नई दिल्ली। मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार की मुश्किलें सोमवार को सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के बाद और बढ़ गईं। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें तत्काल निलंबित करने या उनके खिलाफ कोई अंतरिम आदेश देने से इनकार कर दिया, लेकिन SIR से जुड़े कथित तौर पर एकतरफा लिए गए करीब 14 फैसलों पर चुनाव आयोग और केंद्र सरकार से जवाब मांग लिया। अदालत ने साफ संकेत दिया कि अगर रिकॉर्ड की जांच में यह साबित होता है कि कोई फैसला तय कानूनी प्रक्रिया के खिलाफ लिया गया था, तो उस फैसले पर आगे कार्रवाई की जा सकती है।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने कहा कि सिर्फ मीडिया रिपोर्ट के आधार पर किसी संवैधानिक पदाधिकारी के खिलाफ अंतरिम कार्रवाई नहीं की जा सकती। अदालत पहले चुनाव आयोग का जवाब और संबंधित रिकॉर्ड देखना चाहती है।
क्या है पूरा विवाद?
यह मामला चुनाव आयोग की Special Intensive Revision यानी SIR प्रक्रिया से जुड़े फैसलों को लेकर सामने आया है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि SIR से जुड़े करीब 14 महत्वपूर्ण फैसले अन्य दो चुनाव आयुक्तों की सहमति के बिना लिए गए।
याचिका में यह भी आरोप लगाया गया है कि चुनाव आयोग के भीतर लिए जाने वाले फैसलों में तीन सदस्यीय आयोग की निर्धारित निर्णय प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ। अदालत ने फिलहाल इन आरोपों को सही नहीं माना है, बल्कि चुनाव आयोग और संबंधित पक्षों से जवाब मांगकर रिकॉर्ड की जांच करने का रास्ता चुना है।
सुप्रीम कोर्ट ने ज्ञानेश कुमार को तत्काल सस्पेंड क्यों नहीं किया?
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने CEC ज्ञानेश कुमार को तत्काल अंतरिम तौर पर पद से रोकने की मांग की। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केवल अखबार में प्रकाशित रिपोर्ट या आरोपों के आधार पर ऐसा आदेश नहीं दिया जा सकता।
CJI सूर्यकांत ने सुनवाई के दौरान यह स्पष्ट किया कि कोई भी खबर पूरी तरह सही, आंशिक रूप से सही या गलत हो सकती है। इसलिए अदालत पहले चुनाव आयोग का जवाब और मूल रिकॉर्ड देखना चाहती है।
सुप्रीम कोर्ट की 4 बड़ी बातें
1. अखबार की खबर के आधार पर आदेश नहीं दे सकते
CJI सूर्यकांत ने कहा कि कोई खबर 100% सही, आंशिक रूप से सही या गलत हो सकती है। इसलिए सिर्फ मीडिया रिपोर्ट के आधार पर CEC को सस्पेंड करने का अंतरिम आदेश नहीं दिया जा सकता। पहले चुनाव आयोग का जवाब और रिकॉर्ड देखना होगा।
2. चुनाव आयोग के फैसले सर्वसम्मति या बहुमत से होने चाहिए
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग की निर्णय प्रक्रिया पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि आयोग के फैसले सर्वसम्मति या बहुमत से लिए जाने चाहिए। यानी तीन सदस्यीय आयोग में किसी एक सदस्य का अकेले फैसला पूरे आयोग का फैसला नहीं माना जा सकता।
3. अभी यह नहीं मान सकते कि सारे फैसले CEC ने अकेले लिए
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि सिर्फ आरोपों के आधार पर यह नहीं माना जा सकता कि सभी फैसले CEC ज्ञानेश कुमार ने अकेले लिए थे। इसके लिए रिकॉर्ड और चुनाव आयोग की ओर से दी जाने वाली जानकारी को देखना जरूरी है।
4. एकतरफा फैसला साबित हुआ तो कार्रवाई संभव
सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया कि अगर रिकॉर्ड से यह सामने आता है कि कोई फैसला जरूरी कानूनी प्रक्रिया के बिना लिया गया था, तो अदालत उस पर हस्तक्षेप कर सकती है।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा:
“After notice, if they come and show that ABC decisions were taken without unanimity, we will take those decisions back.”
यानी अगर चुनाव आयोग के रिकॉर्ड से यह साबित होता है कि संबंधित फैसले जरूरी सहमति के बिना लिए गए थे, तो सुप्रीम कोर्ट उन फैसलों को वापस लेने या रद्द करने पर विचार कर सकता है।
Form-6 को लेकर भी सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग आमने-सामने
सुनवाई के दौरान Form-6 में किए गए बदलाव का मुद्दा भी सामने आया। CJI सूर्यकांत ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने Form-6 में किए गए किसी संशोधन को मंजूरी नहीं दी है। अदालत ने इस बात पर भी रिकॉर्ड देखने की इच्छा जताई कि आखिर Form-6 में बदलाव किस स्तर पर किया गया।
यह मुद्दा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि Form-6 का इस्तेमाल मतदाता सूची में नए मतदाता का नाम शामिल कराने के लिए किया जाता है।
वहीं, चुनाव आयोग की ओर से पहले यह कहा गया था कि बिहार में 24 जून 2025 के SIR आदेश के दौरान Form-6 के साथ एक अतिरिक्त घोषणा जोड़ी गई थी और आयोग ने दावा किया था कि सुप्रीम कोर्ट के 27 मई के आदेश से इसका आधार मिलता है।
अब सुनवाई के दौरान CJI की टिप्पणी के बाद इस दावे को लेकर भी सवाल खड़े हुए हैं। अदालत रिकॉर्ड के आधार पर यह स्पष्ट करना चाहती है कि Form-6 में बदलाव किस प्रक्रिया के तहत हुआ।
SIR विवाद में दो PIL क्यों महत्वपूर्ण हैं?
SIR को लेकर सुप्रीम कोर्ट में दो अलग-अलग याचिकाएं सामने आई हैं। इनमें एक याचिका राकेश कुमार सिंह की ओर से दाखिल की गई है, जिसमें CEC ज्ञानेश कुमार को तत्काल पद से हटाने या निलंबित करने की मांग की गई थी। उनकी ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने दलीलें रखीं।
दूसरी याचिका शैलेंद्र मणि त्रिपाठी की ओर से दाखिल की गई है, जिसमें चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और Form-6 सहित SIR से जुड़े फैसलों को चुनौती दी गई है। इस मामले में वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने पक्ष रखा।
विवाद की शुरुआत कहां से हुई?
ज्ञानेश कुमार की कार्यप्रणाली को लेकर विवाद तब तेज हुआ जब द इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में चुनाव आयोग के भीतर SIR से जुड़े फैसलों पर मतभेद का दावा किया गया।
रिपोर्ट के आधार पर आरोप लगाया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने SIR से जुड़े कुछ फैसलों पर आपत्तियां दर्ज की थीं और करीब 14 फैसलों को लेकर आयोग के भीतर मतभेद सामने आए थे।
हालांकि चुनाव आयोग ने इन आरोपों पर अपना पक्ष रखा है। इसलिए यह मामला फिलहाल आरोप और जवाब के चरण में है और सुप्रीम कोर्ट रिकॉर्ड की जांच के बाद ही आगे की दिशा तय करेगा।
क्या सुप्रीम कोर्ट CEC को सीधे सस्पेंड कर सकता है?
यह मामला संवैधानिक और कानूनी रूप से बेहद महत्वपूर्ण है। मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति और हटाने की प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 324 में निर्धारित है। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार की सुनवाई में फिलहाल CEC को निलंबित करने का अंतरिम आदेश नहीं दिया है।
अदालत का मौजूदा रुख यह है कि पहले आरोपों के समर्थन में रिकॉर्ड और चुनाव आयोग का जवाब देखा जाए। इसके बाद यदि किसी निर्णय में कानूनी प्रक्रिया का उल्लंघन मिलता है, तो अदालत उस निर्णय पर उचित आदेश दे सकती है।
विपक्ष अगले सत्र में महाभियोग लाने की तैयारी में
विपक्ष एक बार फिर CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने की योजना बना रहा है। अप्रैल 2026 में भी विपक्ष ने ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग नोटिस दिया था लेकिन लोकसभा में वह प्रस्ताव खारिज हो गया था, जबकि राज्यसभा में अभी भी लंबित है।

अब आगे क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग और केंद्र समेत संबंधित पक्षों से जवाब मांगा है। अदालत अब यह देखेगी कि SIR से जुड़े जिन फैसलों पर सवाल उठाए गए हैं, वे किस प्रक्रिया के तहत लिए गए थे और क्या तीनों चुनाव आयुक्तों की सहमति या बहुमत का पालन हुआ था।
अगर रिकॉर्ड में प्रक्रिया का उल्लंघन सामने आता है, तो संबंधित फैसलों की वैधता पर सुप्रीम कोर्ट विचार कर सकता है। लेकिन अगर चुनाव आयोग अपने रिकॉर्ड से यह साबित कर देता है कि फैसले निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार लिए गए थे, तो याचिकाकर्ताओं के आरोपों का आधार कमजोर हो सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने न तो ज्ञानेश कुमार को क्लीन चिट दी है और न ही उन्हें सस्पेंड किया है।
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने न तो ज्ञानेश कुमार को क्लीन चिट दी है और न ही उन्हें सस्पेंड किया है। अदालत ने बीच का रास्ता अपनाते हुए चुनाव आयोग और केंद्र से जवाब तथा रिकॉर्ड मांगा है।
इस सुनवाई का सबसे बड़ा संदेश यही है कि अब आरोपों का फैसला मीडिया रिपोर्ट से नहीं, बल्कि चुनाव आयोग के वास्तविक रिकॉर्ड और निर्णय प्रक्रिया की जांच से होगा। SIR और Form-6 को लेकर अगली सुनवाई में यह स्पष्ट हो सकता है कि विवादित फैसले वास्तव में आयोग की सामूहिक प्रक्रिया से लिए गए थे या नहीं।
Written & Edit by : Chandan Patel
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