नई दिल्ली: जंतर-मंतर पर प्रदर्शन को लेकर दिल्ली पुलिस की कार्रवाई के बाद हिरासत में लिए गए कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेता सौरव दास और आशुतोष रांका को सात दिन बाद जमानत मिल गई है। दोनों नेताओं को 13 अक्टूबर को तिरंगा लेकर जंतर-मंतर पहुंचने और कथित तौर पर शांति व्यवस्था से जुड़े नियमों का उल्लंघन करने के आरोप में हिरासत में लिया गया था। इस मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने सीधे हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए याचिकाकर्ताओं को पहले कानूनी प्रक्रिया के तहत रिवीजन पिटीशन दाखिल करने का विकल्प अपनाने को कहा था।
दोनों नेताओं की हिरासत 19 अक्टूबर को दो दिन के लिए और बढ़ा दी गई थी। इसके बाद अब दिल्ली की स्पेशल कोर्ट (SEM) से उन्हें जमानत मिलने की खबर सामने आई है। हालांकि, जमानत मिलने का मतलब मामले का खत्म होना नहीं है। दोनों मामलों की जांच दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच कर रही है।
13 अक्टूबर को तिरंगा लेकर जंतर-मंतर पहुंचे थे CJP नेता
कॉकरोच जनता पार्टी के नेता सौरव दास और आशुतोष रांका 13 अक्टूबर को करीब 8 से 10 समर्थकों के साथ तिरंगा लेकर जंतर-मंतर पहुंचे थे। इससे एक दिन पहले, 12 अक्टूबर को, सरकार ने जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने पर रोक लगा दी थी।
पुलिस ने दोनों नेताओं के खिलाफ शांति व्यवस्था से जुड़े नियमों के उल्लंघन के आरोप में कार्रवाई की। इसके बाद उन्हें पांच दिन के लिए जेल भेजा गया। 19 अक्टूबर को उनकी हिरासत दो दिन और बढ़ा दी गई।
इस कार्रवाई को चुनौती देने के लिए दोनों नेताओं ने दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया था, लेकिन हाईकोर्ट ने सीधे हस्तक्षेप करने के बजाय उन्हें वैकल्पिक कानूनी प्रक्रिया अपनाने की सलाह दी।
दिल्ली हाईकोर्ट ने सीधे अनुच्छेद 226 के तहत याचिका पर क्यों नहीं की सुनवाई?
दिल्ली हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान सवाल उठाया कि जब मजिस्ट्रेट के आदेश को चुनौती देने के लिए कानून में रिवीजन पिटीशन का विकल्प उपलब्ध है, तो सीधे संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत याचिका क्यों दायर की गई?
अदालत ने कहा कि जब किसी आदेश को चुनौती देने के लिए कानून में अलग प्रक्रिया निर्धारित है, तो पहले उसी प्रक्रिया का इस्तेमाल किया जाना चाहिए।
इसी आधार पर कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को मौजूदा याचिका वापस लेकर रिवीजन पिटीशन दाखिल करने को कहा। इसके बाद सौरव दास और आशुतोष रांका ने अपनी याचिकाएं वापस ले लीं।
अनुच्छेद 226 और रिवीजन पिटीशन में क्या अंतर है?
अनुच्छेद 226: इसके तहत हाईकोर्ट मौलिक अधिकारों और अन्य कानूनी अधिकारों के संरक्षण के लिए रिट जारी कर सकता है। सरकारी प्राधिकरण की कार्रवाई को चुनौती देने के लिए भी इसका इस्तेमाल किया जा सकता है।
रिवीजन पिटीशन: इसके तहत कानून में निर्धारित परिस्थितियों में निचली अदालत के आदेश की वैधता, औचित्य या प्रक्रिया की जांच के लिए उच्चतर अदालत का रुख किया जाता है।
इस मामले में हाईकोर्ट ने उपलब्ध वैकल्पिक कानूनी उपाय का इस्तेमाल करने पर जोर दिया था।
दिल्ली हाईकोर्ट की सुनवाई में सामने आईं चार अहम बातें
जस्टिस सुब्रमण्यम प्रसाद की अदालत में हुई सुनवाई के दौरान दोनों नेताओं की कार्रवाई, प्रदर्शन की अनुमति और शांति व्यवस्था को लेकर कई सवाल उठाए गए।
1. शांति बनाए रखने के बॉन्ड पर अदालत ने उठाया सवाल
हाईकोर्ट ने कहा कि दोनों नेताओं ने पहले शांति बनाए रखने के लिए बॉन्ड दिया था। इसके बाद दोबारा ऐसी घटना हुई।
अदालत ने सवाल उठाया कि अगर बॉन्ड तोड़ने की आशंका सही साबित हुई है, तो अधिकारियों द्वारा नियमों के तहत सख्त कार्रवाई करना गलत कैसे है?
2. बैरिकेड तोड़ने से शांति भंग होने का खतरा
सुनवाई के दौरान अदालत ने प्रदर्शन के दौरान बैरिकेड तोड़ने और उससे पैदा होने वाली संभावित स्थिति पर भी सवाल उठाए।
कोर्ट के अनुसार, प्रदर्शनकारियों के साथ दूसरे लोग भी जुड़ सकते थे, जिससे माहौल बिगड़ने की आशंका थी। अदालत ने यह भी कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन के लिए पुलिस से अनुमति ली जा सकती है, ताकि उपद्रव करने वालों को रोका जा सके।
3. दोनों नेताओं की उम्र पर कोर्ट की टिप्पणी- ‘जेन-जी नहीं हैं’
सुनवाई के दौरान अदालत ने दोनों याचिकाकर्ताओं की उम्र पूछी। उनके वकील ने बताया कि एक की उम्र 27 साल और दूसरे की उम्र 31 साल है।
इस पर अदालत ने टिप्पणी की – ‘जेन-जी नहीं हैं।’
इसके बाद कोर्ट ने पूछा कि दोनों नेता कौन हैं, क्या करते हैं और जिस संगठन से जुड़े हैं, उसका उद्देश्य क्या है।
4. जब रोक थी तो जंतर-मंतर क्यों गए?
हाईकोर्ट ने सवाल किया कि अगर जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने पर रोक थी, तो दोनों नेता वहां क्यों पहुंचे?
अदालत ने उनके पहले दिए गए बॉन्ड का जिक्र करते हुए पूछा कि वे दोबारा उसी जगह जाने की बात क्यों कर रहे हैं, जबकि जंतर-मंतर को प्रदर्शन के लिए निर्धारित स्थानों की सूची से हटाने का मामला सुप्रीम कोर्ट में है।
नोट: अदालत की टिप्पणियां सुनवाई के दौरान उठाए गए सवाल हैं। इन्हें अंतिम न्यायिक निष्कर्ष या दोषसिद्धि के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
सौरव दास और आशुतोष रांका की ओर से किसने रखी दलीलें?
इस मामले की सुनवाई जस्टिस सुब्रमण्यम प्रसाद की अदालत में हुई। सौरव दास और आशुतोष रांका की ओर से एडवोकेट अभिक चिमनी ने दलीलें रखीं।
वहीं, दिल्ली पुलिस की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा और केंद्रीय सरकार के वकील (CGSC) आशीष दीक्षित पेश हुए।
हाईकोर्ट ने सीधे याचिका पर हस्तक्षेप करने के बजाय उपलब्ध कानूनी विकल्प अपनाने को कहा, जिसके बाद याचिकाकर्ताओं ने अपनी याचिकाएं वापस ले लीं।
दोनों नेताओं के खिलाफ मामले क्राइम ब्रांच को ट्रांसफर
दिल्ली पुलिस ने सौरव दास और आशुतोष रांका से जुड़े जंतर-मंतर प्रदर्शन मामले को भी क्राइम ब्रांच को सौंप दिया है।
इससे पहले कनॉट प्लेस में दर्ज मामले की जांच भी क्राइम ब्रांच को ट्रांसफर की गई थी। अब दोनों मामलों की जांच क्राइम ब्रांच करेगी।
जांच एजेंसी दोनों मामलों से जुड़े तथ्यों और परिस्थितियों की पड़ताल करेगी। जमानत मिलने से जांच की प्रक्रिया अपने आप समाप्त नहीं होती।
AISA अध्यक्ष नेहा बोरा की याचिका पर 22 अक्टूबर को सुनवाई
दिल्ली हाईकोर्ट में ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) की अध्यक्ष नेहा बोरा की याचिका पर 22 अक्टूबर को सुनवाई होनी है।
नेहा बोरा ने दिल्ली पुलिस के उस नोटिस को चुनौती दी है, जिसमें उन्हें शांति बनाए रखने के लिए बॉन्ड भरने को कहा गया था। उन्होंने अदालत से नोटिस रद्द करने और पुलिस को उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई नहीं करने का निर्देश देने की मांग की है।
उनके वकील के अनुरोध पर जस्टिस सुब्रमण्यम प्रसाद ने सुनवाई टाल दी थी। अब इस मामले में 22 अक्टूबर को सुनवाई निर्धारित है।
CJP ने NEET पेपर लीक मामले में 36 दिन तक किया था प्रदर्शन
कॉकरोच जनता पार्टी ने इससे पहले NEET पेपर लीक मामले को लेकर भी प्रदर्शन किया था। पार्टी ने 20 जून से 25 जुलाई तक तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर आंदोलन चलाया था।
इस प्रदर्शन के दौरान एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक भी भूख हड़ताल पर बैठे थे। 20 जुलाई को CJP ने संसद तक मार्च भी निकाला था।
पार्टी के आंदोलन के दौरान शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग प्रमुख मुद्दा रही। 25 जुलाई को धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर चल रहा प्रदर्शन समाप्त हो गया था।
आगे क्या होगा?
सौरव दास और आशुतोष रांका को जमानत मिलने के बाद भी उनके खिलाफ दर्ज मामलों की जांच जारी रहेगी। जंतर-मंतर प्रदर्शन और कनॉट प्लेस से जुड़े दोनों मामले क्राइम ब्रांच के पास हैं।
वहीं, नेहा बोरा की याचिका पर 22 अक्टूबर को होने वाली सुनवाई भी महत्वपूर्ण होगी। इस मामले में अदालत का रुख यह स्पष्ट कर सकता है कि शांति बनाए रखने के लिए बॉन्ड भरने संबंधी पुलिस नोटिस को चुनौती देने पर क्या कानूनी सवाल उठते हैं।
AVN News की नजर इस मामले से जुड़ी आगे की कानूनी कार्रवाई और अदालत की सुनवाई पर बनी रहेगी।
Written & Edit by : Chandan Patel
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