New Delhi : भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है। यहां सरकारें जनता के वोट से बनती हैं, संविधान से चलती हैं और जनता के प्रति जवाबदेह होती हैं। लेकिन आज देश की राजनीति में एक सवाल बार-बार सामने आता है – लोकतंत्र खतरे में है, धर्म खतरे में है, देश खतरे में है। आखिर यह खतरा किससे है और इसकी जिम्मेदारी किसकी है?
अगर कोई सरकार करीब 13 साल से केंद्र की सत्ता में है और देश के कई राज्यों में भी उसकी अपनी सरकार है, तो उससे सवाल पूछना बिल्कुल जायज है। 2014 से केंद्र में भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार है। अक्टूबर 2026 के उपलब्ध राजनीतिक आंकड़ों के अनुसार भाजपा के मुख्यमंत्री 17 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में हैं। ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि देश के बड़े हिस्से में भाजपा और उसके सहयोगी दलों का राजनीतिक प्रभाव है।
फिर भी अगर हर चुनाव में धर्म खतरे में बताया जाता है, हर राजनीतिक बहस में देश को संकट में दिखाया जाता है और हर सवाल का जवाब विपक्ष पर हमला करके दिया जाता है, तो जनता पूछेगी कि आखिर सरकार अपनी उपलब्धियों और कमियों पर बात कब करेगी?
लोकतंत्र का मतलब सिर्फ चुनाव जीतना नहीं है
लोकतंत्र का अर्थ केवल पांच साल में एक बार वोट डालना नहीं होता। लोकतंत्र का मतलब है कि जनता अपनी सरकार से सवाल पूछ सके, पत्रकार बिना दबाव के सवाल कर सकें, विपक्ष अपनी बात रख सके और सरकार आलोचना को दुश्मनी न समझे।
किसी सरकार को भारी बहुमत मिलना उसकी राजनीतिक ताकत हो सकती है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उसे सवालों से छूट मिल गई।
संसद में विपक्ष का होना, अदालतों का स्वतंत्र रहना, चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर जनता का भरोसा और मीडिया का सत्ता से सवाल पूछना लोकतंत्र की बुनियादी जरूरतें हैं।
आज जब चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर सवाल उठ रहे हैं, तो इन सवालों का जवाब तथ्यों और पारदर्शिता से दिया जाना चाहिए।
अक्टूबर 2026 में मतदाता सूची के पुनरीक्षण को लेकर देश के कई हिस्सों में विरोध प्रदर्शन हुए। विपक्ष ने आरोप लगाया कि बड़ी संख्या में योग्य मतदाताओं के नाम प्रभावित हुए हैं। वहीं चुनाव आयोग ने अपनी प्रक्रिया का बचाव किया है। ह्यूमन राइट्स वॉच ने 28 अक्टूबर 2026 की अपनी रिपोर्ट में 13 करोड़ से अधिक नामों को हटाए जाने की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए। ये आरोप और रिपोर्ट में उठाई गई चिंताएं हैं, जिन्हें अंतिम न्यायिक निष्कर्ष नहीं माना जा सकता। लेकिन इतना जरूर है कि हर योग्य नागरिक का वोट सुरक्षित रहना चाहिए।
क्योंकि लोकतंत्र में सरकार जनता चुनती है, जनता को चुनने का अधिकार किसी भी परिस्थिति में कमजोर नहीं होना चाहिए।
धर्म की रक्षा के नाम पर आखिर किसका फायदा हो रहा है?
भारत में हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध और जैन सहित अलग-अलग धर्मों को मानने वाले लोग रहते हैं। इस देश की खूबसूरती यही है कि अलग-अलग आस्था के लोग एक साथ रहते आए हैं।
हिंदू को अपने धर्म पर गर्व करने का पूरा अधिकार है। मुस्लिम को अपनी इबादत करने का अधिकार है। सिख को अपनी परंपराओं पर गर्व करने का अधिकार है और ईसाई को चर्च में प्रार्थना करने का अधिकार है।
लेकिन सवाल यह है कि धर्म की रक्षा के नाम पर अगर समाज में नफरत बढ़े, एक समुदाय दूसरे समुदाय को शक की नजर से देखने लगे और लोगों के बीच डर का माहौल बने, तो इससे धर्म मजबूत होगा या समाज कमजोर?
धर्म किसी पार्टी की जागीर नहीं है। भगवान और अल्लाह के नाम पर राजनीति करने वालों से जनता को यह पूछना चाहिए कि क्या अस्पताल में इलाज मिलना, बच्चों को अच्छी शिक्षा मिलना, युवाओं को रोजगार मिलना और महिलाओं का सुरक्षित रहना भी धर्म और समाज की जिम्मेदारी नहीं है?
धर्म निजी आस्था और विश्वास का विषय है। सरकार का काम हर नागरिक को समान अधिकार और सुरक्षा देना है, चाहे उसका धर्म कोई भी हो।
राम के नाम पर राजनीति, लेकिन राम के आदर्शों पर भी बात हो
भगवान राम करोड़ों लोगों की आस्था के केंद्र हैं। राम के नाम पर राजनीति करने वालों को राम के आदर्शों को भी याद रखना चाहिए।
राम का नाम लेने का अर्थ केवल नारे लगाना नहीं है। उनके जीवन से मर्यादा, न्याय, त्याग, जिम्मेदारी और आदर्श शासन की सीख भी मिलती है।
अगर किसी गरीब को अस्पताल में इलाज नहीं मिलता, किसी बेटी को सुरक्षा नहीं मिलती, किसी युवा को नौकरी नहीं मिलती और किसी कमजोर व्यक्ति को न्याय के लिए भटकना पड़ता है, तो सरकार से सवाल पूछना जरूरी है।
धर्म का सम्मान तभी सार्थक है जब समाज में इंसान की इज्जत भी सुरक्षित हो।
विपक्ष के सवालों को देशविरोधी बताना कहां तक सही?
लोकतंत्र में विपक्ष सरकार का दुश्मन नहीं, बल्कि व्यवस्था का जरूरी हिस्सा है। विपक्ष सरकार की नीतियों पर सवाल उठाता है, गलतियों को सामने लाता है और जनता की आवाज बनने की कोशिश करता है।
विपक्ष की हर बात सही हो, यह जरूरी नहीं। विपक्ष से भी सवाल पूछे जाने चाहिए। लेकिन उसकी हर आलोचना को देशविरोधी या लोकतंत्र के खिलाफ बताना भी उचित नहीं है।
अगर कोई नेता सरकार से रोजगार, महंगाई, भ्रष्टाचार, चुनावी पारदर्शिता और सरकारी संस्थाओं की स्वतंत्रता पर सवाल करता है, तो सरकार को उसका जवाब देना चाहिए।
देश सरकार से बड़ा है और संविधान किसी भी राजनीतिक दल से ऊपर है।
13 साल की सत्ता के बाद रोजगार और महंगाई पर भी हिसाब दीजिए
चुनाव के समय जनता को बड़े-बड़े वादे सुनाए जाते हैं। अच्छे दिन, रोजगार, किसानों की आय, भ्रष्टाचार पर कार्रवाई और महंगाई से राहत जैसे मुद्दे हर चुनाव में चर्चा में रहते हैं।
लेकिन आम आदमी के जीवन में असली सवाल आज भी वही हैं।
- पढ़े-लिखे युवाओं को स्थायी रोजगार कब मिलेगा?
- महंगाई से परेशान परिवारों को राहत कब मिलेगी?
- किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य कब मिलेगा?
- सरकारी अस्पतालों में बेहतर इलाज कब मिलेगा?
- सरकारी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता कब सुधरेगी?
- महिलाओं की सुरक्षा केवल भाषणों तक सीमित क्यों रहे?
- भ्रष्टाचार के मामलों में कार्रवाई राजनीतिक पहचान देखकर क्यों नहीं होनी चाहिए?
इन सवालों का किसी धर्म या जाति से कोई संबंध नहीं है। ये हर भारतीय परिवार के सवाल हैं।
सरकार के पास योजनाओं और उपलब्धियों की लंबी सूची हो सकती है। उसे जनता के सामने आंकड़ों के साथ अपनी उपलब्धियां रखनी चाहिए। लेकिन जनता को भी यह अधिकार है कि वह वादों और जमीनी हकीकत के बीच अंतर पूछ सके।
मीडिया का काम सरकार की तारीफ करना नहीं, सच दिखाना है
लोकतंत्र में मीडिया को चौथा स्तंभ कहा जाता है। पत्रकार का काम किसी राजनीतिक पार्टी का प्रचार करना नहीं, बल्कि जनता के मुद्दों को सामने लाना है।
अगर कोई पत्रकार अस्पताल की बदहाली दिखाता है, सड़क की समस्या उठाता है, भ्रष्टाचार पर सवाल करता है या किसी सरकारी अधिकारी से जवाब मांगता है, तो वह अपना लोकतांत्रिक कर्तव्य निभा रहा है।
सरकार अच्छी हो तो उसकी अच्छी योजनाओं की तारीफ होनी चाहिए और सरकार से गलती हो तो उसकी आलोचना भी होनी चाहिए।
पत्रकारिता का मतलब किसी के पक्ष में नारे लगाना नहीं, बल्कि सत्ता से सवाल पूछना है। सवाल पूछने वाला पत्रकार सरकार का विरोधी नहीं होता। वह जनता के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभा रहा होता है।
संविधान की असली ताकत समानता और भाईचारे में है
भारत का संविधान हर नागरिक को समानता, स्वतंत्रता और धार्मिक आस्था की आजादी देता है। संविधान के अनुच्छेद 14 में कानून के सामने समानता, अनुच्छेद 19 में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अनुच्छेद 25 में धर्म की स्वतंत्रता का प्रावधान है।
इन अधिकारों की रक्षा केवल अदालत या सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि हर नागरिक की जिम्मेदारी है।
किसी व्यक्ति को उसके धर्म, जाति, भाषा या राजनीतिक विचार के आधार पर छोटा समझना भारत की संवैधानिक भावना के खिलाफ है।
हमें यह भी समझना होगा कि लोकतंत्र केवल बहुमत से नहीं चलता। लोकतंत्र में अल्पसंख्यकों के अधिकारों की सुरक्षा भी उतनी ही जरूरी है।
अगर आज किसी दूसरे धर्म के व्यक्ति के अधिकारों पर सवाल उठता है और हम चुप रहते हैं, तो कल यही सवाल हमारे अधिकारों पर भी उठ सकता है।
जनता को अंधभक्ति नहीं, जागरूक नागरिक बनना होगा
राजनीति में किसी पार्टी की विचारधारा से सहमत होना गलत नहीं है। किसी नेता को पसंद करना भी गलत नहीं है। लेकिन किसी भी नेता या पार्टी के प्रति इतनी अंधभक्ति नहीं होनी चाहिए कि हमें अपने आसपास की सच्चाई दिखाई देना बंद हो जाए।
नेता जनता के सेवक होते हैं, जनता नेता की सेवक नहीं।
सरकार भाजपा की हो, कांग्रेस की हो या किसी क्षेत्रीय दल की, जनता को हर सरकार से सवाल पूछना चाहिए। सत्ता बदल सकती है, लेकिन जनता के अधिकार और संविधान के सिद्धांत नहीं बदलने चाहिए।
हमें यह तय करना होगा कि हमारी पहचान पहले एक जागरूक भारतीय नागरिक की है या किसी राजनीतिक पार्टी के समर्थक की।
सरकार से आखिरी सवाल: खतरा किससे है?
अगर करीब 13 साल की सत्ता के बाद भी लोकतंत्र खतरे में है, धर्म खतरे में है, देश की संस्कृति खतरे में है और हर चुनाव में समाज को किसी न किसी डर के नाम पर लामबंद करना पड़ता है, तो सरकार को बताना चाहिए कि आखिर उसकी नीतियों और शासन व्यवस्था की उपलब्धियां क्या हैं?
अगर विपक्ष गलत है तो तथ्यों के साथ जवाब दीजिए। अगर पत्रकार गलत खबर दिखा रहा है तो सबूतों के साथ सच्चाई सामने रखिए। अगर किसी संस्था पर आरोप लग रहे हैं तो उसकी निष्पक्ष जांच और पारदर्शिता सुनिश्चित कीजिए।
लेकिन हर सवाल को धर्म से जोड़ देना और हर आलोचना को देश के खिलाफ बताना किसी मजबूत लोकतंत्र की पहचान नहीं हो सकती।

देश मंदिर-मस्जिद से आगे भी बहुत कुछ है। देश किसान के खेत में है, मजदूर के पसीने में है, छात्र की किताब में है, जवान की कुर्बानी में है, महिला की सुरक्षा में है और उस गरीब परिवार की उम्मीद में है जो अपने बच्चों के बेहतर भविष्य का सपना देखता है।
हमें ऐसा भारत चाहिए जहां हिंदू को अपने धर्म पर गर्व हो, मुस्लिम को अपनी इबादत की आजादी हो, सिख को अपनी परंपरा निभाने का अधिकार हो और ईसाई को अपने विश्वास के साथ जीने की पूरी स्वतंत्रता हो।
हमें ऐसा लोकतंत्र चाहिए जहां प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री और पंचायत प्रतिनिधि तक हर किसी से सवाल पूछे जा सकें।
क्योंकि लोकतंत्र में सबसे बड़ा कोई नेता नहीं होता। सबसे बड़ी जनता होती है और जनता से ऊपर संविधान होता है।
याद रखिए, सरकारें आती-जाती रहेंगी, नेता बदलते रहेंगे, लेकिन भारत का संविधान और लोकतंत्र सुरक्षित रहना चाहिए।
लेख का उद्देश्य किसी धर्म या समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं, बल्कि लोकतंत्र, संविधान, जवाबदेही और सामाजिक सद्भाव पर स्वस्थ सार्वजनिक बहस को बढ़ावा देना है।
Written & Edit by : Chandan Patel
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