जल संरक्षण कार्य के नाम पर 3.43 लाख रुपये की निकासी का आरोप, ग्रामीणों ने मांगी उच्चस्तरीय जांच

जमुई। केंद्र और राज्य सरकार ग्रामीण क्षेत्रों में जल संरक्षण, भू-जल स्तर सुधार और किसानों को सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराने के लिए मनरेगा के तहत हर वर्ष करोड़ों रुपये खर्च कर रही है। लेकिन जमुई जिले के खैरा प्रखंड अंतर्गत गोपालपुर पंचायत के घनबेरिया गांव से सामने आया एक मामला सरकारी योजनाओं की पारदर्शिता और निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।

घनबेरिया में आहर खुदाई योजना पर उठे सवाल

जानकारी के अनुसार वित्तीय वर्ष 2023-24 में जल संरक्षण एवं जल संग्रहण के उद्देश्य से घनबेरिया गांव में पुलिया आहर की खुदाई योजना स्वीकृत की गई थी। इस योजना का वर्क कोड 0550008015/WC/20633824 है। योजना के लिए कुल 4.72 लाख रुपये की स्वीकृति प्रदान की गई थी।

वही,सरकारी अभिलेखों के अनुसार कार्य 7 मई 2024 को प्रारंभ हुआ और 8 अप्रैल 2025 को पूर्ण कर लिया गया था। रिकॉर्ड में यह भी उल्लेख है कि इस कार्य में कुल 1418 मजदूरों ने योगदान दिया तथा मजदूरी सहित विभिन्न मदों में 3 लाख 43 हजार 507 रुपये की राशि खर्च की गई थी।

स्थल पर नहीं मिला आहर का अस्तित्व

ग्रामीणों का आरोप है कि जिस स्थान पर आहर निर्माण और खुदाई का दावा किया गया है, वहां आज भी खेत मौजूद हैं और नियमित रूप से खेती की जा रही है। स्थल की स्थिति देखकर यह अनुमान लगाना मुश्किल है कि वहां कभी किसी प्रकार का बड़ा जल संरक्षण कार्य या खुदाई कराई गई होगी।

स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि योजना के तहत वास्तव में आहर का निर्माण हुआ होता, तो उसका स्पष्ट प्रभाव दिखाई देता और किसानों को सिंचाई सुविधा का लाभ मिलता।

घनबेरिया
स्थल पर नहीं मिला आहर का अस्तित्व

केवल झाड़ियों की सफाई कर योजना पूरी दिखाने का आरोप

वही, ग्रामीणों के अनुसार योजना स्थल पर किसी बड़े निर्माण या खुदाई के कोई भी साक्ष्य नहीं मिले हैं। उनका आरोप यह है कि केवल घास और झाड़ियों की सफाई कर योजना को पूर्ण दिखा दिया गया और सरकारी रिकॉर्ड में कार्य समाप्त दर्शा दिया गया था।

लोगों का कहना है कि यदि रिकॉर्ड के अनुसार 1418 मजदूरों ने कार्य किया होता, तो जमीन पर उसका असर स्पष्ट रूप से दिखाई देता। वर्तमान स्थिति में खेतों में खेती हो रही है, जिससे योजना की वास्तविकता पर सवाल उठ रहे हैं।

सरकारी राशि के दुरुपयोग की आशंका

ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि योजना को कागजों पर पूरा दिखाकर सरकारी राशि की निकासी की गई है। उनका कहना है कि मामले में पंचायत स्तर पर गंभीर अनियमितता और वित्तीय गड़बड़ी की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।

इस मामले के सामने आने के बाद पंचायत में संचालित अन्य मनरेगा योजनाओं की गुणवत्ता और पारदर्शिता को लेकर भी चर्चाएं तेज हो गई हैं।

ग्रामीणों ने की निष्पक्ष जांच की मांग

ग्रामीणों ने जिला प्रशासन, मनरेगा विभाग और संबंधित अधिकारियों से पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है। लोगों का कहना है कि योजना स्थल का भौतिक सत्यापन कराया जाए, खर्च की गई राशि की जांच हो तथा दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों और जिम्मेदार व्यक्तियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाए।

ग्रामीणों का विश्वास है कि यदि निष्पक्ष जांच कराई गई तो पूरे मामले की सच्चाई सामने आ सकती है।

सवालों के घेरे में मनरेगा की निगरानी व्यवस्था

यह मामला केवल एक योजना तक सीमित नहीं है, बल्कि मनरेगा योजनाओं की निगरानी और पारदर्शिता पर भी सवाल खड़े करता है। यदि जल संरक्षण जैसी महत्वपूर्ण योजनाएं केवल कागजों पर पूरी दिखाई जा रही हैं, तो इससे सरकारी धन के उपयोग और ग्रामीण विकास के उद्देश्य दोनों प्रभावित होते हैं।

अब सभी की निगाहें जिला प्रशासन और संबंधित विभागों की कार्रवाई पर टिकी हैं कि आखिर इस मामले में जांच के बाद क्या सच सामने आता है।

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