मणिपुर हिंसा 2026: मणिपुर में एक बार फिर हिंसा की घटनाओं ने शांति बहाली की कोशिशों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। अक्टूबर में राज्य के अलग-अलग इलाकों में गोलीबारी, नागरिकों की हत्या, गांवों में आगजनी और सामुदायिक तनाव की घटनाएं सामने आई हैं। कामजोंग जिले के चस्साद गांव से लेकर थाउबल और इंफाल के आसपास के इलाकों तक हिंसा की घटनाओं ने आम लोगों की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा दी है। हालात ऐसे हैं कि कई परिवारों को अपने घर छोड़ने पड़े हैं, जबकि सुरक्षा बलों के सामने हिंसा पर काबू पाने और संवेदनशील इलाकों में शांति बनाए रखने की चुनौती है।
अक्टूबर के मध्य में चस्साद गांव में गोलीबारी और आगजनी की घटनाओं में लोगों की जान गई और कई लोग घायल हुए। इसके बाद 18 अक्टूबर को थाउबल जिले के खंगाबोक में एक कार्यक्रम के दौरान हिंसक झड़प की खबर सामने आई। 19 अक्टूबर को नोंगसुम पहाड़ियों के पास लकड़ी इकट्ठा करने गए तीन मैतेई युवकों की हत्या की सूचना मिली। अगले दिन कांगपोकपी जिले में बांस इकट्ठा कर रहे एक कुकी व्यक्ति की गोली मारकर हत्या कर दी गई। इन घटनाओं ने राज्य में फिर से तनाव बढ़ा दिया है।
मणिपुर में ताजा हिंसा केवल कानून-व्यवस्था का मामला नहीं है। इसके पीछे लंबे समय से चला आ रहा जातीय अविश्वास, विस्थापन, उग्रवादी संगठनों की गतिविधियां और सुरक्षा व्यवस्था से जुड़े सवाल भी हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर राज्य में शांति की कोशिशों के बीच हिंसा दोबारा क्यों बढ़ रही है और सरकार इससे निपटने के लिए क्या कदम उठा रही है?
मणिपुर में 2023 से अब तक क्या-क्या हुआ?
मणिपुर में मई 2023 में शुरू हुआ जातीय संघर्ष राज्य के सामाजिक और राजनीतिक जीवन को गहराई से प्रभावित कर चुका है। मैतेई और कुकी-जो समुदायों के बीच तनाव के दौरान बड़ी संख्या में लोगों की जान गई, हजारों परिवार विस्थापित हुए और कई घरों तथा संपत्तियों को नुकसान पहुंचा।
2023: जातीय संघर्ष ने लिया हिंसक रूप
मणिपुर में मैतेई समुदाय को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने की मांग से जुड़ी चिंताओं के बीच 3 मई 2023 को आयोजित जनजातीय एकजुटता मार्च के बाद व्यापक हिंसा भड़क उठी। इसके बाद राज्य के कई हिस्सों में आगजनी, गोलीबारी और हमलों की घटनाएं सामने आईं।
हिंसा के कारण मैतेई और कुकी-जो समुदायों के बीच अविश्वास बढ़ता गया। कई इलाकों में लोगों का एक-दूसरे के क्षेत्रों में आना-जाना मुश्किल हो गया। हजारों लोगों को राहत शिविरों में शरण लेनी पड़ी। राज्य में शांति बहाल करने के लिए सुरक्षा बलों की तैनाती बढ़ाई गई, लेकिन सामान्य स्थिति बहाल करने की चुनौती बनी रही।
2024: विधानसभा का प्रस्ताव और लोकसभा चुनाव में भाजपा को झटका
फरवरी 2024 में मणिपुर विधानसभा ने केंद्र सरकार से कुकी-जो उग्रवादी संगठनों के साथ जारी सस्पेंशन ऑफ ऑपरेशन्स (SoO) समझौते को समाप्त करने की मांग वाला प्रस्ताव पारित किया।
हिंसा का असर राज्य की राजनीति पर भी पड़ा। 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा मणिपुर की दोनों संसदीय सीटें हार गई और कांग्रेस के उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की। इससे राज्य में जारी संकट को लेकर राजनीतिक बहस और तेज हो गई।
2025: मुख्यमंत्री का इस्तीफा और केंद्रीय हस्तक्षेप
हिंसा रोकने में नाकामी के आरोपों और बढ़ते राजनीतिक दबाव के बीच तत्कालीन मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह ने फरवरी 2025 में अपने पद से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू किया गया।
जून 2025 में इंफाल में तनाव बढ़ने के बाद कर्फ्यू और इंटरनेट प्रतिबंध लगाए जाने की खबरें सामने आईं। सितंबर 2025 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मणिपुर का दौरा किया। इसके बाद राज्य में राजनीतिक नेतृत्व की बहाली की प्रक्रिया आगे बढ़ी और युमनाम खेमचंद सिंह मुख्यमंत्री बने।
2026: पहाड़ी जिलों में नई झड़पों से बढ़ी चिंता
2026 में कुकी और नगा समुदायों के बीच तनाव और हिंसक घटनाओं की खबरें सामने आईं। कामजोंग और आसपास के क्षेत्रों में गोलीबारी, गांवों में आगजनी और नागरिकों की मौत की घटनाओं ने स्थिति को और संवेदनशील बना दिया।
7 अप्रैल 2026 को बिष्णुपुर जिले के ट्रोंगलाओबी में एक घर में हुए बम विस्फोट में दो बच्चों की मौत की खबर सामने आई थी। इस घटना के बाद विरोध प्रदर्शन और सुरक्षा बलों के साथ टकराव की स्थिति भी बनी।
21 अगस्त 2026 को लंबे समय से बंद इंफाल-दीमापुर-गुवाहाटी अंतरराज्यीय बस सेवा दोबारा शुरू हुई। इसे संपर्क व्यवस्था और सामान्य जनजीवन बहाल करने की दिशा में अहम कदम माना गया।
हालांकि, 4 सितंबर 2026 को केंद्र, मणिपुर सरकार और कुकी-जो उग्रवादी संगठनों के बीच लागू सस्पेंशन ऑफ ऑपरेशन्स समझौते का नवीनीकरण नहीं हुआ। इसके बाद अक्टूबर में बढ़ती हिंसा ने सुरक्षा और शांति प्रक्रिया को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए।
अक्टूबर 2026 में मणिपुर में हिंसा क्यों बढ़ी?
अक्टूबर में राज्य के अलग-अलग इलाकों से सामने आई घटनाएं बताती हैं कि हिंसा का खतरा अभी पूरी तरह टला नहीं है। हालांकि, सभी घटनाओं के पीछे एक ही समूह या एक ही कारण होने की पुष्टि नहीं हुई है। अलग-अलग घटनाओं की जांच और जिम्मेदार लोगों की पहचान महत्वपूर्ण है।
1. चस्साद गांव में गोलीबारी और आगजनी
कामजोंग जिले का चस्साद गांव अक्टूबर में हिंसा के प्रमुख केंद्रों में शामिल रहा। 17 अक्टूबर को यहां गोलीबारी में एक कुकी व्यक्ति की मौत हुई और कई लोग घायल हुए। इसके बाद गांव में आगजनी की घटनाएं सामने आईं।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, आग में कम से कम 15 घर जल गए। कुछ अन्य रिपोर्टों में इससे अधिक घरों के प्रभावित होने की बात कही गई। हिंसा के कारण कई ग्रामीणों को सुरक्षित स्थानों की ओर जाना पड़ा।
क्षेत्र में कुकी और नगा समुदायों से जुड़े समूहों के बीच तनाव की खबरें सामने आई हैं। हालांकि, हमलों की जिम्मेदारी और घटनाओं की पूरी परिस्थितियों की पुष्टि जांच के आधार पर ही की जानी चाहिए। सुरक्षा बलों को क्षेत्र में तैनात किए जाने की भी खबर है।
2. थाउबल जिले में कार्यक्रम के दौरान हिंसक झड़प
18 अक्टूबर को थाउबल जिले के खंगाबोक गांव में एक संगीत कार्यक्रम के दौरान पथराव और गोलीबारी की घटना सामने आई। रिपोर्टों के मुताबिक, इस हिंसक घटना में एक व्यक्ति की मौत हुई।
इस घटना ने घाटी के इलाकों में भी तनाव बढ़ने की आशंका पैदा कर दी। स्थानीय प्रशासन के सामने भीड़ को नियंत्रित करने, हिंसा को फैलने से रोकने और आम लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की चुनौती रही।
3. नोंगसुम पहाड़ियों के पास तीन युवकों की हत्या
19 अक्टूबर को नोंगसुम पहाड़ियों के पास लकड़ी इकट्ठा करने गए तीन मैतेई युवकों की गोली मारकर हत्या किए जाने की खबर सामने आई। मृतकों की पहचान अरुबम रोनिल, लैरेनलाकपम इनाओबी और क्षत्रियमयूम सुशील के रूप में बताई गई।
घटना के बाद क्षेत्र में तनाव बढ़ गया। इस हमले में शामिल लोगों की पहचान और घटना के पीछे की परिस्थितियों की जांच महत्वपूर्ण है। किसी भी समुदाय को सामूहिक रूप से जिम्मेदार ठहराने के बजाय दोषियों के खिलाफ प्रमाणों के आधार पर कार्रवाई की जरूरत है।
4. कांगपोकपी में बांस इकट्ठा कर रहे व्यक्ति की हत्या
20 अक्टूबर को कांगपोकपी जिले में बांस इकट्ठा करने गए 45 वर्षीय कुकी-जो व्यक्ति पाओलेन खोंगसाई की गोली मारकर हत्या किए जाने की खबर सामने आई। रिपोर्टों के अनुसार, उनके साथ मौजूद एक अन्य व्यक्ति हमले में बच गया।
इस घटना ने पहले से तनावग्रस्त क्षेत्र में नागरिकों की सुरक्षा को लेकर चिंता और बढ़ा दी। लगातार सामने आ रही ऐसी घटनाओं से ग्रामीण इलाकों में सामान्य जीवन प्रभावित हो रहा है।
5. क्या अक्टूबर में 10 या 14 लोगों की मौत हुई?
अक्टूबर में हिंसा से जुड़ी मौतों की संख्या को लेकर अलग-अलग दावे सामने आए हैं। उपलब्ध खबरों में 17 से 20 अक्टूबर के बीच कई अलग-अलग घटनाओं में लोगों की मौत की सूचना दी गई है।
पूर्व मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह ने 10 अक्टूबर को सोशल मीडिया पर हिंसा में सात लोगों की मौत का दावा किया था। वहीं, कुछ समाचार रिपोर्टों में अलग-अलग घटनाओं के लिए कम संख्या बताई गई।
ऐसे में पूरे महीने या किसी निश्चित 15 दिन की अवधि में मृतकों की सटीक संख्या बताने से पहले सभी घटनाओं, तारीखों और आधिकारिक आंकड़ों का मिलान जरूरी है। अलग-अलग घटनाओं में दर्ज मौतों को दोबारा गिनने या अपुष्ट दावों को आधिकारिक आंकड़ा बताने से बचना चाहिए।
गांवों में आगजनी: घर छोड़ने को मजबूर परिवार
मणिपुर में ताजा हिंसा का सबसे गंभीर पहलू ग्रामीण बस्तियों में आगजनी और नागरिकों का विस्थापन है। कामजोंग जिले के चस्साद गांव में अक्टूबर के मध्य में कई घरों को आग के हवाले किए जाने की खबर आई।
इस तरह की घटनाओं से केवल मकान ही नहीं जलते, बल्कि परिवारों की आजीविका, जरूरी दस्तावेज, घरेलू सामान और वर्षों की जमा-पूंजी भी नष्ट हो जाती है। विस्थापित परिवारों को सुरक्षित आश्रय, भोजन, चिकित्सा और बच्चों की पढ़ाई जैसी बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष करना पड़ता है।
प्रशासन के सामने अब दोहरी चुनौती है – एक तरफ हिंसा में शामिल लोगों के खिलाफ कार्रवाई करना और दूसरी तरफ प्रभावित परिवारों की सुरक्षित वापसी के लिए भरोसेमंद माहौल तैयार करना।
मणिपुर हिंसा के पीछे ड्रग तस्करी का नेटवर्क? खुफिया इनपुट पर क्या दावा है?
मणिपुर की भौगोलिक स्थिति इसे भारत-म्यांमार सीमा पर सुरक्षा की दृष्टि से संवेदनशील बनाती है। सीमावर्ती इलाकों में अवैध हथियारों, नशीले पदार्थों की तस्करी और सशस्त्र समूहों की गतिविधियों पर लंबे समय से चिंता जताई जाती रही है।
आपके उपलब्ध इनपुट में दावा किया गया है कि खुफिया एजेंसियों को मणिपुर और पूर्वोत्तर में हिंसा के पीछे ऐसे नेटवर्क की भूमिका का संदेह है, जो अशांति का फायदा उठाकर नशीले पदार्थों की तस्करी और अवैध गतिविधियों को बढ़ावा देना चाहते हैं।
इस दावे के अनुसार, हिंसा बढ़ने पर सुरक्षा बलों और प्रशासन का ध्यान कानून-व्यवस्था संभालने में लग जाता है। इससे तस्करी के नेटवर्क को अपनी गतिविधियां चलाने का अवसर मिल सकता है।
म्यांमार सीमा और नशीले पदार्थों की तस्करी
मणिपुर की म्यांमार से लगती सीमा के कारण सुरक्षा एजेंसियों के लिए सीमा पार तस्करी पर नियंत्रण एक महत्वपूर्ण चुनौती है। हेरोइन और याबा जैसे नशीले पदार्थों के साथ अवैध हथियारों की आवाजाही रोकने के लिए निगरानी, खुफिया सूचनाओं का आदान-प्रदान और संयुक्त अभियान जरूरी हैं।
हालांकि, मणिपुर में हालिया हिंसा की सभी घटनाओं को किसी एक ड्रग कार्टेल या तस्करी नेटवर्क से जोड़ने के लिए ठोस सबूत और आधिकारिक पुष्टि आवश्यक है। खुफिया इनपुट में व्यक्त संदेह को जांच से पहले स्थापित तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जाना चाहिए।
मणिपुर में हिंसा रोकने के लिए सरकार क्या कर रही है?
ताजा घटनाओं के बाद सुरक्षा बलों और प्रशासन की भूमिका अहम हो गई है। सरकार के सामने हिंसा पर नियंत्रण, दोषियों की गिरफ्तारी, नागरिकों की सुरक्षा और प्रभावित परिवारों को राहत पहुंचाने जैसी कई प्राथमिकताएं हैं।
1. सुरक्षा बलों की तैनाती और तलाशी अभियान
रिपोर्टों के मुताबिक, हिंसा प्रभावित इलाकों में असम राइफल्स, सीमा सुरक्षा बल (BSF) और स्थानीय पुलिस की तैनाती की गई है। सुरक्षा बलों का उद्देश्य संवेदनशील क्षेत्रों में स्थिति नियंत्रित करना, नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना और हमलों में शामिल संदिग्धों का पता लगाना है।
हालांकि, किसी विशेष अभियान में शामिल सभी एजेंसियों, बरामद हथियारों या गिरफ्तार लोगों की संख्या की पुष्टि संबंधित सुरक्षा एजेंसियों के आधिकारिक बयान से की जानी चाहिए।
2. उग्रवादी शिविरों की निगरानी और जांच
सस्पेंशन ऑफ ऑपरेशन्स समझौते के तहत बनाए गए शिविर लंबे समय से मणिपुर की सुरक्षा व्यवस्था और शांति प्रक्रिया का हिस्सा रहे हैं।
आपके इनपुट में दावा किया गया है कि सुरक्षा बलों ने कांगपोकपी जिले के सिनाई स्थित एक शिविर में जांच की और हथियारों तथा संदिग्ध गतिविधियों से जुड़े मामले सामने आए। साथ ही अन्य शिविरों की भी जांच शुरू किए जाने की बात कही गई है।
इन दावों को प्रकाशित करने से पहले शिविर की स्थिति, पंजीकृत कैडरों की संख्या, गिरफ्तारी और बरामदगी से संबंधित आधिकारिक विवरण की पुष्टि जरूरी है।
3. कर्फ्यू और प्रतिबंधात्मक आदेश
हिंसा प्रभावित क्षेत्रों में प्रशासन कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए निषेधाज्ञा और अन्य प्रतिबंधात्मक कदम उठा सकता है। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 के तहत सक्षम अधिकारी कुछ परिस्थितियों में लोगों की आवाजाही और सभाओं पर प्रतिबंध लगा सकते हैं।
हालांकि, मणिपुर के किन जिलों या गांवों में कौन-सा आदेश लागू है, इसकी जानकारी स्थानीय प्रशासन की ताजा अधिसूचना से ही दी जानी चाहिए। किसी एक इलाके में लागू आदेश को पूरे राज्य पर लागू बताना उचित नहीं होगा।
4. मुख्यमंत्री की शांति बहाली की पहल
मुख्यमंत्री युमनाम खेमचंद सिंह के सामने विभिन्न समुदायों के बीच संवाद बहाल करना और हिंसा प्रभावित क्षेत्रों में भरोसा कायम करना बड़ी चुनौती है।
शांति प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए समुदायों के प्रतिनिधियों, नागरिक संगठनों, निर्वाचित जनप्रतिनिधियों और सुरक्षा एजेंसियों के बीच बातचीत महत्वपूर्ण हो सकती है। प्रधानमंत्री और केंद्रीय गृह मंत्रालय का सहयोग भी सुरक्षा तथा राजनीतिक समाधान की दिशा में अहम भूमिका निभा सकता है।
लेकिन किसी विशेष शांति समिति के गठन, बैठक या सरकारी आश्वासन का विवरण प्रकाशित करने से पहले मुख्यमंत्री कार्यालय अथवा संबंधित सरकारी बयान से पुष्टि की जानी चाहिए।
5. राहत, इलाज और पुनर्वास
हिंसा में घायल लोगों का उपचार, विस्थापित परिवारों के लिए सुरक्षित आश्रय और जले हुए घरों के पुनर्निर्माण की व्यवस्था तत्काल प्राथमिकताओं में शामिल होनी चाहिए।
इसके साथ ही बच्चों की पढ़ाई, आजीविका के साधनों की बहाली और प्रभावित परिवारों को सरकारी सहायता उपलब्ध कराना भी जरूरी है। शांति की कोशिश तभी प्रभावी होगी, जब लोगों को सुरक्षा के साथ सामान्य जीवन में लौटने का अवसर मिलेगा।
क्या है सस्पेंशन ऑफ ऑपरेशन्स (SoO) समझौता?
सस्पेंशन ऑफ ऑपरेशन्स यानी SoO समझौता कुकी-जो समुदाय से जुड़े कुछ सशस्त्र संगठनों और सरकार के बीच हिंसा रोकने तथा बातचीत का रास्ता खोलने के उद्देश्य से बनाया गया एक महत्वपूर्ण तंत्र रहा है।
इसका उद्देश्य सशस्त्र समूहों और सुरक्षा बलों के बीच मुठभेड़ों को रोकना, हथियारों की निगरानी करना और राजनीतिक संवाद के लिए परिस्थितियां तैयार करना रहा है।
SoO समझौते की शुरुआत कब हुई?
कुकी उग्रवादी संगठनों के साथ संघर्षविराम की प्रक्रिया 2000 के दशक में आगे बढ़ी। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, 2005 में सैन्य अभियान रोकने से जुड़ी सहमति की शुरुआत हुई और अगस्त 2008 में केंद्र सरकार, मणिपुर सरकार तथा कुकी नेशनल ऑर्गनाइजेशन (KNO) और यूनाइटेड पीपुल्स फ्रंट (UPF) से जुड़े संगठनों के बीच औपचारिक समझौता हुआ।
समझौते का उद्देश्य हिंसा में कमी लाना और राजनीतिक समाधान के लिए बातचीत की गुंजाइश तैयार करना था।
समझौते की प्रमुख शर्तें क्या थीं?
समझौते की व्यवस्था के तहत शामिल सशस्त्र समूहों के कैडरों को निर्धारित नियमों का पालन करना होता है। इनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं:
- हिंसक गतिविधियों से दूर रहना।
- हथियारों को तय सुरक्षा व्यवस्था के तहत रखना।
- पंजीकृत कैडरों का निर्धारित शिविरों में रहना।
- सरकार की निगरानी और निर्धारित प्रक्रियाओं का पालन करना।
- राजनीतिक समाधान के लिए बातचीत की प्रक्रिया में शामिल होना।
इन शर्तों के पालन और निगरानी को लेकर समय-समय पर विवाद सामने आते रहे हैं।
सितंबर 2026 में समझौते का नवीनीकरण नहीं हुआ
आपके इनपुट के मुताबिक, 4 सितंबर 2026 को SoO समझौते की अवधि समाप्त हो गई और उसे आगे नहीं बढ़ाया गया। यदि इसकी आधिकारिक पुष्टि हो चुकी है, तो यह मणिपुर की सुरक्षा और शांति प्रक्रिया के लिहाज से एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम है।
समझौते को लेकर अलग-अलग समुदायों और संगठनों की राय अलग रही है। कुछ समूह इसे समाप्त करने की मांग करते रहे हैं, जबकि शांति प्रक्रिया के समर्थक इसे बातचीत और हिंसा पर नियंत्रण के लिए उपयोगी मानते हैं।
समझौते का भविष्य तय करते समय सरकार के सामने यह सुनिश्चित करने की चुनौती है कि हिंसा में कमी आए, नागरिकों की सुरक्षा बनी रहे और राजनीतिक संवाद का रास्ता बंद न हो।
मणिपुर में शांति बहाली के सामने सबसे बड़ी चुनौतियां
मणिपुर में हिंसा का स्थायी समाधान केवल सुरक्षा बलों की तैनाती से संभव नहीं है। इसके लिए प्रशासनिक कार्रवाई के साथ सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर भी ठोस प्रयास जरूरी हैं।
पहली चुनौती – नागरिकों की सुरक्षा: ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोगों को बिना डर के घर से बाहर निकलने, काम करने और अपने गांवों में रहने का भरोसा मिलना चाहिए।
दूसरी चुनौती – दोषियों के खिलाफ कार्रवाई: गोलीबारी, हत्या और आगजनी की घटनाओं की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। दोषियों की पहचान और कानूनी कार्रवाई से ही कानून के प्रति भरोसा मजबूत होगा।
तीसरी चुनौती – विस्थापित परिवारों की वापसी: हजारों परिवारों के पुनर्वास, सुरक्षा और आजीविका की व्यवस्था के बिना सामान्य स्थिति बहाल करना मुश्किल होगा।
चौथी चुनौती – समुदायों के बीच संवाद: मैतेई, कुकी-जो और नगा समुदायों के बीच अविश्वास कम करने के लिए निरंतर बातचीत और स्थानीय स्तर पर शांति प्रयास जरूरी हैं।
पांचवीं चुनौती – सीमा पार अवैध गतिविधियों पर नियंत्रण: यदि तस्करी या हथियारों की आवाजाही का कोई प्रमाण मिलता है, तो उसके खिलाफ समन्वित और प्रमाण-आधारित कार्रवाई की जानी चाहिए।
निष्कर्ष: मणिपुर को फिर शांति की जरूरत
मणिपुर में अक्टूबर के दौरान सामने आई हिंसक घटनाओं ने एक बार फिर स्पष्ट कर दिया है कि राज्य में शांति बहाली का रास्ता अभी आसान नहीं है। गोलीबारी, नागरिकों की मौत और घरों में आगजनी से आम लोगों के मन में असुरक्षा बढ़ती है और अलग-अलग समुदायों के बीच अविश्वास गहरा सकता है।
सरकार और सुरक्षा एजेंसियों के लिए सबसे जरूरी है कि हिंसा में शामिल लोगों के खिलाफ निष्पक्ष कार्रवाई हो, प्रभावित परिवारों को राहत मिले और निर्दोष नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।
साथ ही, शांति बहाली की प्रक्रिया को केवल अस्थायी सुरक्षा उपायों तक सीमित नहीं रखा जा सकता। इसके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति, समुदायों के बीच संवाद, जवाबदेह प्रशासन और न्यायपूर्ण पुनर्वास की जरूरत है।
मणिपुर में स्थायी शांति तभी संभव है, जब हर समुदाय के नागरिक को सुरक्षा, न्याय और सम्मान के साथ जीने का भरोसा मिले।
Written & Edit by : Chandan Patel
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