पश्चिम बंगाल की राजनीति में भूचाल, संसद में अलग पहचान की मांग
कोलकाता/नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल की सियासत में एक बड़े राजनीतिक घटनाक्रम ने हलचल मचा दी है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 28 लोकसभा सांसदों में से 20 सांसदों ने पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व से अलग होकर नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) में विलय का ऐलान कर दिया है।
बताया जा रहा है कि बागी सांसदों के प्रतिनिधिमंडल ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मुलाकात कर उन्हें विलय संबंधी पत्र सौंपा और संसद में अलग बैठने की व्यवस्था की मांग भी की है। इस घटनाक्रम ने बंगाल की राजनीति में नए समीकरणों को जन्म दे दिया है।
NDA के साथ काम करने का ऐलान
बागी गुट की नेता काकोली घोष ने कहा कि उनका समूह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के साथ मिलकर काम करेगा। उन्होंने दावा किया कि उनके साथ दो-तिहाई सांसदों का समर्थन मौजूद है।
वहीं सांसद सुदीप बंद्योपाध्याय और शताब्दी रॉय ने भी कथित तौर पर कहा कि उनका गुट पहले ही NCPI में शामिल हो चुका है।
आखिर क्या है NCPI?
नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) एक पंजीकृत लेकिन गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल है। इसका गठन 20 जनवरी 2023 को त्रिपुरा विधानसभा चुनाव से पहले किया गया था।
पार्टी का चुनाव चिन्ह “पेन निब” यानी कलम की नोक है। चुनाव आयोग के रिकॉर्ड के अनुसार पार्टी को अब तक बेहद सीमित आर्थिक सहयोग मिला था और राष्ट्रीय स्तर पर इसकी कोई बड़ी पहचान नहीं थी।
कौन चलाता है NCPI?
पार्टी की अध्यक्ष शेली कुंडू हैं। पार्टी का पंजीकृत कार्यालय पश्चिम बंगाल के हावड़ा जिले के बानीपुर क्षेत्र में स्थित है।
पार्टी से जुड़े दस्तावेजों के अनुसार शेली कुंडू संगठन के प्रमुख चेहरों में शामिल हैं। हालांकि हाल तक NCPI राष्ट्रीय राजनीति में लगभग गुमनाम पार्टी मानी जाती थी।
त्रिपुरा से शुरू हुआ था राजनीतिक सफर
दिलचस्प बात यह है कि बंगाल में पंजीकृत होने के बावजूद NCPI ने अपना पहला चुनावी अभियान त्रिपुरा में शुरू किया था।
2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में पार्टी ने सात सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन अधिकांश सीटों पर उसे बेहद सीमित वोट मिले। चुनाव के बाद पार्टी लगभग राजनीतिक चर्चा से बाहर हो गई थी।
शून्य से 20 सांसद तक, कैसे बदल गई तस्वीर?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह विलय पूरी तरह वैध और आधिकारिक रूप से स्वीकार हो जाता है तो NCPI देश की सबसे तेजी से उभरने वाली पार्टियों में शामिल हो जाएगी।
एक ऐसी पार्टी जो हाल तक चुनावी मैदान में संघर्ष कर रही थी, अचानक 20 सांसदों के समर्थन के साथ राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आ गई है।

सवालों के घेरे में बागी सांसद
राजनीतिक गलियारों में यह सवाल भी उठ रहा है कि जिन सांसदों को जनता ने TMC के चुनाव चिन्ह और ममता बनर्जी के नेतृत्व पर भरोसा करके संसद भेजा था, उनका अचानक किसी दूसरी पार्टी में जाना मतदाताओं की भावनाओं के साथ न्याय है या नहीं।
लोकतंत्र में दल बदल कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा हो सकता है, लेकिन जनता यह जरूर जानना चाहती है कि आखिर उनके वोट से जीतने वाले जनप्रतिनिधि किस विचारधारा और किन कारणों से अचानक नई राजनीतिक छतरी के नीचे पहुंच गए।
आगे क्या होगा?
अब सबकी नजर लोकसभा अध्यक्ष के फैसले और चुनाव आयोग की आगामी प्रक्रिया पर टिकी हुई है। यदि यह राजनीतिक बदलाव पूरी तरह मान्य हो जाता है तो पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़ा शक्ति संतुलन परिवर्तन देखने को मिल सकता है।
आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि यह सिर्फ एक राजनीतिक बगावत है या बंगाल की राजनीति में किसी नए अध्याय की शुरुआत।
Written by : Chandan Patel.
गिद्धौर में बालू लदे ट्रकों का कहर: दोघट मोड़ से पुल तक लगा लंबा जाम, जनता बेहाल.. ये खबर भी पढ़े…
