देश के कई हिस्सों में इन दिनों रसोई गैस यानी एलपीजी गैस को लेकर परेशानी की खबरें सामने आ रही हैं। कहीं सिलेंडर की सप्लाई में देरी है, तो कहीं एजेंसियों के बाहर लंबी कतारें दिखाई दे रही हैं। ऐसे में सरकार की ओर से यह संकेत दिया गया कि अगर जरूरत पड़ी तो लोगों को राहत देने के लिए केरोसीन (मिट्टी का तेल) का वितरण बढ़ाया जा सकता है।
लेकिन सवाल यह है कि केरोसीन बांटने की बात करना जितना आसान है, उसका डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क आखिर है कहां?

“सब कंट्रोल में है”… तो लाइन में खड़े लोग कौन हैं?

क्योंकि पिछले कई वर्षों से सरकार खुद यह दावा करती रही है कि देश में एलपीजी का इस्तेमाल बढ़ गया है और केरोसीन की जरूरत लगभग खत्म हो गई है। अब अचानक उसी केरोसीन को समाधान बताना कई सवाल खड़े करता है।

गैस
LPG गैस सिलेंडर बुकिंग के लाईन में लगते लोग

“उज्ज्वला” के बाद केरोसीन सिस्टम लगभग खत्म

सरकार ने प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के जरिए करोड़ों गरीब परिवारों को एलपीजी कनेक्शन देने का दावा किया। इसके बाद धीरे-धीरे सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) के तहत मिलने वाला केरोसीन कई राज्यों में बंद या बहुत कम कर दिया गया।

कई जगहों पर तो केरोसीन डीलरशिप भी खत्म हो गईं। राशन दुकानों पर मिट्टी का तेल मिलना लगभग बंद हो गया।
अब जब गैस की सप्लाई या कीमत को लेकर परेशानी सामने आ रही है, तो सरकार केरोसीन बांटने की बात कर रही है। लेकिन सवाल यह है कि जब नेटवर्क ही कमजोर या खत्म हो चुका है, तो वितरण कैसे होगा?

जमीनी सच्चाई: गैस एजेंसी के बाहर कतारें

अगर सब कुछ “कंट्रोल में” है, जैसा कि सरकार कहती है, तो फिर गैस एजेंसियों के बाहर लंबी कतारें क्यों दिख रही हैं?
कई शहरों और कस्बों में लोग सुबह से एजेंसी के बाहर लाइन लगाकर सिलेंडर का इंतजार करते नजर आ रहे हैं। सोशल मीडिया पर भी ऐसे वीडियो सामने आ रहे हैं, जिनमें लोग कहते सुनाई देते हैं—

“बुकिंग कराए दस दिन हो गए, लेकिन सिलेंडर अभी तक नहीं आया।”

यह हाल सिर्फ एक शहर या राज्य का नहीं, बल्कि कई जगहों से ऐसी शिकायतें सामने आती रहती हैं।

उदाहरण: पहले सिस्टम खत्म, अब उसी पर भरोसा

मान लीजिए किसी गांव में पहले राशन की दुकान से हर महीने केरोसीन मिलता था। बाद में सरकार ने कहा कि अब हर घर में गैस कनेक्शन है, इसलिए केरोसीन बंद।
दुकानदार ने भी केरोसीन का स्टॉक रखना बंद कर दिया।

अब अगर अचानक सरकार कहे कि “केरोसीन बांटा जाएगा”, तो सवाल उठता है—

  • वह तेल आएगा कहां से?
  • उसे रखेगा कौन?
  • और लोगों तक पहुंचाएगा कैसे?

यानी नीति और जमीन की हकीकत के बीच बड़ा अंतर साफ दिखाई देता है।

क्या सरकार के पास स्पष्ट नीति है?

ऊर्जा से जुड़ी नीतियां बहुत सोच-समझकर बनानी पड़ती हैं। क्योंकि यह सीधे हर घर की रसोई से जुड़ा मुद्दा है।
लेकिन अभी जो तस्वीर सामने आ रही है, उससे लगता है कि सरकार के पास एलपीजी संकट से निपटने की कोई स्पष्ट और ठोस नीति नहीं है।
एक तरफ दावा किया जाता है कि देश में गैस की कोई कमी नहीं है, दूसरी तरफ लोगों को केरोसीन का विकल्प बताने की बात होती है।
यह स्थिति लोगों के मन में भ्रम और नाराजगी दोनों पैदा करती है।

जनता पूछ रही है: सच क्या है?

आज आम आदमी का सवाल बहुत सीधा है—
अगर गैस की कमी नहीं है, तो सिलेंडर मिलने में देरी क्यों?
अगर सब कुछ नियंत्रण में है, तो एजेंसियों पर भीड़ क्यों?
और अगर केरोसीन ही समाधान है, तो उसका नेटवर्क तैयार क्यों नहीं?

सरकार को इन सवालों का स्पष्ट जवाब देना होगा।
क्योंकि रसोई की आग सिर्फ एक सुविधा नहीं, बल्कि हर परिवार की रोजमर्रा की जरूरत है। नीतियों के भ्रम में अगर यह आग ठंडी पड़ने लगे, तो सबसे ज्यादा असर आम आदमी की जिंदगी पर ही पड़ता है।

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