Jamui News: जमुई जिले के ढाब और कश्मीर गांव में नल-जल योजना की बदहाल तस्वीर
बिहार सरकार की महत्वाकांक्षी हर घर नल-जल योजना का उद्देश्य गांव-गांव तक शुद्ध पेयजल पहुंचाना था, लेकिन जमुई जिले के खैरा प्रखंड अंतर्गत गोपालपुर पंचायत के ढाब और कश्मीर गांव में इस योजना की जमीनी हकीकत सरकारी दावों पर बड़े सवाल खड़े कर रही है। योजना शुरू हुए एक वर्ष से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन आज तक न तो पानी की टंकी लग पाई है और न ही किसी घर तक नियमित रूप से पेयजल पहुंच सका है।
ग्रामीणों का आरोप है कि योजना के नाम पर सिर्फ औपचारिकता निभाई गई है, जबकि लाखों रुपये खर्च होने के बावजूद लोगों को पानी की एक बूंद तक नसीब नहीं हुई।
पानी की आस में बीत गया एक साल, अब टूट रही ग्रामीणों की उम्मीद
ढाब और कश्मीर जैसे पहाड़ी गांवों में गर्मी के मौसम में पेयजल संकट हर साल गंभीर रूप ले लेता है। यहां पानी के लिए लोगों को पत्थरों का सीना चीरकर बोरिंग करानी पड़ती है। लगातार गिरते जलस्तर के कारण कई चापाकल और निजी बोरिंग भी जवाब दे चुके हैं।
जब नल-जल योजना शुरू हुई तो ग्रामीणों को लगा था कि वर्षों पुरानी पेयजल समस्या का समाधान अब हो जाएगा। लेकिन एक साल गुजर जाने के बाद भी हालात जस के तस बनी हैं। अब लोगों की उम्मीदें धीरे-धीरे निराशा में बदल रही हैं।
टंकी का प्लेटफॉर्म है तैयार, लेकिन टंकी का अब तक नहीं कोई अता-पता
कश्मीर गांव में योजना के तहत बोरिंग कराई गई और पानी की टंकी स्थापित करने के लिए प्लेटफॉर्म भी बना दिया गया। लेकिन हैरानी की बात यह है कि आज तक उस प्लेटफॉर्म पर टंकी नहीं लगाई गई।
योजना स्थल पर पाइप खुले में पड़े-पड़े खराब हो रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि तेज धूप, बारिश और मौसम की मार से पाइप की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है, लेकिन जिम्मेदार विभाग और संवेदक इस ओर ध्यान देने को तैयार नहीं हैं।

सड़क के ऊपर बिछी पाइप, नियमों को खुली चुनौती
ग्रामीणों का आरोप है कि निर्माण कार्य में विभागीय मानकों की खुलकर अनदेखी की गई है। जहां पाइप को निर्धारित गहराई में दबाया जाना चाहिए था, वहां कई जगह आधा फीट गहराई पर ही पाइप डाल दी गई है।
स्थिति इतनी गंभीर है कि कुछ स्थानों पर पाइप सड़क के ऊपर ही दिखाई देती है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि यही गुणवत्ता रही तो योजना शुरू होने से पहले ही दम तोड़ देगी।
अधिकारियों की फटकार भी बेअसर, संवेदक की मनमानी जारी
ग्रामीणों की शिकायत के बाद विभागीय अधिकारियों ने पूर्व में स्थल निरीक्षण किया था। जांच के दौरान कई अनियमितताएं सामने आई थीं। कार्यपालक अभियंता ने संवेदक को गलत तरीके से बिछाई गई पाइप हटाकर मानक के अनुसार दोबारा काम करने का निर्देश दिया था।
लेकिन ग्रामीणों का आरोप है कि आदेश का पालन करने के बजाय संवेदक ने महीनों तक काम ही बंद कर दिया। इससे यह सवाल उठ रहा है कि आखिर अधिकारियों के निर्देशों की जमीन पर कितनी अहमियत रह गई है।
खुले गड्ढों ने बढ़ाई परेशानी, मवेशी तक हुए घायल
पाइपलाइन बिछाने के दौरान कई स्थानों पर गड्ढे खोदकर छोड़ दिए गए थे। इन गड्ढों के कारण ग्रामीणों और राहगीरों को भारी परेशानी झेलनी पड़ी।
ग्रामीण रामस्वरूप यादव बताते हैं कि उनकी गाय एक खुले गड्ढे में गिर गई थी, जिससे उसका पैर टूट गया। स्थिति इतनी खराब थी कि बाद में ग्रामीणों ने खुद चंदा इकट्ठा कर और श्रमदान करके गड्ढों को भरने का काम किया।
सड़क निर्माण शुरू हुआ तो सड़क के बीच से डाल दी गई पाइप
ग्रामीणों के अनुसार जब गांव में पक्की सड़क निर्माण का कार्य शुरू हुआ, तब संवेदक ने जल्दबाजी में पुरानी पाइप निकालकर नई सड़क के बीच से पाइपलाइन बिछा दी।
लोगों को डर है कि भविष्य में पानी का दबाव बढ़ने पर पाइप फट सकती है और नई बनी सड़क भी क्षतिग्रस्त हो सकती है। यदि ऐसा हुआ तो सरकारी धन की दोहरी बर्बादी होगी।
विकास के दावों पर सवाल, गांव में अब भी पानी के लिए संघर्ष
सरकार हर घर तक पानी पहुंचाने के दावे कर रही है, लेकिन ढाब और कश्मीर गांव के लोग आज भी बूंद-बूंद पानी के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि कागजों पर योजना पूरी दिखाई जा रही होगी, लेकिन जमीनी स्तर पर स्थिति बिल्कुल अलग है। विकास के बड़े-बड़े दावों के बीच गांव की हकीकत यह है कि लोग आज भी पुराने जलस्रोतों पर निर्भर हैं।
कंपनी को ब्लैकलिस्ट करने की मांग तेज
ग्रामीणों ने संबंधित संवेदक और कंपनी को ब्लैकलिस्ट करने की मांग उठाई है। उनका कहना है कि तय समय सीमा के भीतर काम पूरा नहीं हुआ और गुणवत्ता को लेकर भी गंभीर सवाल हैं।
लोगों का आरोप है कि विभागीय स्तर पर प्रभावी कार्रवाई नहीं होने के कारण संवेदक मनमाने तरीके से काम कर रहा है। ग्रामीण चाहते हैं कि शेष कार्य किसी दूसरी एजेंसी से कराया जाए ताकि जल्द से जल्द गांव को शुद्ध पेयजल की सुविधा मिल सके।
क्या कहते हैं ग्रामीण?
जितेंद्र कुमार
“नियमों को ताक पर रखकर सड़क के बीच पाइपलाइन बिछा तो दी गई है। पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच होनी चाहिए।”
रामस्वरूप यादव
“खुले गड्ढे में गिरने से मेरी गाय का पैर टूट गया था। बाद में गांव वालों ने खुद गड्ढे भरने का काम किया।”
ब्रह्मदेव मंडल
“विभागीय अधिकारियों के निर्देशों का भी पालन नहीं किया जा रहा है। संवेदक अपनी मनमानी कर रहा है।”
मिथलेश कुमार
“एक साल पहले लगा था कि अब पानी की समस्या खत्म होगी, लेकिन आज भी हालात पहले से ज्यादा निराशाजनक हैं।”
बड़ा सवाल: आखिर जिम्मेदार कौन?
जब टंकी नहीं लगी, पाइपलाइन मानक के अनुसार नहीं बिछी, अधिकारियों के आदेशों का पालन नहीं हुआ और एक साल बाद भी लोगों को पानी नहीं मिला, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?
ढाब और कश्मीर गांव के ग्रामीण अब सिर्फ आश्वासन नहीं, बल्कि अपने घरों तक पानी पहुंचते देखना चाहते हैं। क्योंकि उनके लिए नल-जल योजना कोई सरकारी आंकड़ा नहीं, बल्कि जीवन की बुनियादी जरूरत है।
Edited and Written by : Chandan Patel.
