देश का माहौल इन दिनों नफरत से भारी है। टीवी डिबेट से लेकर सोशल मीडिया तक, हर जगह तल्ख़ बयानबाज़ी, नफरत भरे भाषण और आरोप-प्रत्यारोप का दौर चल रहा है। इसी बीच मंगलवार को Supreme Court of India ने एक जनहित याचिका (PIL) पर सख़्त टिप्पणी करते हुए बड़ा सवाल खड़ा कर दिया — क्या संवैधानिक नैतिकता सिर्फ कुछ नेताओं के लिए है?

कोर्ट की नाराज़गी: “याचिका एकतरफा क्यों?”

12 “प्रतिष्ठित” लोगों द्वारा दायर इस याचिका में कथित हेट स्पीच के लिए केवल भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों और कुछ केंद्रीय नेताओं को निशाना बनाया गया था।
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता Kapil Sibal ने पीठ को बताया कि देश का माहौल ज़हरीला हो गया है और इसे सुधारने की ताक़त सिर्फ अदालत के पास है।
लेकिन पीठ में शामिल मुख्य न्यायाधीश Surya Kant, जस्टिस B. V. Nagarathna और जस्टिस Joymalya Bagchi ने तुरंत सवाल उठा दिया —
जब नफरत भरे बयान हर दल में हैं, तो सिर्फ कुछ लोगों का नाम क्यों?

CJI ने साफ शब्दों में कहा —

“एक निष्पक्ष और तटस्थ याचिका लेकर आइए। दिशानिर्देश अगर बनेंगे, तो सभी राजनीतिक दलों पर समान रूप से लागू होने चाहिए।”

“नफरत हर तरफ है, उदाहरण सिर्फ एक ओर से क्यों?”

कोर्ट ने यह भी कहा कि कई राजनीतिक दल अपनी सांप्रदायिक सोच के आधार पर खुलेआम भड़काऊ भाषण देते हैं। ऐसे में सिर्फ एक पक्ष को कटघरे में खड़ा करना सही नहीं।
जस्टिस बागची ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा —

“राजनीति का शोर-शराबा जनहित याचिका का आधार नहीं होना चाहिए। इसे लोकलुभावन कवायद नहीं, बल्कि रचनात्मक संवैधानिक प्रयास बनाइए।”

याचिका में जिन नेताओं का ज़िक्र किया गया, उनमें शामिल हैं:

याचिकाकर्ताओं में रूप रेखा वर्मा, मोहम्मद अदीब, हर्ष मंदर, नजीब जंग, जॉन दयाल और अशोक कुमार शर्मा शामिल थे। उन्होंने अपनी याचिका में कथित हेट स्पीच के लिए
कई भाजपा नेताओं का नाम लिया था:

हिमंत बिस्वा सरमा (असम के मुख्यमंत्री)
योगी आदित्यनाथ (उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री)
देवेंद्र फडणवीस (महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री)
पुष्कर सिंह धामी (उत्तराखंड के मुख्यमंत्री)
अनंत कुमार हेगड़े (पूर्व केंद्रीय मंत्री)
गिरिराज सिंह (केंद्रीय मंत्री)

साथ ही कुछ नौकरशाहों की टिप्पणियों का भी हवाला दिया गया था।

जस्टिस नागरत्ना का अहम सवाल: क्या अदालत सोच बदल सकती है?

जस्टिस नागरत्ना ने बेहद भावुक और गहरी बात कही —

“भाषण विचार प्रक्रिया से निकलता है। क्या अदालत किसी की सोच बदल सकती है?”
उन्होंने यह भी जोड़ा कि असली समाधान अदालतों के आदेशों से नहीं, बल्कि राजनीतिक दलों और लोकतांत्रिक संस्थाओं द्वारा संवैधानिक मूल्यों के प्रति ईमानदार रहने से आएगा।

याचिकाकर्ताओं की दो बड़ी मांगें

याचिका में मुख्य रूप से दो बातें कही गईं:
संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों के भाषण संवैधानिक नैतिकता के अधीन हों और किसी के मौलिक अधिकारों का हनन न करें।

नेताओं और नौकरशाहों के सार्वजनिक भाषण के लिए दिशा-निर्देश बनाए जाएं — बिना सेंसरशिप लगाए, लेकिन नैतिक जिम्मेदारी तय करते हुए।

अब आगे क्या?

जब कपिल सिब्बल ने कहा कि वे याचिका से सभी व्यक्तियों के नाम हटा देंगे, तब कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संशोधन के बाद ही सुनवाई होगी। इसके लिए दो सप्ताह का समय दिया गया है।

नफरत
वरिष्ठ सुप्रीम कोर्ट और राज्यसभा सदस्य वकील कपिल सिब्बल

भावनात्मक सवाल: क्या राजनीति से पहले इंसानियत नहीं?

आज देश को अदालतों से ज़्यादा ज़रूरत आत्ममंथन की है। सवाल सिर्फ कानून का नहीं — सवाल हमारी सोच, हमारी भाषा और हमारी संवेदनशीलता का है।

नेता हों या आम नागरिक, अगर बोलने से पहले यह सोच लें कि हमारे शब्द किसी दिल को तोड़ सकते हैं, किसी समाज को बांट सकते हैं — शायद तब सुप्रीम कोर्ट को बार-बार ऐसी याचिकाओं पर सख़्ती नहीं दिखानी पड़े।

क्योंकि लोकतंत्र सिर्फ वोट से नहीं चलता…
वह भरोसे, संयम और इंसानियत से चलता है।

देश दुनिया की खबरों की अपडेट के लिए AVN News पर बने रहिए।

By Chandan Patel

चंदन पटेल AVN News से लंबे समय से जुड़े पत्रकार हैं। उन्होंने वर्ष 2020 से रिपोर्टर के रूप में पत्रकारिता की शुरुआत की और जमीनी स्तर की खबरों को प्रमुखता से उठाते हुए लगातार अपनी पहचान बनाई। वर्तमान में वे AVN News के एडिटर-इन-चीफ के रूप में समाचार संपादन, कवरेज और डिजिटल पत्रकारिता का नेतृत्व कर रहे हैं। राजनीति, खेल,स्थानीय मुद्दों, जनसमस्याओं, प्रशासनिक गतिविधियों और सामाजिक सरोकारों से जुड़ी खबरों को तथ्यपरक और सरल भाषा में पाठकों तक पहुंचाना उनकी पत्रकारिता की प्रमुख विशेषता है। उनका उद्देश्य आम लोगों की आवाज को प्रमुखता देना और विश्वसनीय खबरों के माध्यम से समाज को जागरूक करना है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *