नया साल 2026 दस्तक दे चुका है। कैलेंडर बदला है, तारीख बदली है, मगर आम आदमी के मन में सवाल अब भी वही खड़े हैं—
क्या इस साल बेरोज़गार युवाओं को नौकरी मिलेगी?

क्या किसान की फसल का सही दाम मिलेगा?

क्या छोटे दुकानदार और मेहनतकश लोग चैन की सांस ले पाएंगे?

हर नया साल उम्मीदों की गठरी लेकर आता है। गरीब की उम्मीद होती है कि इस बार चूल्हा बिना कर्ज़ के जलेगा। बेरोज़गार युवा सोचता है—शायद इस साल डिग्री का कोई मतलब निकले। किसान आसमान की तरफ देखता है, कभी बारिश के लिए, कभी सरकार की तरफ MSP के लिए।

बेरोज़गार युवा: डिग्री हाथ में, भविष्य अधर में
देश में आज करोड़ों युवा पढ़े-लिखे हैं, मगर नौकरी के नाम पर सन्नाटा है। सरकारी भर्तियाँ या तो निकलती नहीं, निकलती हैं तो सालों लटकती रहती हैं। प्राइवेट सेक्टर में काम है, पर वेतन ऐसा कि घर चलाना मुश्किल।

2026 में भी अगर सिर्फ नारे ही मिले—“युवा शक्ति, युवा भारत”—और ज़मीन पर नौकरी नहीं, तो युवाओं का भरोसा और टूटेगा। युवा सिर्फ नौकरी नहीं मांग रहा, वह सम्मान और सुरक्षित भविष्य मांग रहा है।

किसान: अन्नदाता फिर भी सबसे मजबूर
किसान आज भी वही सवाल पूछ रहा है—“मेहनत मेरी, दाम कोई और तय क्यों करता है?”

बीज महंगे, खाद महंगी, डीज़ल महंगा… लेकिन फसल का दाम वही पुराना। कभी बाढ़, कभी सूखा, कभी ओलावृष्टि। ऊपर से कर्ज़ का बोझ।

अगर 2026 में भी किसान की आय नहीं बढ़ी, MSP सिर्फ कागज़ों में रहा, तो गांवों से शहर की मजबूरी और तेज़ होगी।

नया साल में छोटे दुकानदार और मेहनतकश: महंगाई की मार

छोटे दुकानदार, रेहड़ी-पटरी वाले, दिहाड़ी मज़दूर—इनके लिए हर दिन एक संघर्ष है। महंगाई बढ़ रही है, आमदनी वहीं की वहीं। बड़े कॉरपोरेट मुनाफ़ा कमा रहे हैं, लेकिन छोटे व्यापारियों की दुकानें बंद हो रही हैं।
2026 में अगर नीतियाँ सिर्फ बड़े लोगों के लिए बनीं, तो आम आदमी का भरोसा सिस्टम से उठता जाएगा।

सवाल सिर्फ साल का नहीं, नीयत का है

सच यही है कि साल बदलने से हालात नहीं बदलते, हालात बदलते हैं सही नीतियों से।
रोज़गार बढ़े, किसान को उसकी मेहनत का पूरा दाम मिले, महंगाई पर लगाम लगे,और गरीब को सिर्फ भाषण नहीं, राहत मिले—तभी 2026 सच में “नया” कहलाएगा।

जनता अब वादे नहीं, काम देखना चाहती है

देश की जनता थकी हुई है। उसे अब जुमलों से नहीं, ज़मीन पर बदलाव से फर्क पड़ेगा।
अगर 2026 में भी सवाल वही रहे—नौकरी कहाँ है? किसान क्यों रो रहा है? महंगाई क्यों मार रही है?— तो मान लेना चाहिए कि नया साल आया है, लेकिन अच्छे दिन अब भी दूर हैं।

उम्मीद अब भी ज़िंदा है, मगर सब्र की भी एक सीमा होती है।

नया

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