नई दिल्ली। दिल्ली में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग की प्रक्रिया पर अहम सवाल उठाए हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि मतदाता पंजीकरण से जुड़े फॉर्म-6, 7 और 8 के निर्धारित प्रारूप में बदलाव नहीं किया जा सकता। साथ ही, कोर्ट ने सवाल किया कि जब राजधानी में निकट भविष्य में कोई चुनाव नहीं होने वाला है, तो मतदाताओं के पंजीकरण के लिए 30 अक्टूबर की समय-सीमा पर इतना जोर क्यों दिया जा रहा है?
मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने चुनाव आयोग से उन लोगों के लिए आसान समाधान निकालने को कहा, जो किसी कारणवश अपना पंजीकरण फॉर्म जमा नहीं कर पाए हैं। अदालत ने यह भी कहा कि चुनाव आयोग को केवल मतदाताओं के आवेदन करने का इंतजार नहीं करना चाहिए, बल्कि उन्हें पंजीकरण की प्रक्रिया में मदद करने के लिए सीधे संपर्क करना चाहिए।
फॉर्म-6, 7 और 8 में बदलाव पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी
दिल्ली में SIR से संबंधित विभिन्न याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने मतदाता पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म को लेकर सवाल उठाए।
अदालत ने कहा कि फॉर्म-6, 7 और 8 निर्धारित प्रारूप हैं और इनमें बदलाव नहीं किया जा सकता।
पीठ ने विशेष रूप से सवाल किया कि जिन लोगों के नाम पहले से मतदाता सूची में शामिल हैं, उनसे दोबारा नाम दर्ज कराने के लिए फॉर्म-6 क्यों भरवाया जा रहा है? जबकि फॉर्म-6 का इस्तेमाल नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए किया जाता है।
अदालत की टिप्पणी का मुख्य उद्देश्य यह था कि पहले से पंजीकृत मतदाताओं को दोबारा पंजीकरण कराने की प्रक्रिया में अनावश्यक परेशानी का सामना न करना पड़े।
जब चुनाव नहीं, तो 30 अक्टूबर की डेडलाइन क्यों?
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने मतदाता पंजीकरण के लिए निर्धारित 30 अक्टूबर की समय-सीमा पर भी सवाल उठाए।
मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने पूछा कि जब दिल्ली में निकट भविष्य में कोई चुनाव नहीं होने वाला है, तो चुनाव आयोग समय-सीमा को लेकर इतना जोर क्यों दे रहा है?
पीठ ने कहा कि नामों को फिर से दर्ज कराने के लिए कोई अंतिम तारीख यानी कट-ऑफ डेट तय नहीं की जानी चाहिए।
अदालत ने चुनाव आयोग से कहा कि वह ऐसे मतदाताओं के लिए व्यावहारिक और आसान रास्ता निकाले, जो किसी कारण से निर्धारित समय के भीतर अपना पंजीकरण फॉर्म जमा नहीं कर पाए।
पहले से मतदाता रहे लोगों के लिए निकले आसान समाधान
सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर भी जोर दिया कि जिन लोगों के नाम पहले मतदाता सूची में शामिल थे, लेकिन अब सूची में नहीं हैं, उनकी स्थिति को ध्यान में रखकर समाधान निकाला जाना चाहिए।
पीठ ने कहा कि ऐसे लोगों को नए मतदाता मानकर प्रक्रिया में शामिल करने के बजाय उनकी वास्तविक स्थिति के अनुसार उचित व्यवस्था की जानी चाहिए।
अदालत की इस टिप्पणी से मतदाता सूची में पहले से दर्ज नामों और दोबारा पंजीकरण की प्रक्रिया को लेकर उठ रहे सवालों को नई दिशा मिली है।
मतदाताओं तक खुद पहुंचे चुनाव आयोग: सुप्रीम कोर्ट
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि चुनाव आयोग को केवल इस बात का इंतजार नहीं करना चाहिए कि मतदाता खुद आवेदन जमा करें। इसके बजाय, आयोग को सीधे मतदाताओं तक पहुंचने और उनकी समस्याओं का समाधान करने की कोशिश करनी चाहिए।
पीठ ने सुझाव दिया कि चुनाव आयोग फॉर्म-6 और फॉर्म-8 के माध्यम से आवेदन स्वीकार करने की प्रक्रिया जारी रखे और मतदाताओं के लिए सबसे आसान समाधान अपनाए।
अदालत की इस टिप्पणी का जोर पंजीकरण प्रक्रिया को सरल बनाने और उन लोगों को अवसर देने पर था, जो किसी वजह से समय पर आवेदन जमा नहीं कर सके।
समय-सीमा बढ़ाने पर चुनाव आयोग ने जताई सहमति
सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग ने आवेदन जमा करने की समय-सीमा बढ़ाने पर सहमति जताई है।
इस मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने की। पीठ में जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना भी शामिल थे।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों के बाद अब मतदाताओं के पंजीकरण की प्रक्रिया, निर्धारित समय-सीमा और पहले से मतदाता सूची में शामिल लोगों के लिए उपलब्ध समाधान पर सबकी नजर रहेगी।
मुख्य सवाल यही है कि मतदाता सूची को दुरुस्त करने की प्रक्रिया में किसी योग्य मतदाता को केवल प्रक्रिया की जटिलता या समय-सीमा के कारण परेशानी का सामना न करना पड़े।
Written & Edit by : Chandan Patel
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