नई दिल्ली। भारत की तेज आर्थिक विकास दर और दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में तेजी से ऊपर बढ़ने की चर्चा अक्सर होती है। बड़े-बड़े एक्सप्रेसवे बन रहे हैं, डिजिटल पेमेंट का विस्तार हो रहा है, शहरों में नए मॉल और गगनचुंबी इमारतें खड़ी हो रही हैं और भारत दुनिया की बड़ी आर्थिक ताकत बनने का सपना देख रहा है।
लेकिन इसी चमकती तस्वीर के बीच एक सवाल बार-बार सामने आता है – अगर भारत इतना तेजी से आर्थिक रूप से आगे बढ़ ही रहा है, तो करीब 80 करोड़ लोगों को आज भी सरकार से मुफ्त अनाज क्यों लेना पड़ रहा है?
यह सवाल किसी योजना के खिलाफ नहीं है। गरीब परिवार को पेट भरने के लिए अनाज मिलना जरूरी है। असली सवाल यह है कि क्या आर्थिक विकास का फायदा देश के सबसे गरीब परिवार तक उतनी तेजी से पहुंच रहा है, जितनी तेजी से देश की अर्थव्यवस्था बढ़ रही है?
80 करोड़ लोग कौन हैं जिन्हें मुफ्त राशन मिल रहा है?
सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि सरकार का आंकड़ा अचानक बनाया हुआ आंकड़ा नहीं है।
राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून यानी NFSA, 2013 के तहत ग्रामीण आबादी के 75 प्रतिशत और शहरी आबादी के 50 प्रतिशत तक को खाद्य सुरक्षा व्यवस्था में शामिल करने का प्रावधान है। इसी व्यवस्था के तहत करीब 81.35 करोड़ लोगों का कवरेज तय किया गया था।
सरकार के ताजा आंकड़ों के मुताबिक करीब 80 करोड़ लोग फिलहाल मुफ्त खाद्यान्न प्राप्त कर रहे हैं।
इनमें मुख्य रूप से दो श्रेणियां हैं – अंत्योदय अन्न योजना (AAY) और प्राथमिकता वाले परिवार (PHH)।
प्राथमिकता वाले परिवारों को प्रति व्यक्ति प्रति माह 5 किलो खाद्यान्न मिलता है, जबकि अंत्योदय परिवारों के लिए प्रति परिवार प्रति माह 35 किलो खाद्यान्न का प्रावधान है।
यानी यह समझना भी जरूरी है कि हर व्यक्ति को सिर्फ 5 किलो नहीं मिलता। 5 किलो प्रति व्यक्ति की व्यवस्था मुख्य रूप से PHH श्रेणी के लिए है।
मुफ्त राशन की शुरुआत कहां से हुई?
प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना की बड़ी शुरुआत कोरोना महामारी के दौरान हुई थी। उस समय लॉकडाउन के कारण करोड़ों मजदूरों, दिहाड़ी कामगारों और गरीब परिवारों की आमदनी अचानक प्रभावित हो गई थी।
सरकार ने उस समय करीब 80 करोड़ लोगों को अतिरिक्त मुफ्त अनाज उपलब्ध कराया था। प्रति व्यक्ति प्रति महीने 5 किलो गेहूं या चावल देने की व्यवस्था की गई थी।
बाद में खाद्य सुरक्षा व्यवस्था को आगे बढ़ाते हुए सरकार ने 1 जनवरी 2024 से पांच साल के लिए करीब 81.35 करोड़ लाभार्थियों को मुफ्त खाद्यान्न जारी रखने का फैसला किया।
यानी कोरोना खत्म होने के बाद भी यह व्यवस्था जारी है।
यहां से शुरू होता है असली सवाल
कोरोना के समय मुफ्त राशन की जरूरत समझ में आती थी। करोड़ों लोगों का काम बंद था, मजदूरी रुक गई थी और बाजार बंद थे।
लेकिन अब सवाल थोड़ा अलग है।
जब देश सामान्य आर्थिक गतिविधियों की तरफ लौट चुका है, बड़े उद्योग बढ़ रहे हैं, डिजिटल अर्थव्यवस्था तेजी से फैल रही है और भारत वैश्विक स्तर पर बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की बात कर रहा है, तब भी करीब 80 करोड़ लोगों को खाद्य सुरक्षा की सरकारी व्यवस्था पर निर्भर रहना पड़ रहा है।
यही वह जगह है जहां आर्थिक विकास और आम आदमी की जिंदगी के बीच अंतर को समझने की जरूरत है।
क्या मुफ्त राशन का मतलब है कि 80 करोड़ लोग बेहद गरीब हैं?
जरूरी नहीं।
यह एक महत्वपूर्ण बात है जिसे सोशल मीडिया की बहस में अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है।
80 करोड़ का आंकड़ा सीधे-सीधे यह नहीं बताता कि देश के 80 करोड़ लोग अत्यंत गरीब हैं। यह आंकड़ा NFSA के तहत निर्धारित और चिन्हित लाभार्थियों का है।
दूसरी तरफ गरीबी को मापने के कई तरीके हैं – आय, उपभोग, स्वास्थ्य, शिक्षा, आवास, स्वच्छता और दूसरी सुविधाएं।
नीति आयोग के अनुसार भारत में बहुआयामी गरीबी 2013-14 के अनुमानित 29.17 प्रतिशत से घटकर 2022-23 में 11.28 प्रतिशत हुई और करीब 24.82 करोड़ लोग बहुआयामी गरीबी से बाहर निकले।
इसका मतलब यह है कि गरीबी में कमी आई है, लेकिन गरीबी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है।

फिर सवाल गरीबी से आगे का है
गरीब परिवार को आज 5 किलो अनाज मिल जाना अच्छी बात है।
लेकिन क्या गरीब परिवार का बच्चा अच्छी शिक्षा भी पा रहा है?
क्या परिवार के पास स्थायी रोजगार है?
क्या मजदूर को साल के 12 महीने पर्याप्त काम मिलता है?
क्या परिवार अचानक आने वाले अस्पताल के खर्च को बिना कर्ज लिए उठा सकता है?
क्या किसान की आमदनी इतनी है कि वह महंगाई के बीच परिवार की जरूरतें पूरी कर सके?
और सबसे बड़ा सवाल :
क्या आने वाली पीढ़ी को भी उसी राशन की लाइन में खड़ा होना पड़ेगा?
अगर जवाब हां है, तो सिर्फ मुफ्त अनाज गरीबी का स्थायी समाधान नहीं हो सकता।
5 किलो अनाज राहत है, समाधान नहीं
मुफ्त राशन निश्चित रूप से गरीब परिवार के लिए बड़ी राहत है। किसी घर में जब महीने के राशन का खर्च कम होता है तो उस पैसे से बच्चा स्कूल जा सकता है, दवा खरीदी जा सकती है या घर की दूसरी जरूरत पूरी हो सकती है।
लेकिन राशन किसी परिवार को आत्मनिर्भर बनाने का अंतिम रास्ता नहीं है।
गरीबी से स्थायी रूप से बाहर निकलने के लिए रोजगार, अच्छी शिक्षा, कौशल, स्वास्थ्य सुविधा, छोटे कारोबार के लिए पूंजी और बेहतर मजदूरी की जरूरत होती है।
यही वजह है कि सरकार के सामने अगली चुनौती सिर्फ यह नहीं होनी चाहिए कि कितने लोगों को मुफ्त राशन दिया गया, बल्कि यह भी होनी चाहिए कि कितने परिवार ऐसे हैं जिन्हें कुछ वर्षों बाद मुफ्त राशन की जरूरत ही न पड़े।
भारत की असली तस्वीर दो हिस्सों में क्यों दिखाई देती है?
एक तरफ भारत में करोड़ों लोग डिजिटल भुगतान कर रहे हैं, लाखों करोड़ रुपये की अर्थव्यवस्था की बात हो रही है और देश वैश्विक निवेश आकर्षित करने की कोशिश कर रहा है।
दूसरी तरफ बड़ी संख्या में परिवारों के लिए महीने के राशन का सवाल आज भी बेहद महत्वपूर्ण है।
यही भारत की आर्थिक कहानी का सबसे जटिल हिस्सा है।
देश की GDP बढ़ना जरूरी है, लेकिन GDP बढ़ने के साथ आम परिवार की आय और जीवन स्तर भी बढ़ना चाहिए।
किसी देश की तरक्की सिर्फ शेयर बाजार, एक्सप्रेसवे और बड़े उद्योगों से नहीं मापी जाती। यह भी देखना पड़ता है कि गांव का मजदूर, छोटा दुकानदार, खेतिहर परिवार और कम आय वाला शहरी परिवार कितना बेहतर जीवन जी पा रहा है।
सरकार के लिए भी यह एक बड़ी चुनौती है
मुफ्त राशन योजना को सिर्फ राजनीतिक चश्मे से देखना ठीक नहीं होगा।
भूखे व्यक्ति को खाना मिलना सरकार की जिम्मेदारी है। खाद्य सुरक्षा व्यवस्था ने करोड़ों परिवारों को संकट के समय सहारा दिया है।
लेकिन सरकार को इसके साथ-साथ यह भी सुनिश्चित करना होगा कि रोजगार और आय बढ़ाने की रफ्तार इतनी तेज हो कि आने वाले समय में करोड़ों परिवार सरकारी खाद्य सहायता पर निर्भर रहने के बजाय अपनी आय से बाजार से राशन खरीद सकें।
यही असली आर्थिक मजबूती होगी।
गरीबी कम हुई है, लेकिन सवाल अभी बाकी हैं
सरकारी आंकड़े बताते हैं कि बहुआयामी गरीबी में बड़ी कमी आई है। यह निश्चित रूप से सकारात्मक बदलाव है। लेकिन दूसरी तरफ मुफ्त खाद्यान्न पाने वालों की संख्या भी लगभग 80 करोड़ के आसपास है।
इन दोनों आंकड़ों को साथ रखकर देखने पर भारत की विकास यात्रा की एक दिलचस्प तस्वीर सामने आती है।
एक तरफ गरीबी घट रही है, दूसरी तरफ खाद्य सुरक्षा की जरूरत अभी भी बहुत बड़ी है।
इस विरोधाभास को समझे बिना भारत की अर्थव्यवस्था की पूरी कहानी समझना मुश्किल है।
सबसे बड़ा सवाल: 2047 का भारत कैसा होगा?
भारत 2047 तक विकसित देश बनने का लक्ष्य रखता है।
ऐसे में आने वाले वर्षों में सबसे बड़ा सवाल यह नहीं होना चाहिए कि सरकार कितने करोड़ लोगों को मुफ्त राशन दे रही है।
सवाल यह होना चाहिए कि :
2047 तक कितने करोड़ परिवार इतने सक्षम होंगे कि उन्हें मुफ्त राशन की जरूरत ही नहीं पड़ेगी?
अगर आज का गरीब परिवार कल नौकरी, कारोबार या खेती से सम्मानजनक आय हासिल करता है, उसके बच्चों को बेहतर शिक्षा मिलती है और परिवार बिना सरकारी सहायता के अपनी मूल जरूरतें पूरी कर पाता है, तो वही असली विकास होगा।
क्योंकि गरीब के घर राशन पहुंचाना जरूरी है, लेकिन गरीबी को उसके घर से हमेशा के लिए बाहर निकालना उससे भी ज्यादा जरूरी है।
लेकिन इन उपलब्धियों के बीच सरकार से सवाल पूछना भी जरूरी है।
भारत की अर्थव्यवस्था का बढ़ना देश के लिए अच्छी खबर है। गरीबी में कमी आना भी अच्छी खबर है। मुफ्त राशन के जरिए करोड़ों परिवारों को खाद्य सुरक्षा मिलना भी जरूरी सामाजिक सुरक्षा है।
लेकिन इन उपलब्धियों के बीच सवाल पूछना भी जरूरी है।
अगर भारत दुनिया की बड़ी आर्थिक ताकत बन रहा है, तो क्या उसी रफ्तार से आम भारतीय की जेब भी मजबूत हो रही है?
और अगर करीब 80 करोड़ लोगों के लिए आज भी सरकारी खाद्यान्न जीवन की महत्वपूर्ण जरूरत है, तो देश को अब सिर्फ गरीबी कम करने से आगे बढ़कर ऐसी अर्थव्यवस्था बनाने पर ध्यान देना होगा जिसमें गरीब परिवार स्थायी रूप से आत्मनिर्भर बन सकें।
यही आर्थिक विकास की असली परीक्षा होगी।
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Written & Edit by : Chandan Patel

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