यह कैसा दौर है, जहाँ घर के आँगन में जले दीपक की लौ पर खामोशी है, लेकिन बाहर की आग पर राजनीति की रोटियाँ सेंकी जाती हैं। अपने ही समाज के भीतर भूख, बेरोज़गारी, जातिगत भेद, शिक्षा और स्वास्थ्य की बदहाली पर सत्ता मौन है, मगर जैसे ही मुद्दा बाहर के हिन्दू का आता है—धरना, नारे, टीवी डिबेट और सोशल मीडिया की आँधी चल पड़ती है।

घर के हिन्दू पर सब मौन

घर के हिन्दू—यानी वही किसान जो कर्ज़ में डूबा है, वही मज़दूर जो पलायन को मजबूर है, वही युवा जो डिग्री लेकर भी बेरोज़गार है—उनकी पीड़ा पर सवाल उठाना “राजनीति” नहीं माना जाता। लेकिन सीमापार या बाहरी मुद्दों पर भावनाएँ उकसाना सबसे आसान राजनीति बन गई है। क्यों? क्योंकि घर की सच्चाई से आँख मिलाना कठिन है, और बाहर की तस्वीरें दिखाकर तालियाँ बटोरना आसान।

जब देश में दलित और आदिवासी पर अत्याचार होता है तब सब मौन हो जाते तब धर्म के ठेकेदार और कथाकथी धर्म गुरु सब शांत हो जाते है तब किसी के भी जुबान से एक शब्द नहीं निकलता जब किसी दलित को शादी में घोड़ी पर नहीं बैठने दिया जाता, जब मन्दिरों में पूजा नहीं करने देते और तो ओर जब देश के सर्वोच्च पद पर बैठे राष्ट्रपति के मंदिर में जाने के बाद पूरे मंदिर को गंगा जल साफ किया जाता है तब हिन्दू खतरे में नहीं होता, तब कोई भी टीवी पर चर्चा नहीं करते, इसका मतलब साफ है धर्म का आड़ ये लोग जब लेते है जब सत्ता में बैठे मठाधीशों की नाकामियों को छुपाने के लिए किया जाता है। वही सब से बड़ी बात यह है कि देश की बड़ी मीडिया हाऊसों की अंतर आत्मा मर गई है, क्योंकि उनका काम सत्ता का चरण वंदना करने से फुरसत मिले ओर उनकी  महिमा मंडल से जब समय मिलेगा तभी तो जनता की बात करेंगे । क्योंकि ऐसा करने पर सरकार से बड़े बड़े विज्ञापन के रूप में मोटा पैसा मिलता है और इसके लिए ज़मीर तो मारना ही पड़ेगा और फिर सत्ता से सवाल करने का कोई भी सवाल नहीं उठता।

धर्म अगर सचमुच आस्था है, तो आस्था का पहला इम्तिहान इंसाफ़

धर्म अगर सचमुच आस्था है, तो आस्था का पहला इम्तिहान इंसाफ़ है। मंदिरों की सीढ़ियों पर माथा टेकने से पहले, क्या सत्ता ने स्कूलों की टूटी छतें देखीं? क्या अस्पतालों के खाली बेड, किसानों की आत्महत्याएँ, और दलित-पिछड़े हिन्दुओं पर रोज़मर्रा के अत्याचार देखे? अगर नहीं, तो सवाल उठता है—यह धर्म की रक्षा है या सत्ता की?

हिन्दू समाज कोई एकरंगी भीड़ नहीं है। वह गाँव-शहर, अमीर-गरीब, सवर्ण-दलित, मज़दूर-किसान—सबका संगम है। जब सत्ता घर के हिन्दुओं को जाति और वर्ग में बाँटकर उनके हक़ की आवाज़ दबाती है, और बाहर के मुद्दों पर भावुक नारे लगवाती है, तब यह साफ़ हो जाता है कि उद्देश्य एकता नहीं, वोटों की खेती है।

देशभक्ति और धर्म की कसौटी नारे नहीं, नीतियाँ होती हैं। अगर सत्ता सच में हिन्दू हितैषी है, तो उसे घर के हिन्दुओं के लिए रोज़गार, शिक्षा, स्वास्थ्य और सम्मान की गारंटी देनी होगी। वरना बाहर के हिन्दू पर धरना, घर के हिन्दू पर चुप्पी—यह इतिहास में पाखंड के रूप में दर्ज होगा।

घर

आज ज़रूरत है कि सवाल पूछे जाएँ—

भावनाओं से नहीं, हक़ से। क्योंकि धर्म सत्ता का हथियार नहीं, समाज की ज़िम्मेदारी है। और जो सत्ता घर की पीड़ा पर मौन रहे, उसकी तालियों की गूँज बहुत दूर तक नहीं जाती।

सवाल जनता के हैं, जवाब सत्ता को देने होंगे।

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By Chandan Patel

चंदन पटेल AVN News से लंबे समय से जुड़े पत्रकार हैं। उन्होंने वर्ष 2020 से रिपोर्टर के रूप में पत्रकारिता की शुरुआत की और जमीनी स्तर की खबरों को प्रमुखता से उठाते हुए लगातार अपनी पहचान बनाई। वर्तमान में वे AVN News के एडिटर-इन-चीफ के रूप में समाचार संपादन, कवरेज और डिजिटल पत्रकारिता का नेतृत्व कर रहे हैं। राजनीति, खेल,स्थानीय मुद्दों, जनसमस्याओं, प्रशासनिक गतिविधियों और सामाजिक सरोकारों से जुड़ी खबरों को तथ्यपरक और सरल भाषा में पाठकों तक पहुंचाना उनकी पत्रकारिता की प्रमुख विशेषता है। उनका उद्देश्य आम लोगों की आवाज को प्रमुखता देना और विश्वसनीय खबरों के माध्यम से समाज को जागरूक करना है।

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