नई दिल्ली/पणजी: दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में एक वोट की कीमत संख्या से नहीं, उसके संवैधानिक अधिकार से तय होती है। इसलिए गोवा के 97 मतदाताओं की कहानी महज 97 नामों के वोटर लिस्ट से गायब होने की कहानी नहीं है। यह सवाल उस व्यवस्था पर है, जिसमें स्थानीय स्तर पर जिम्मेदार चुनाव अधिकारी किसी मतदाता को दस्तावेजों की जांच के बाद पात्र मानते हैं, लेकिन वही फैसला चुनाव आयोग के केंद्रीय सॉफ्टवेयर सिस्टम में दर्ज नहीं हो पाता।

इंडियन एक्सप्रेस की एक जांच के मुताबिक, गोवा में विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR 2026 के दौरान 97 ऐसे मतदाताओं के मामले सामने आए, जिन्हें स्थानीय निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों यानी ERO/AERO ने जांच के बाद अंतिम मतदाता सूची में शामिल किए जाने योग्य माना, लेकिन 21 फरवरी को प्रकाशित अंतिम सूची में उनके नाम दिखाई नहीं दिए। रिपोर्ट के मुताबिक, इन फैसलों को सिस्टम में वापस लेने या सुधारने के लिए गोवा के अधिकारियों ने कई बार चुनाव आयोग से संपर्क किया, लेकिन समय रहते आवश्यक तकनीकी सुविधा उपलब्ध नहीं हो सकी।

यहीं से सवाल उठता है – क्या चुनावी प्रक्रिया में अंतिम फैसला कानून के तहत काम कर रहे स्थानीय अधिकारी का होना चाहिए या उस सॉफ्टवेयर का, जिसके जरिए उनका फैसला दर्ज होता है?

97 मतदाता क्यों बने पूरे चुनावी सिस्टम के लिए बड़ा सवाल?

गोवा में SIR के दौरान कई मतदाताओं को तथाकथित “Logical Discrepancy” यानी तार्किक विसंगति के आधार पर चिन्हित किया गया था।

इन विसंगतियों में पुराने रिकॉर्ड और मौजूदा रिकॉर्ड में माता-पिता के नाम का मेल न होना, उम्र में असामान्य अंतर, पुरानी और नई मतदाता सूची में उम्र के क्रम में अंतर या निर्धारित दस्तावेज उपलब्ध न होना जैसी स्थितियां शामिल हो सकती हैं।

लेकिन किसी व्यक्ति के रिकॉर्ड में ऐसी विसंगति मिलना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि वह मतदाता नहीं है।

इसी वजह से सुप्रीम कोर्ट ने 29 जनवरी 2026 के आदेश में प्रभावित लोगों को दस्तावेज और आपत्ति पेश करने तथा सुनवाई का अवसर देने के निर्देश दिए थे। अदालत ने संबंधित सूचियों को सार्वजनिक स्थानों पर प्रदर्शित करने और प्रभावित लोगों को 10 दिन का समय देने की बात कही थी।

यानी प्रक्रिया का उद्देश्य सिर्फ नाम हटाना नहीं, बल्कि आपत्ति और दस्तावेजों के आधार पर मामले की दोबारा जांच करना भी था।

गोवा में 649 लोगों ने दस्तावेज दिए, 97 को ERO ने योग्य माना

गोवा के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय से संबंधित दस्तावेजों का हवाला देते हुए इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट बताती है कि 649 मतदाताओं ने दस्तावेज या आपत्तियां दाखिल कीं।

इसके बाद ERO और AERO स्तर पर मामलों की जांच हुई।

इनमें 97 मामलों में अधिकारियों ने पाया कि संबंधित मतदाता अंतिम मतदाता सूची में शामिल किए जाने के योग्य हैं।

लेकिन समस्या यहां सामने आई।

पहले जिस निर्णय के आधार पर नाम को लेकर कार्रवाई हुई थी, उसे ECINet सिस्टम में वापस लेने या रोल बैक करने का विकल्प उपलब्ध नहीं था।

नतीजा यह हुआ कि स्थानीय अधिकारी निर्णय बदलना चाहते थे, लेकिन सिस्टम में उस बदलाव को लागू करने की तकनीकी व्यवस्था उनके पास नहीं थी।

7 दिन में 8 बार गुहार, फिर भी समस्या बनी रही

रिपोर्ट के अनुसार, गोवा के मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय ने फरवरी में लगातार चुनाव आयोग को इस समस्या की जानकारी दी।

11 फरवरी को गोवा इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड ने भी संबंधित अधिकारियों को बताया कि रोलबैक/रिवर्जन और दस्तावेज दोबारा अपलोड करने की सुविधा अभी सिस्टम में उपलब्ध नहीं थी।

इसके बाद 13, 14, 15, 16 और 17 फरवरी को भी इस मामले में पत्र और ईमेल भेजे गए।

17 फरवरी को 97 मामलों की सूची भेजते हुए इन मतदाताओं को अंतिम सूची में शामिल करने के लिए आवश्यक कार्रवाई का अनुरोध किया गया।

18 फरवरी को दिल्ली में मतदाता सूची से जुड़े उप निर्वाचन आयुक्त ने भी आईटी विभाग को लिखा कि ERO/AERO को कानून के तहत सुधारात्मक कार्रवाई का अधिकार है और आईटी सिस्टम सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार आवश्यक कार्रवाई को रोक नहीं सकता।

इसके बावजूद 21 फरवरी को अंतिम सूची प्रकाशित हुई और रिपोर्ट के मुताबिक इन 97 लोगों के नाम उसमें शामिल नहीं थे।

सबसे बड़ा सवाल: फैसला ERO का या सॉफ्टवेयर का?

भारत में मतदाता सूची तैयार करने की प्रक्रिया में ERO की भूमिका महत्वपूर्ण है। चुनाव आयोग स्वयं बताता है कि ERO और अन्य चुनाव अधिकारी मतदाता पंजीकरण, नाम जोड़ने, हटाने और सुधार जैसी प्रक्रियाओं को संभालते हैं। वहीं ECINET/ERONET को चुनावी प्रक्रिया को डिजिटल और केंद्रीकृत बनाने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।

यहीं गोवा का मामला एक बड़े संस्थागत सवाल को सामने लाता है।

अगर किसी ERO ने जांच के बाद किसी मतदाता को योग्य माना, लेकिन सॉफ्टवेयर उसे लागू करने की अनुमति ही न दे, तो अंतिम अधिकार किसका माना जाएगा?

यही सवाल चुनाव आयोग के भीतर भी उठाए जाने की बात इंडियन एक्सप्रेस की जांच में सामने आई है।

रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने अपने अलग-अलग नोट्स में ECINET के केंद्रीकरण और चुनाव अधिकारियों की सिस्टम तक पहुंच को लेकर आपत्तियां दर्ज की थीं।

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की कार्यशैली पर क्यों उठ रहे हैं सवाल?

यहां सीधे किसी निष्कर्ष पर पहुंचने के बजाय उन सवालों को देखना जरूरी है जो उपलब्ध दस्तावेजों से सामने आते हैं।

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व वाले चुनाव आयोग में यदि एक तरफ स्थानीय चुनाव अधिकारी किसी मामले की सुनवाई कर पात्रता तय करते हैं और दूसरी तरफ केंद्रीय आईटी व्यवस्था उस फैसले को लागू करने में बाधा बनती है, तो जवाबदेही की स्पष्ट रेखा जरूरी हो जाती है।

मतदाता
चीफ इलेक्शन कमीशन ज्ञानेश कुमार

सवाल यह है कि –

  • क्या ERO द्वारा लिए गए वैधानिक फैसले को ECINET तकनीकी कारणों से रोक सकता है?
  • यदि सिस्टम में रोलबैक की सुविधा नहीं थी, तो अंतिम सूची जारी होने से पहले इसे उपलब्ध क्यों नहीं कराया गया?
  • गोवा के अधिकारियों द्वारा लगातार भेजे गए ईमेल और पत्रों पर समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
  • क्या अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित करने से पहले ऐसे सभी मामलों की स्वतंत्र तकनीकी और प्रशासनिक जांच हुई?
  • यदि 97 लोगों को स्थानीय स्तर पर पात्र पाया गया था, तो उनके नाम अंतिम सूची में क्यों नहीं आए?
  • और सबसे महत्वपूर्ण – क्या चुनावी तकनीक अधिकारी के निर्णय को लागू करने का माध्यम है या वह स्वयं निर्णय को प्रभावित करने वाली व्यवस्था बन सकती है?

इन सवालों का जवाब चुनाव आयोग की पारदर्शिता और मतदाता के भरोसे, दोनों के लिए महत्वपूर्ण है।

चुनाव आयोग की अपनी वेबसाइट क्या कहती है?

चुनाव आयोग के आधिकारिक पोर्टल के अनुसार, मतदाता सूची में पात्र भारतीय नागरिकों का नाम दर्ज होना चाहिए और नागरिकों को अपने नाम की स्थिति जांचने की सुविधा उपलब्ध है। आयोग का ECINET/ERONET सिस्टम चुनाव अधिकारियों के लिए मतदाता पंजीकरण और रोल मैनेजमेंट से जुड़ी प्रक्रियाओं को डिजिटल रूप से संचालित करता है।

आयोग की वेबसाइट पर SIR 2026 के तहत मतदाता अपना नाम खोजने, चुनावी सूची डाउनलोड करने और संबंधित सेवाओं तक पहुंचने की सुविधा भी पा सकते हैं।

इसलिए गोवा का मामला सिर्फ एक तकनीकी समस्या नहीं माना जा सकता। यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि तकनीकी सिस्टम और वैधानिक चुनावी अधिकार के बीच टकराव होने पर किसकी प्राथमिकता होगी।

97 नामों में 65 एक ही विधानसभा क्षेत्र से

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, इन 97 मतदाताओं में 65 तलेगाओ विधानसभा क्षेत्र से संबंधित बताए गए हैं।

बाकी मामले सेंट क्रूज़, कुंबरजुआ, प्रियोल, मारगाओ, बेनौलिम और वेलिम विधानसभा क्षेत्रों से जुड़े बताए गए हैं।

इसका राजनीतिक संदर्भ भी महत्वपूर्ण है, लेकिन इसे किसी राजनीतिक दल के पक्ष या विपक्ष में निष्कर्ष के रूप में देखने के बजाय चुनावी प्रशासन के प्रश्न के रूप में देखना जरूरी है।

मतदाता सूची में नाम होना किसी भी नागरिक की चुनावी भागीदारी का बुनियादी हिस्सा है।

सिर्फ वोट देने का अधिकार ही नहीं, दूसरी सेवाओं पर भी असर

गोवा के संदर्भ में मतदाता सूची में नाम न होने का प्रभाव सिर्फ मतदान तक सीमित होने का दावा रिपोर्ट में किया गया है। इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, कुछ राज्य योजनाओं में पात्रता तय करने के लिए मतदाता सूची का इस्तेमाल किया जाता है।

रिपोर्ट में गोवा मेडिक्लेम योजना का भी उल्लेख है, जिसके तहत कुछ महंगे सुपर-स्पेशियलिटी इलाज के लिए सहायता दी जाती है और राज्य के मतदाताओं से जुड़ी पात्रता शर्तें लागू होती हैं।

ऐसे में किसी योग्य व्यक्ति का नाम मतदाता सूची में दर्ज न होना प्रशासनिक रिकॉर्ड की एक छोटी गलती भर नहीं रह जाती।

सबसे चिंताजनक बात: योग्य मतदाताओं को फिर Form 6 भरने को कहा गया

रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ प्रभावित मतदाताओं को मौके पर मौजूद अधिकारियों ने नए सिरे से Form 6 भरने की सलाह दी।

लेकिन Form 6 मूल रूप से नए मतदाता के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल किया जाता है। चुनाव आयोग के नागरिक सेवा पोर्टल पर भी Form 6 को नए मतदाता पंजीकरण के लिए बताया गया है।

यहीं एक व्यावहारिक सवाल पैदा होता है – अगर कोई व्यक्ति पहले से मतदाता था, SIR प्रक्रिया में उसने दस्तावेज दिए, ERO ने उसे पात्र माना और फिर तकनीकी कारण से उसका नाम अंतिम सूची में नहीं आया, तो क्या उसे नए मतदाता की तरह फिर से आवेदन करना चाहिए?

या चुनाव आयोग को ऐसी स्थिति के लिए स्वतः सुधार की व्यवस्था करनी चाहिए?

दो चुनाव आयुक्तों की आपत्तियां और गोवा का उदाहरण

इंडियन एक्सप्रेस की जांच में दावा किया गया है कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने लगभग 10 महीनों में कई बार आयोग की कार्यप्रणाली, खासकर मतदाता सूची और आईटी सिस्टम के केंद्रीकरण से संबंधित मुद्दों पर आपत्तियां दर्ज कीं।

गोवा में 97 मतदाताओं का मामला उन्हीं चिंताओं की एक ठोस मिसाल के रूप में सामने आया है।

हालांकि, इन आंतरिक आपत्तियों का अंतिम संस्थागत या कानूनी अर्थ क्या है, यह चुनाव आयोग के आधिकारिक जवाब और संबंधित दस्तावेजों के पूर्ण संदर्भ के आधार पर ही तय किया जाना चाहिए।

चुनाव आयोग से अब सबसे जरूरी जवाब क्या होना चाहिए?

गोवा की घटना के बाद जवाब सिर्फ यह नहीं होना चाहिए कि “सॉफ्टवेयर में तकनीकी समस्या थी।”

सवाल यह है कि ऐसी तकनीकी व्यवस्था क्यों बनाई गई जिसमें स्थानीय स्तर पर सुनवाई और निर्णय के बाद उसे लागू करने के लिए दिल्ली से तकनीकी हस्तक्षेप जरूरी हो जाए।

चुनाव आयोग देश की चुनावी प्रक्रिया का संवैधानिक संस्थान है। इसलिए उसकी तकनीकी प्रणालियों में भी वही सिद्धांत लागू होने चाहिए जो चुनाव प्रक्रिया में लागू होते हैं –पारदर्शिता, जवाबदेही, सुधार का अवसर और मतदाता के अधिकार की सुरक्षा।

97 लोगों की कहानी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह संख्या छोटी है, लेकिन सवाल बड़ा है।

अगर आज 97 योग्य मतदाताओं का फैसला सिस्टम में अटक सकता है, तो कल किसी भी राज्य में ऐसी तकनीकी बाधा कितने मतदाताओं को प्रभावित कर सकती है?

यही वह सवाल है जिसका स्पष्ट, दस्तावेज आधारित और सार्वजनिक जवाब चुनाव आयोग से अपेक्षित है।

अब असली सवाल यह नहीं कि 97 लोग कितने हैं।

लोकतंत्र में मतदाता सिर्फ एक संख्या नहीं होता। मतदाता सूची में दर्ज हर नाम किसी नागरिक की लोकतांत्रिक भागीदारी का रिकॉर्ड है।

गोवा के 97 मामलों में स्थानीय अधिकारियों ने सुनवाई की, दस्तावेज देखे और पात्रता पर निर्णय लिया – फिर भी नाम अंतिम सूची में नहीं आए, ऐसा इंडियन एक्सप्रेस की जांच में दस्तावेजों के आधार पर रिपोर्ट किया गया है।

अब असली सवाल यह नहीं कि 97 लोग कितने हैं।

असली सवाल यह है –

क्या चुनावी व्यवस्था में इंसानी और वैधानिक फैसला अंतिम है, या अंतिम फैसला उस सिस्टम का है जिसे इंसान ने बनाया है?

इस सवाल का जवाब सिर्फ गोवा के 97 मतदाताओं के लिए नहीं, बल्कि भारत के करोड़ों मतदाताओं के लिए महत्वपूर्ण है।

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Written & Edit by : Chandan Patel

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By Chandan Patel

चंदन पटेल AVN News से लंबे समय से जुड़े पत्रकार हैं। उन्होंने वर्ष 2020 से रिपोर्टर के रूप में पत्रकारिता की शुरुआत की और जमीनी स्तर की खबरों को प्रमुखता से उठाते हुए लगातार अपनी पहचान बनाई। वर्तमान में वे AVN News के एडिटर-इन-चीफ के रूप में समाचार संपादन, कवरेज और डिजिटल पत्रकारिता का नेतृत्व कर रहे हैं। राजनीति, खेल,स्थानीय मुद्दों, जनसमस्याओं, प्रशासनिक गतिविधियों और सामाजिक सरोकारों से जुड़ी खबरों को तथ्यपरक और सरल भाषा में पाठकों तक पहुंचाना उनकी पत्रकारिता की प्रमुख विशेषता है। उनका उद्देश्य आम लोगों की आवाज को प्रमुखता देना और विश्वसनीय खबरों के माध्यम से समाज को जागरूक करना है।

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