नई दिल्ली: बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की जिम्मेदारी पर सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी प्रतिबंधित सामग्री को पेवॉल या पेड सब्सक्रिप्शन के जरिए भी उपलब्ध नहीं कराया जा सकता। साथ ही, केंद्र सरकार से नियमों का उल्लंघन करने वाले प्लेटफॉर्म पर भारी आर्थिक जुर्माने की व्यवस्था पर विचार करने और ऐसी सामग्री से होने वाली कमाई जब्त करने के उपाय करने को कहा है।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने बच्चों की सुरक्षा को गंभीर विषय बताते हुए कहा कि सोशल मीडिया कंपनियों को अपनी जिम्मेदारियों का प्रभावी ढंग से पालन करना होगा। अदालत ने प्रतिबंधित सामग्री की पहचान, उसे हटाने और उसके प्रसार को रोकने के लिए तकनीकी व्यवस्था मजबूत करने पर भी जोर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या-क्या निर्देश दिए?
सुप्रीम कोर्ट ने 15 अक्टूबर को दिए गए आदेश में बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी सामग्री को रोकने में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की भूमिका पर सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि वर्ष 2024 में निर्देश दिए जाने के बावजूद उनके पालन में अपेक्षित प्रगति नहीं हुई है।
अदालत के प्रमुख निर्देश इस प्रकार हैं:
- बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी प्रतिबंधित सामग्री को पेड सब्सक्रिप्शन या पेवॉल के जरिए उपलब्ध नहीं कराया जा सकता।
- प्रतिबंधित सामग्री से सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से हुई कमाई को जब्त करने और वापस लेने की व्यवस्था पर काम किया जाए।
- सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम और संबंधित नियमों का उल्लंघन करने वाले प्लेटफॉर्म पर भारी आर्थिक जुर्माने की व्यवस्था पर विचार किया जाए।
- प्रतिबंधित सामग्री की पहचान और उसे हटाने के लिए प्रभावी तकनीकी उपाय अपनाए जाएं।
- सोशल मीडिया कंपनियों की जवाबदेही तय करने और संबंधित अधिकारियों को सूचना देने की प्रक्रिया मजबूत की जाए।
नियम तोड़ने वाले सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर कैसे लगेगा जुर्माना?
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की जिम्मेदारियों के उल्लंघन पर भारी आर्थिक दंड लगाने की व्यवस्था पर विचार करने को कहा है।
अदालत के अनुसार, जुर्माने की राशि तय करते समय उल्लंघन की गंभीरता, उसकी अवधि, बार-बार नियम तोड़ने की स्थिति और कंपनी के आकार तथा कारोबार को ध्यान में रखा जाना चाहिए।
इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सोशल मीडिया कंपनियां बच्चों की सुरक्षा से जुड़े नियमों को गंभीरता से लें। हालांकि, अदालत ने जुर्माने की कोई निश्चित राशि तय नहीं की है। इस संबंध में केंद्र सरकार को व्यवस्था पर विचार करने का निर्देश दिया गया है।
सोशल मीडिया एल्गोरिदम पर भी अदालत की नजर
सुप्रीम कोर्ट ने सोशल मीडिया एल्गोरिदम के जरिए हानिकारक सामग्री तक पहुंच बनाने वाले अप्रत्यक्ष लिंक साझा किए जाने पर चिंता जताई। ऐसे लिंक के माध्यम से प्रतिबंधित सामग्री तक पहुंचने का रास्ता बन सकता है और कानूनी प्रावधानों को लागू करने में कठिनाई हो सकती है।
अदालत ने केंद्र सरकार को बड़े सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर प्रतिबंधित सामग्री की पहचान और उसे हटाने के लिए दिशा-निर्देश या मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) तैयार करने को कहा है।
इसमें परसेप्चुअल हैश मैचिंग तकनीक और यूआरएल सूची का इस्तेमाल किया जा सकता है। हैश मैचिंग तकनीक तस्वीरों और वीडियो की डिजिटल पहचान के आधार पर समान सामग्री का पता लगाने में मदद करती है। इससे बदलाव करके दोबारा अपलोड की गई सामग्री की पहचान करने में भी सहायता मिल सकती है।
प्रतिबंधित सामग्री रोकने के लिए बनेगा राष्ट्रीय डेटाबेस
सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी सामग्री की पहचान करने और उसे हटाने के लिए राष्ट्रीय हैश तथा यूआरएल सूची डेटाबेस बनाने का निर्देश दिया है।
इस व्यवस्था का उद्देश्य विभिन्न प्लेटफॉर्म पर प्रतिबंधित सामग्री के प्रसार को रोकना और उसकी पहचान की प्रक्रिया को प्रभावी बनाना है।
यदि किसी प्लेटफॉर्म को अज्ञात स्रोत से ऐसी सामग्री मिलती है, तो निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार उचित सत्यापन और जांच की जानी चाहिए। इसके बाद संबंधित अधिकारियों और निर्धारित डेटाबेस निकाय को सूचना देने की व्यवस्था का पालन करना होगा।
अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल तकनीकी व्यवस्था बनाना पर्याप्त नहीं है। सोशल मीडिया कंपनियों और संबंधित अधिकारियों को भी बच्चों की सुरक्षा के लिए गंभीरता से काम करना होगा।
क्या बच्चों को इंटरनेट से दूर रखना ही समाधान है?
सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा के साथ उनके मौलिक अधिकारों को भी महत्वपूर्ण बताया है। अदालत ने कहा कि इंटरनेट का इस्तेमाल करना संविधान के अनुच्छेद 21 और अनुच्छेद 19(1)(क) के तहत मौलिक अधिकारों से जुड़ा है। बच्चों को भी ये अधिकार प्राप्त हैं।
अदालत के अनुसार, बच्चों को पूरी तरह इंटरनेट से दूर रखना समस्या का उचित समाधान नहीं है। ऐसा करने से वे दूसरी, अनियमित और अधिक असुरक्षित वेबसाइटों की ओर जा सकते हैं।
इसलिए जरूरी है कि बच्चों को इंटरनेट से वंचित करने के बजाय उनकी ऑनलाइन सुरक्षा के लिए प्रभावी उपाय किए जाएं। हानिकारक सामग्री की पहचान, उसे हटाने और उसके प्रसार को रोकने की जिम्मेदारी भी गंभीरता से निभाई जानी चाहिए।
पॉक्सो कानून में बदलाव पर भी विचार
सुप्रीम कोर्ट ने संसद से बच्चों से जुड़ी यौन शोषणकारी सामग्री के लिए इस्तेमाल होने वाली शब्दावली में बदलाव पर विचार करने को कहा है। अदालत ने ‘चाइल्ड पोर्नोग्राफिक मटीरियल’ के स्थान पर ‘चाइल्ड एक्सप्लॉइटेटिव एंड एब्यूज मटीरियल’ (CSEAM) यानी बच्चों के शोषण और दुर्व्यवहार से जुड़ी सामग्री जैसे शब्द के इस्तेमाल पर जोर दिया है।
इस बदलाव का उद्देश्य बच्चों के साथ होने वाले अपराधों की गंभीरता को अधिक स्पष्ट रूप से सामने लाना है।
बच्चों से जुड़ी प्रतिबंधित यौन सामग्री को देखने, डाउनलोड करने, रखने या प्रसारित करने से संबंधित कृत्य परिस्थितियों और लागू कानूनी प्रावधानों के अनुसार पॉक्सो अधिनियम तथा सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के तहत अपराध हो सकते हैं।
आगे क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद केंद्र सरकार की भूमिका अहम होगी। सरकार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की जवाबदेही, आर्थिक जुर्माने, प्रतिबंधित सामग्री से हुई कमाई की जब्ती और तकनीकी निगरानी की व्यवस्था पर विचार करना होगा।
यह मामला केवल सोशल मीडिया से आपत्तिजनक सामग्री हटाने तक सीमित नहीं है, बल्कि बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा, डिजिटल प्लेटफॉर्म की जवाबदेही और मौलिक अधिकारों के बीच संतुलन से भी जुड़ा है।
सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट संदेश है कि बच्चों की सुरक्षा के लिए प्रभावी कदम उठाए जाने चाहिए। प्रतिबंधित सामग्री को पेड सब्सक्रिप्शन के पीछे छिपाकर उपलब्ध कराना भी स्वीकार्य नहीं है और नियमों का उल्लंघन करने वाले प्लेटफॉर्म की जवाबदेही तय होनी चाहिए।
Written & Edit by : Chandan Patel
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