बिहार में बढ़ता सूखा नशा: युवाओं को ले रहा अपनी चपेट में -सुख-चैन छीन रहा हैं ये नशा, बिहार के लिए एक गंभीर सामाजिक संकट..
बिहार में बढ़ता सूखा नशा: बिहार आज एक गंभीर सामाजिक संकट से जूझ रहा है। शराबबंदी लागू होने के बाद जहाँ एक ओर शराब की उपलब्धता पर रोक लगी, वहीं दूसरी ओर सूखे नशे (ड्रग्स) का प्रचलन तेज़ी से बढ़ा है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि इस नशे की चपेट में किशोर और युवा वर्ग अपनी चपेट में लेती जा रही है और उनके सपनों, स्वास्थ्य, भविष्य और परिवारिक सुख-शांति को नष्ट कर रही है। नशा अब केवल शहरों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि गाँव-गाँव तक फैल चुका है, जो बिहार के सामाजिक ताने-बाने के लिए एक बड़ा खतरा बन गया है। यह समस्या केवल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक, आर्थिक और नैतिक मूल्यों को भी कमजोर कर रही है।
बिहार में नशे की समस्या की वर्तमान स्थिति
हाल के वर्षों में बिहार में शराबबंदी कानून लागू होने के बावजूद नशे के अन्य रूप जैसे—
- गांजा, चरस
- स्मैक
- ब्राउन शुगर
- इंजेक्शन ड्रग्स
- नशीली दवाइयाँ (कफ सिरप, टेबलेट आदि)
- सिंथेटिक ड्रग्स
- स्थानीय स्तर पर इन्हें अलग-अलग नामों से जाना जाता है, जिससे इनकी पहचान और रोकथाम और भी कठिन हो जाती है।
ये नशा तेजी से फैल रहे हैं। खासकर 12 से 35 वर्ष की उम्र के युवा इसकी सबसे बड़ी शिकार आबादी बनते जा रहे हैं।
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युवाओं पर नशे का प्रभाव
नशा बिहार के युवाओं से उनका सुख-चैन, आत्मविश्वास और भविष्य छीन रहा है।
- पढ़ाई और करियर बर्बाद हो रहा है
- शारीरिक और मानसिक बीमारियाँ बढ़ रही हैं
- अपराध, चोरी और हिंसा की घटनाओं में वृद्धि
- पारिवारिक कलह और आर्थिक तंगी
- आत्महत्या जैसे गंभीर कदम
कई होनहार युवा, जो देश और समाज का भविष्य हो सकते थे, आज नशे के कारण अंधकार में डूबते जा रहे हैं।
बिहार में सूखे नशे के बढ़ने के मुख्य कारण
बिहार में नशे के बढ़ते प्रचलन के पीछे कई कारण हैं:
- बेरोजगारी और गरीबी – काम के अभाव में युवा गलत रास्तों की ओर बढ़ रहे हैं
- शिक्षा और जागरूकता की कमी
- साथियों का दबाव (Peer Pressure)
- आसानी से उपलब्ध नशीले पदार्थ और अवैध नेटवर्क ग्रामीण और शहरी—दोनों इलाकों में नशे का अवैध कारोबार फैल चुका है। छोटे स्तर के डीलर युवाओं को आसानी से निशाना बनाते हैं।
- मानसिक तनाव और पारिवारिक समस्याएँ
- शराबबंदी के बाद विकल्प के रूप में नशा शराबबंदी के बाद कई लोग शराब की जगह सूखे नशों की ओर मुड़ गए। ये नशे कम मात्रा में, आसानी से छिपाकर और अपेक्षाकृत सस्ते में उपलब्ध हो जाते हैं।
- गलत संगति और सोशल मीडिया का प्रभाव गलत मित्र मंडली, सोशल मीडिया पर नशे को “स्टाइल” या “कूल” दिखाया जाना युवाओं को इस दलदल में खींच रहा है।
परिवार और समाज पर प्रभाव
नशे की लत केवल व्यक्ति को नहीं, बल्कि पूरे परिवार और समाज को प्रभावित करती है।
- माता-पिता मानसिक पीड़ा झेलते हैं
- घरेलू हिंसा और तलाक के मामले बढ़ते हैं
- समाज में अपराध और असुरक्षा का माहौल बनता है
- आने वाली पीढ़ी पर गलत प्रभाव पड़ता है
सरकार और प्रशासन की भूमिका
सरकार द्वारा कई प्रयास किए जा रहे हैं, जैसे:
- शराबबंदी कानून
- नशा मुक्ति केंद्रों की स्थापना
- पुलिस और प्रशासन की कार्रवाई
लेकिन केवल कानून से समस्या का समाधान संभव नहीं है। जमीनी स्तर पर प्रभावी क्रियान्वयन और मानव संवेदनशीलता की आवश्यकता है।
समाधान और आगे की राह
इस गंभीर समस्या से निपटने के लिए सामूहिक प्रयास जरूरी हैं:
- स्कूल और कॉलेजों में नशा विरोधी शिक्षा
- युवाओं के लिए रोजगार और कौशल विकास
- परिवारों में खुला संवाद
- समाज और धार्मिक संस्थाओं की भागीदारी
- नशा मुक्ति केंद्रों को मजबूत करना
निष्कर्ष
बिहार का युवा उसकी सबसे बड़ी ताकत है। यदि यही युवा नशे की गिरफ्त में फँसता रहा, तो राज्य और देश का भविष्य खतरे में पड़ सकता है।
आज जरूरत है जागरूकता, संवेदना और सामूहिक जिम्मेदारी की।
आइए, मिलकर संकल्प लें कि हम बिहार के युवाओं को नशे के अंधकार से निकालकर उज्ज्वल भविष्य की ओर ले जाएँगे।
नशा नहीं, विकास चाहिए।
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