जमुई: सरकारी रिकॉर्ड अगर सच बोलें तो न्याय मिलता है, लेकिन जब कागजों पर ही रिश्ते बदल दिए जाएं, जिंदा लोगों को मृत घोषित कर दिया जाए और नियमों को ताक पर रखकर जमीन का नामांतरण कर दिया जाए, तब सवाल सिर्फ एक मामले का नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की विश्वसनीयता का बन जाता है।
जमुई जिले के झाझा अंचल से सामने आया जमीन नामांतरण का मामला प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। दस्तावेजों में ऐसा फर्जीवाड़ा सामने आया है, जिसने न सिर्फ कानून और सरकारी प्रक्रिया को कटघरे में खड़ा किया है, बल्कि चिकित्सा विज्ञान को भी चुनौती देने वाली स्थिति पैदा कर दी है। रिकॉर्ड के अनुसार वर्ष 2010 में एक महिला की उम्र 51 वर्ष थी, जबकि उसी महिला का कथित बेटा शपथ-पत्र में 50 वर्ष का बताया गया। यानी कागजों के हिसाब से एक साल की बेटी मां बन गई।
यह मामला अब पूरे जिले में चर्चा का विषय बना हुआ है और लोग दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग कर रहे हैं।
क्या है पूरा मामला?
मामला झाझा अंचल के बाराजोर (तेलियाडीह) गांव का है। आरोप है कि गोवर्धन दास के परिवार से जुड़े जमीन नामांतरण के दौरान भाइयों को मृत दिखाकर फर्जी तरीके से उत्तराधिकार तय किया गया।
सबसे चौंकाने वाली बात यह सामने आई कि शपथ-पत्र के आधार पर सुखदेव को गोवर्धन दास की पुत्री खगिया देवी का पुत्र दिखाया गया, जबकि उपलब्ध दस्तावेज और पारिवारिक जानकारी इस दावे को पूरी तरह गलत साबित कर रहे हैं।
रिकॉर्ड में उम्र का ऐसा खेल जिसने सबको चौंका दिया
खगिया देवी के आधार कार्ड के अनुसार उनकी जन्मतिथि 1 जनवरी 1959 है। यानी वर्ष 2010 में उनकी उम्र 51 वर्ष थी।
वहीं, शपथ-पत्र में सुखदेव ने अपनी उम्र 50 वर्ष बताई है।
ऐसे में अब सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या एक वर्ष की बच्ची किसी 50 वर्षीय व्यक्ति की मां हो सकती है? यही तथ्य पूरे मामले को संदेहास्पद बना रहा है।
शपथ-पत्र में बदल दिए गए रिश्ते
दस्तावेजों के अनुसार सुखदेव, छुछनरिया निवासी छकन रविदास की पत्नी स्वर्गीय पारो देवी की संतान बताया गया है।
आरोप है कि शपथ-पत्र के जरिए उसे गोवर्धन दास की पुत्री खगिया देवी का पुत्र और शोभन रविदास तथा टुकलाल रविदास का भाई बना दिया गया।
यही नहीं, इसी आधार पर जमीन के उत्तराधिकार और नामांतरण की प्रक्रिया भी पूरी कर दी गई।
खगिया देवी ने बताया—मेरे बेटों में कोई सुखदेव नहीं
परिवार की ओर से बताया गया कि खगिया देवी के चार पुत्र हैं:
- प्रकाश रविदास
- नाथू रविदास
- हरि रविदास
- संजय रविदास
इनमें कहीं भी सुखदेव दास का नाम शामिल नहीं है।
खगिया देवी की शादी झाझा अंचल के सुंदरीटांड गांव निवासी वासुदेव दास से हुई थी।
वंशावली की जगह सिर्फ शपथ-पत्र, नियमों पर उठे सवाल
जानकारों के अनुसार उस समय वंशावली तैयार करने में शपथ-पत्र सहायक दस्तावेज हो सकता था, लेकिन केवल शपथ-पत्र के आधार पर वंशावली मान लेना नियमों के अनुरूप नहीं माना जाता।
सामान्यतः मुखिया, सरपंच और अंचल अधिकारी द्वारा सत्यापित वंशावली के आधार पर उत्तराधिकारी तय किए जाते हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि इस मामले में अधिकृत वंशावली की आवश्यकता क्यों नहीं समझी गई और केवल शपथ-पत्र के आधार पर इतनी महत्वपूर्ण प्रक्रिया कैसे पूरी कर दी गई।

तत्कालीन अधिकारियों की भूमिका भी सवालों के घेरे में
पूरे मामले में तत्कालीन अंचल अधिकारी, अंचल निरीक्षक और राजस्व कर्मचारी की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं।
आरोप है कि यदि दस्तावेजों की सही तरीके से जांच होती तो उम्र और रिश्तों से जुड़ी इतनी बड़ी विसंगति आसानी से पकड़ में आ सकती थी।
यही वजह है कि इस पूरे प्रकरण में प्रशासनिक लापरवाही या मिलीभगत की आशंका भी जताई जा रही है।
पीड़ित परिवार को न्याय का इंतजार
पीड़ित पक्ष का कहना है कि फर्जी दस्तावेजों के आधार पर उनके अधिकारों को प्रभावित किया गया। अब उनकी निगाहें जिला प्रशासन पर टिकी हैं।
लोगों का कहना है कि यदि सरकारी रिकॉर्ड में इस तरह रिश्ते बदले जा सकते हैं तो आम नागरिक अपनी पैतृक संपत्ति को लेकर कितना सुरक्षित है, यह बड़ा सवाल है।
अब सरकारी कार्यालयों से सबसे बड़ा सवाल
इस पूरे मामले ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं—
- क्या सरकारी कार्यालयों में दस्तावेजों का सत्यापन केवल औपचारिकता बनकर रह गया है?
- क्या नियमों को दरकिनार कर जमीन का नामांतरण किया गया?
- यदि फर्जीवाड़ा साबित होता है तो जिम्मेदार अधिकारियों और लाभ लेने वालों पर क्या कार्रवाई होगी?
अब सभी की निगाहें जिला प्रशासन की जांच और आगे की कार्रवाई पर टिकी हुई हैं।
Written & Edit by : Chandan Patel.
