चंद्रपुर नगर निगम की राजनीति ने एक बार फिर साबित कर दिया कि भारतीय राजनीति में सबसे बड़ी पार्टी होना जीत की गारंटी नहीं होता।

कांग्रेस 27 सीटों के साथ सबसे आगे थी। महापौर की कुर्सी बस हाथ बढ़ाने भर की दूरी पर थी। लेकिन तभी हुआ राजनीति का वो चिर-परिचित चमत्कार—
सहयोगी ने पाला बदला, और कांग्रेस हाथ मलती रह गई।

बीजेपी की संगीता खंडेकर महज़ एक वोट से महापौर बन गईं, जबकि कांग्रेस की वैशाली महाडुले को हार का स्वाद चखना पड़ा। एक वोट…इतना छोटा फर्क, लेकिन इतना बड़ा झटका।

“हम साथ-साथ हैं”… लेकिन वोट अलग-अलग!

महा विकास आघाड़ी और इंडिया गठबंधन में कांग्रेस की अहम साथी शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट) ने ऐन मौके पर बीजेपी का समर्थन कर दिया। नतीजा ये रहा कि—
बीजेपी को महापौर पद मिला, और शिवसेना (उद्धव गुट) को उपमहापौर। यानी दोनों फायदे में, कांग्रेस अकेली नुकसान में।
शिवसेना (उद्धव गुट) के प्रशांत दानव उपमहापौर बने, और कांग्रेस सोचती रह गई—
“हमसे ऐसी भी क्या नाराज़गी थी?”

चंद्रपुर में कांग्रेस की अंदरूनी लड़ाई बनी बाहरी जीत

चंद्रपुर उन गिने-चुने नगर निगमों में था, जहां कांग्रेस मजबूत स्थिति में थी। मगर विजय वडेट्टीवार और प्रतिभा धनोरकर गुटों की आपसी खींचतान ने बीजेपी के लिए रेड कार्पेट बिछा दी।

कहते हैं ना— जब घर में आग लगती है, तो पड़ोसी अलाव ताप लेते हैं। यही हाल यहां हुआ।

कांग्रेस का आरोप: लोकतंत्र मंडी बन गया?

महाराष्ट्र कांग्रेस अध्यक्ष हर्षवर्धन सपकाल ने सीधे-सीधे खरीद-फरोख्त का आरोप लगाया। उन्होंने बताया कि महापौर चुनाव में बीजेपी को 32 और कांग्रेस को 31 वोट मिले। शिवसेना (उद्धव गुट) के छह पार्षदों से कांग्रेस को समर्थन की उम्मीद थी, लेकिन सभी बीजेपी खेमे में चले गए।
सपकाल ने AIMIM और वंचित बहुजन आघाड़ी को भी जिम्मेदार ठहराया और कहा कि इसका असर राज्य की राजनीति पर जरूर पड़ेगा।

चंद्रपुर
फाइल फोटो: महाराष्ट्र कांग्रेस अध्यक्ष हर्षवर्धन सपकाल

दूसरे शब्दों में—ये सिर्फ चंद्रपुर नहीं, आने वाले सियासी समीकरणों का ट्रेलर है।

एक नजर नतीजों पर

66 सदस्यीय नगर निगम में—
कांग्रेस – 27 सीट
बीजेपी – 23 सीट
शिवसेना (उद्धव गुट) – 6
भारतीय शेतकरी कामगार पक्ष – 3
वंचित बहुजन आघाड़ी – 2
AIMIM, BSP और शिवसेना – 1-1
2 निर्दलीय

अंक गणित कांग्रेस के पक्ष में था,
लेकिन राजनीति का गणित बीजेपी ने साध लिया।

गठबंधन सिर्फ पोस्टर तक?

चंद्रपुर की घटना ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है— क्या गठबंधन अब सिर्फ प्रेस कॉन्फ्रेंस और पोस्टर तक सीमित रह गए हैं?
जमीनी स्तर पर दोस्ती इतनी कमजोर क्यों है कि एक वोट में बिखर जाती है?
कांग्रेस कार्यकर्ताओं के लिए यह सिर्फ हार नहीं, बल्कि विश्वास टूटने का दर्द है।

आखिर में…

चंद्रपुर की राजनीति ने फिर सिखा दिया—यहां जीत मेहनत से नहीं, मैनेजमेंट से मिलती है। यहां दोस्त स्थायी नहीं होते,
सत्ता स्थायी होती है। और सबसे बड़ी बात—

भारतीय राजनीति में “लगभग जीत” नाम की कोई भी चीज नहीं होती। या तो कुर्सी मिलती है, या फिर सिर्फ प्रेस बयान।

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