नई दिल्ली: देश में चुनावी प्रक्रिया और वोटर लिस्ट को लेकर चल रहा विवाद गुरुवार को उस वक्त और गहरा गया, जब लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने करीब 55 मिनट की प्रेस कॉन्फ्रेंस कर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए। राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि चुनावी प्रक्रिया में गड़बड़ी हुई है और वोटर लिस्ट में बदलाव के जरिए मतदाताओं के अधिकार प्रभावित किए जा रहे हैं।
राहुल गांधी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की जांच की मांग भी उठाई। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग की विश्वसनीयता को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
हालांकि, इन आरोपों को चुनाव आयोग स्वीकार नहीं करता। आयोग ने एक दिन पहले कहा था कि तीन सदस्यीय संवैधानिक संस्था में अलग-अलग राय और टिप्पणियां आना सामान्य प्रक्रिया है तथा SIR समेत उसके फैसले सर्वसम्मति से लिए गए।
राहुल गांधी ने क्यों उठाए चुनाव आयोग पर सवाल?
राहुल गांधी ने अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में सबसे बड़ा सवाल ‘वोट चोरी’ के आरोप को लेकर उठाया। उन्होंने कहा कि वोट सिर्फ चुनाव जीतने या हारने का माध्यम नहीं है, बल्कि वोट के जरिए जनता सरकार, संसद और कानून बनाने की प्रक्रिया में अपनी भूमिका निभाती है।
राहुल ने कहा कि यदि मतदाता सूची और वोट की सुरक्षा पर सवाल खड़े होते हैं तो इसका असर लोकतांत्रिक संस्थाओं की पूरी श्रृंखला पर पड़ता है।
उन्होंने दावा किया कि पिछले कुछ चुनावों को तकनीकी स्तर पर देखने के बाद उन्हें धीरे-धीरे वोट में गड़बड़ी का संदेह हुआ और इसी वजह से कांग्रेस ने इस मुद्दे को लगातार उठाया।
‘मोदी-शाह के खिलाफ एंटी-इनकंबेंसी क्यों नहीं?’
प्रेस कॉन्फ्रेंस में राहुल गांधी ने चुनावी राजनीति में एंटी-इनकंबेंसी को लेकर भी सवाल उठाया।
उन्होंने 1977 का उदाहरण देते हुए कहा कि इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली सरकार को भी चुनावी हार का सामना करना पड़ा था। राहुल ने सवाल उठाया कि यदि अलग-अलग सरकारों और नेताओं के खिलाफ समय-समय पर एंटी-इनकंबेंसी देखने को मिलती रही है तो भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मामले में इसका प्रभाव अलग क्यों दिखाई देता है।
राहुल ने इसका संबंध कथित वोटर लिस्ट की गड़बड़ियों से जोड़ते हुए कहा कि उन्हें अब इसका जवाब मिल गया है। यह राहुल गांधी का राजनीतिक दावा है, जिसकी स्वतंत्र पुष्टि के तौर पर उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस में अपने द्वारा पेश किए गए दस्तावेजों और घटनाक्रम का हवाला दिया।
‘ज्ञानेश कुमार को इस्तीफा देना चाहिए’
राहुल गांधी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर बेहद गंभीर आरोप लगाए और उनके इस्तीफे की मांग की।
उन्होंने कहा कि ज्ञानेश कुमार को चुनावी प्रक्रिया और वोटों की सुरक्षा से जुड़े सवालों पर जवाब देना चाहिए। राहुल ने यह भी कहा कि यदि चुनाव आयोग के भीतर उठाए गए सवाल सही हैं तो पूरे मामले की जांच जरूरी है।
राहुल ने कहा कि पहले चुनावी व्यवस्था और संस्थागत प्रक्रिया को दुरुस्त किया जाना चाहिए और उसके बाद जिम्मेदारी तय करने की जांच होनी चाहिए।
चुनाव आयोग के भीतर 14 आपत्तियों की रिपोर्ट ने बढ़ाया विवाद
राहुल गांधी के हमले की पृष्ठभूमि में द इंडियन एक्सप्रेस की 23 सितंबर की रिपोर्ट भी महत्वपूर्ण है।
रिपोर्ट के मुताबिक चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने अक्टूबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच कम से कम 14 बार आयोग के कुछ फैसलों और आदेशों पर लिखित आपत्ति दर्ज की।
रिपोर्ट में कहा गया कि इन आपत्तियों में वोटर लिस्ट, नए मतदाताओं के पंजीकरण, Form-6 में बदलाव, वोटर डेटाबेस की पहुंच और पश्चिम बंगाल तथा गोवा में SIR से जुड़े मुद्दे शामिल थे। रिपोर्ट के मुताबिक इन आपत्तियों की प्रतियां मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को भी भेजी गई थीं।
Form-6 में बदलाव पर क्या है विवाद?
नए मतदाता के रूप में पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले Form-6 को लेकर भी चुनाव आयोग के भीतर सवाल उठाए जाने की रिपोर्ट सामने आई।
इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक Form-6 में SIR से जुड़ा एक सवाल जोड़ा गया था, जिसमें आवेदक से पूछा गया कि उसका या उसके माता-पिता/दादा-दादी का नाम पिछली SIR वाली मतदाता सूची में था या नहीं।
रिपोर्ट के अनुसार चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने मई में इस तरह के बदलाव को लेकर आपत्ति दर्ज की थी। बाद में सुखबीर सिंह संधू ने भी इस बदलाव को कथित तौर पर ‘अनधिकृत और गैरकानूनी’ बताते हुए हटाने की मांग की थी।
यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि यह इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में दर्ज आंतरिक आपत्तियों का विवरण है, न कि अदालत द्वारा स्थापित कोई अंतिम निष्कर्ष।
वोटर डेटाबेस के केंद्रीकरण पर भी सवाल
वोटर डेटा तक पहुंच को लेकर भी दोनों चुनाव आयुक्तों ने सवाल उठाए।
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, उन्होंने चिंता जताई कि मतदाता डेटाबेस के संचालन और नियंत्रण का कुछ हिस्सा धीरे-धीरे दिल्ली में केंद्रीकृत हो रहा है और राज्य स्तर के अधिकारियों की पहुंच प्रभावित हो सकती है।
रिपोर्ट में बताया गया कि चुनावी रोल से जुड़े IT सिस्टम और अधिकारियों की पहुंच को लेकर भी आपत्तियां दर्ज की गईं।
यह मुद्दा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि चुनाव आयोग की अपनी व्यवस्था में मतदाता सूची तैयार करने और उसमें सुधार की प्रक्रिया में स्थानीय स्तर के Electoral Registration Officers की भूमिका होती है।
पश्चिम बंगाल में 27 लाख नाम हटने और 38 लाख अपील का विवाद
पश्चिम बंगाल SIR का मामला भी इस विवाद का बड़ा हिस्सा है।
चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि SIR प्रक्रिया में करीब 27.16 लाख मतदाताओं के नाम हटाए गए, जिनमें से 22 लाख से ज्यादा ने दोबारा नाम शामिल कराने के लिए अपील की।
कुल मिलाकर करीब 38.31 लाख अपीलें सामने आईं। इनमें 22.21 लाख नाम जोड़ने और 16.10 लाख नाम हटाने से जुड़ी अपीलें थीं।
यही वह बिंदु है जिस पर चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू ने कथित तौर पर सवाल उठाया कि आयोग की ओर से कुछ अपीलें किसने और किसकी अनुमति से दाखिल कीं।
गोवा के 97 मतदाताओं का मामला क्यों चर्चा में है?
गोवा का मामला इस विवाद को तकनीकी स्तर पर समझने के लिए खास है।
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक SIR प्रक्रिया के दौरान 97 मतदाताओं को सुनवाई के बाद योग्य पाया गया, लेकिन सॉफ्टवेयर में उन्हें दोबारा मतदाता सूची में शामिल करने का विकल्प उपलब्ध नहीं था।
रिपोर्ट के अनुसार गोवा के अधिकारियों ने दिल्ली स्थित चुनाव आयोग को इस समस्या के बारे में कई बार ईमेल किया, लेकिन अंतिम मतदाता सूची जारी होने तक समस्या का समाधान नहीं हो सका।
यह मामला बताता है कि विवाद केवल राजनीतिक आरोपों तक सीमित नहीं है, बल्कि मतदाता सूची के डिजिटल सिस्टम और स्थानीय अधिकारियों की तकनीकी क्षमता पर भी सवाल उठा रहा है।
SIR में 13 करोड़ से ज्यादा नामों का विवाद
इंडियन एक्सप्रेस की जांच के अनुसार बिहार से जून 2025 में शुरू हुई SIR प्रक्रिया के राष्ट्रीय विस्तार के दौरान 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में ड्राफ्ट वोटर रोल से 13 करोड़ से अधिक नाम हटाए गए।
लेकिन यहां एक जरूरी फर्क समझना होगा – ड्राफ्ट सूची से नाम हटना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि सभी नाम स्थायी रूप से मतदाता सूची से बाहर हो गए या सभी हटाए गए नाम गलत तरीके से हटाए गए।
SIR का उद्देश्य मतदाता सूची को अपडेट करना और अपात्र, मृत, स्थानांतरित या डुप्लीकेट प्रविष्टियों की पहचान करना भी है। विवाद मुख्य रूप से प्रक्रिया, दस्तावेजों, अपील और नाम जोड़ने/हटाने के तरीके को लेकर है।
चुनाव आयोग ने क्या कहा?
चुनाव आयोग ने इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के बाद कहा कि तीन सदस्यीय आयोग में अलग-अलग विचार, सुझाव और टिप्पणियां आना सामान्य संस्थागत प्रक्रिया का हिस्सा है।
चुनाव आयोग के अधिकारियों के मुताबिक SIR सहित आयोग के फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी से लिए गए थे। यानी आयोग ने उस रिपोर्ट में सामने आए मतभेदों को इस रूप में स्वीकार नहीं किया कि आयोग के फैसले एकतरफा लिए गए थे।
यही इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण विरोधाभास है – एक तरफ इंडियन एक्सप्रेस ने दो चुनाव आयुक्तों की 14 लिखित आपत्तियों की रिपोर्ट प्रकाशित की, वहीं चुनाव आयोग का कहना है कि उसके फैसले सर्वसम्मति से लिए गए।
2023 का कानून क्या कहता है?
भारत के संविधान का अनुच्छेद 324 चुनावों और मतदाता सूचियों की तैयारी की निगरानी, निर्देशन और नियंत्रण का अधिकार चुनाव आयोग को देता है। संविधान के अनुसार आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त हो सकते हैं तथा जब अन्य चुनाव आयुक्त नियुक्त होते हैं तो मुख्य चुनाव आयुक्त आयोग के अध्यक्ष के रूप में कार्य करते हैं।
वहीं 2023 के कानून के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं, लेकिन इसके लिए तीन सदस्यीय चयन समिति की सिफारिश होती है। इसमें प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री शामिल होते हैं।
कानून में मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों के कार्यकाल तथा हटाने की प्रक्रिया का भी प्रावधान है। मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के समान संवैधानिक सुरक्षा से जुड़ी है।
राहुल गांधी ने उठाए 4 बड़े सवाल
राहुल गांधी की प्रेस कॉन्फ्रेंस का सार चार बड़े सवालों में समझा जा सकता है –
पहला: मतदाता सूची में नाम जोड़ने और हटाने की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है?
दूसरा: चुनाव आयोग के डिजिटल वोटर डेटाबेस पर वास्तविक नियंत्रण किस स्तर पर है?
तीसरा: आयोग के भीतर दर्ज की गई आपत्तियों का समाधान किस तरीके से हुआ?
चौथा: यदि किसी मतदाता का नाम गलती से हट जाता है तो उसे समय पर वापस जोड़ने की व्यवस्था कितनी प्रभावी है?
इन सवालों के जवाब आने वाले समय में SIR और चुनावी प्रक्रिया पर जारी बहस के लिए महत्वपूर्ण होंगे।

‘जेन-जी को वोटर लिस्ट से बाहर किया जा रहा है’ – राहुल का दावा
राहुल गांधी ने युवा मतदाताओं को लेकर भी गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने दावा किया कि जेन-जी के नए मतदाताओं के सामने वोटर लिस्ट में नाम जुड़वाने में परेशानी पैदा हो रही है और उन्होंने इसे राजनीतिक कारणों से जोड़कर देखा।
यह राहुल गांधी का राजनीतिक आरोप है। इसके समर्थन में किसी स्वतंत्र चुनावी विश्लेषण या आधिकारिक निष्कर्ष को उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस में स्थापित तथ्य के रूप में पेश नहीं किया। इसलिए इसे आरोप के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
चुनाव आयोग के नागरिक सेवा पोर्टल पर फिलहाल नए मतदाताओं के लिए Form-6 के जरिए ऑनलाइन पंजीकरण और SIR से संबंधित सेवाएं उपलब्ध हैं।
BJP ने राहुल गांधी के आरोपों पर क्या कहा?
राहुल गांधी की प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद भाजपा नेता सुधांशु त्रिवेदी ने उनके आरोपों को खारिज किया और राहुल गांधी की राजनीतिक समझ पर सवाल उठाए।
भाजपा की ओर से कहा गया कि राहुल गांधी के आरोप राजनीतिक हैं और चुनावी प्रक्रिया को लेकर उनकी दलीलों में तथ्यात्मक कमियां हैं। भाजपा ने चुनावी पारदर्शिता और चुनाव आयोग की प्रक्रिया का बचाव किया।
इस तरह एक तरफ राहुल गांधी चुनाव आयोग की विश्वसनीयता और वोटर लिस्ट की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठा रहे हैं, वहीं भाजपा इन आरोपों को राजनीतिक बयानबाजी बता रही है।
असली सवाल: वोटर लिस्ट पर भरोसा कैसे कायम रहेगा?
पूरे विवाद का सबसे बड़ा सवाल किसी एक राजनीतिक दल या नेता से आगे जाकर मतदाता के भरोसे का है।
चुनाव लोकतंत्र की बुनियादी प्रक्रिया है और मतदाता सूची उसका आधार। इसलिए नाम जोड़ने, हटाने, सुधारने और अपील की प्रक्रिया जितनी पारदर्शी होगी, चुनावी व्यवस्था पर जनता का भरोसा उतना ही मजबूत होगा।
फिलहाल SIR को लेकर राजनीतिक आरोप, चुनाव आयोग का बचाव और आयोग के भीतर दो चुनाव आयुक्तों की कथित लिखित आपत्तियां – तीनों बातें एक साथ सार्वजनिक बहस का हिस्सा हैं।
इस विवाद का अंतिम निष्कर्ष राजनीतिक आरोपों से नहीं, बल्कि दस्तावेजों, आधिकारिक रिकॉर्ड, न्यायिक समीक्षा और पारदर्शी जांच से ही स्पष्ट होगा।
राहुल गांधी ने गुरुवार की प्रेस कॉन्फ्रेंस में चुनाव आयोग पर ‘वोट चोरी’ आरोपों को फिर दोहराते हुए
राहुल गांधी ने गुरुवार की प्रेस कॉन्फ्रेंस में चुनाव आयोग, SIR और मतदाता सूची को लेकर अपने पुराने ‘वोट चोरी’ के आरोपों को फिर दोहराते हुए उन्हें नए घटनाक्रमों से जोड़ दिया। दूसरी ओर चुनाव आयोग ने अपने फैसलों को संस्थागत प्रक्रिया का हिस्सा बताते हुए सर्वसम्मति से लिए जाने की बात कही है।
अब सबसे अहम सवाल यही है कि SIR के दौरान मतदाता सूची में हुए बदलाव, आयोग के भीतर उठी आपत्तियों और डिजिटल वोटर डेटाबेस से जुड़े सवालों पर आगे क्या आधिकारिक जवाब और न्यायिक समीक्षा सामने आती है।
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Written & Edit by : Chandan Patel

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