रोजमर्रा की जरूरतों और रोजगार के लिए उन्हें इसी नदी को पार करना पड़ता है।
उनका दावा है कि 1976 से वह हर साल बाढ़ का यह दर्द देख रहे हैं, लेकिन आज तक पुल नहीं बना।
चार लोगों की नदी में मौत के बाद भी नहीं बदली तस्वीर
ग्रामीणों के अनुसार भगहर में एक ही परिवार के चार लोग पहले नदी में बह चुके हैं। इसके बावजूद स्थायी समाधान नहीं हुआ।
ग्रामीणों का कहना है कि पहले पूर्व विधानसभा अध्यक्ष उदय नारायण चौधरी की ओर से पुल निर्माण का आश्वासन दिया गया था, लेकिन वर्षों गुजरने के बाद भी पुल नहीं बन सका।
ऐसे में सवाल सिर्फ एक पुल का नहीं है। सवाल यह है कि कितनी मौतों और कितने हादसों के बाद सरकार किसी गांव की समस्या को गंभीर मानेगी?
गैस सिलेंडर नहीं पहुंच रहा, लकड़ी जलाकर खाना बनाने को मजबूर
ग्रामीण वीरेंद्र प्रसाद बताते हैं कि गांव चारों तरफ से पानी में घिर गया है। इस बार वह वैकल्पिक रास्ता भी बंद हो गया, जिससे किसी तरह लोग बाहर निकलते थे।
गांव में गैस सिलेंडर पहुंचना मुश्किल हो गया है। ऐसे में कई परिवारों को लकड़ी जलाकर खाना बनाना पड़ रहा है।
सब्जी, राशन और अन्य जरूरी सामान की आपूर्ति भी प्रभावित हुई है। बीमारी की स्थिति में लोगों को पानी पार करके बाहर जाना पड़ रहा है।
यह स्थिति किसी आपदा फिल्म का दृश्य नहीं, बल्कि आज भी एक गांव के लोगों की वास्तविक जिंदगी है।
हर साल चार महीने टापू बन जाता है भगहर
इमामगंज नगर पंचायत के अध्यक्ष प्रतिनिधि भवानी सिंह के मुताबिक भगहर गांव हर साल करीब चार महीने तक टापू जैसी स्थिति में रहता है।
नदी का जलस्तर बढ़ते ही शिक्षा, स्वास्थ्य और जरूरी सेवाएं प्रभावित हो जाती हैं। गैस सिलेंडर तक पहुंचाना मुश्किल हो जाता है।
उन्होंने बताया कि नगर पंचायत गैस एजेंसियों से संपर्क कर रही है और जरूरतमंद परिवारों को आर्थिक मदद देने की बात भी कही गई है।
लेकिन ग्रामीणों का साफ कहना है कि उन्हें हर साल थोड़ी-बहुत राहत नहीं, बल्कि स्थायी समाधान चाहिए।

सांसद से लेकर विधायक तक सवालों के घेरे में
ग्रामीण वीरेंद्र प्रसाद का आरोप है कि पिछले साल सांसद अभय कुशवाहा गांव आए थे और समस्या को लोकसभा में उठाने का भरोसा दिया था। ग्रामीणों का कहना है कि इसके बावजूद अब तक पुल का निर्माण नहीं हुआ।
वहीं ग्रामीणों ने वर्तमान विधायक दीपा मांझी के गांव नहीं आने का भी आरोप लगाया है। दीपा मांझी सिर्फ वोट के लिए गांव में आए थे।
यहां सबसे बड़ा सवाल राजनीतिक नहीं, मानवीय है – जब बारिश में पूरा गांव दुनिया से कट जाता है, तब जनप्रतिनिधियों की प्राथमिकता में भगहर क्यों नहीं आता?
जनप्रतिनिधियों के लिए यह महज एक गांव हो सकता है, लेकिन यहां रहने वाले करीब दो हजार लोगों के लिए यही उनका घर, उनकी जिंदगी और उनका भविष्य है।
अधिकारी बोले- पुल निर्माण ही स्थायी समाधान
इमामगंज नगर पंचायत के कार्यपालक पदाधिकारी आशुतोष रंजन पाण्डेय ने माना कि भगहर गांव की सबसे बड़ी जरूरत पुल है।
उन्होंने बताया कि मामले की जानकारी गया के जिलाधिकारी, आपदा विभाग, केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी, बिहार सरकार के मंत्री संतोष सुमन और विधायक दीपा मांझी को दी गई है। ग्रामीणों का ज्ञापन भी उच्च अधिकारियों तक भेजा गया है।
अधिकारी के मुताबिक गांव में स्वास्थ्य टीम लगाने की व्यवस्था की गई है। बच्चों की पढ़ाई प्रभावित न हो, इसके लिए शिक्षकों के गांव में ठहरने की व्यवस्था करने की कोशिश की जा रही है। गैस एजेंसियों से भी संपर्क किया जा रहा है।
आवागमन के लिए नाव की व्यवस्था कराने की मांग भी उच्च अधिकारियों से की जाएगी।
राहत से ज्यादा पुल की जरूरत
भगहर के ग्रामीणों की मांग बेहद स्पष्ट है – उन्हें सिर्फ बाढ़ के समय राहत नहीं चाहिए, उन्हें ऐसा रास्ता चाहिए जो पूरे साल गांव को बाकी दुनिया से जोड़े।
नाव, राशन, गैस और स्वास्थ्य टीम जैसी व्यवस्थाएं तत्काल राहत दे सकती हैं, लेकिन समस्या का स्थायी इलाज नहीं हैं।
स्थायी पुल बनने के बाद ही बच्चों की पढ़ाई नियमित होगी, मरीज समय पर अस्पताल पहुंच सकेंगे, किसानों और मजदूरों को आने-जाने में आसानी होगी और जरूरी सामान गांव तक आसानी से पहुंच सकेगा।
सवाल सत्ता से: हर बारिश में क्यों डूबती है जनता की उम्मीद?
भगहर की तस्वीर सरकार और जनप्रतिनिधियों के विकास के दावों पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
आजादी के दशकों बाद भी अगर किसी गांव के करीब 2 हजार लोगों को बारिश के दिनों में नदी पार करके अस्पताल जाना पड़े, बच्चे स्कूल नहीं जा पाएं और गैस-राशन तक पहुंचना मुश्किल हो जाए, तो इसे सिर्फ प्राकृतिक आपदा कहकर जिम्मेदारी से बचा नहीं जा सकता।
प्राकृतिक बारिश को सरकार रोक नहीं सकती, लेकिन बाढ़ के कारण किसी गांव का संपर्क हर साल टूटे, इसके लिए स्थायी पुल और बुनियादी ढांचा बनाना सरकार और प्रशासन की जिम्मेदारी जरूर है।
भगहर के लोग अब आश्वासन नहीं, काम चाहते हैं।
क्योंकि हर साल नदी का पानी उतर जाता है, लेकिन ग्रामीणों के मन में यह सवाल फिर भी रह जाता है – अगली बारिश में फिर यही जिंदगी क्यों जीनी पड़ेगी?
इमामगंज के भगहर की कहानी कागजों और आश्वासनों के बीच अटका हुआ है।
भगहर की कहानी सिर्फ एक गांव की परेशानी नहीं है। यह उस व्यवस्था का आईना है, जहां समस्या वर्षों पुरानी है, शिकायतें लगातार होती रही हैं और समाधान अब भी कागजों और आश्वासनों के बीच अटका हुआ है।
पुल बनेगा तो सिर्फ दो किनारे नहीं जुड़ेंगे, बल्कि भगहर के बच्चों की पढ़ाई, मरीजों की जिंदगी, मजदूरों का रोजगार और ग्रामीणों का भविष्य भी मुख्यधारा से जुड़ेगा।
अब देखना यह है कि प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के आश्वासन इस बार भी पानी उतरने के साथ बह जाते हैं या भगहर के लिए सचमुच कोई स्थायी रास्ता निकलता है।
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Written & Edit by : Chandan Patel

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