Part -2 हाँ… मैं आवारा हूँ।
हाँ… मैं आवारा हूँ।
रास्तों का हूँ, ठिकानों का नहीं,
धूप से दोस्ती है मेरी,
पर किसी साये का नहीं।
हाँ… मैं आवारा हूँ।
हवाओं के संग बहता हूँ,
कभी शहरों में खो जाता,
कभी खुद में ही रहता हूँ।
ना कोई अपना कहने वाला,
ना कोई नाम पुकारे मेरा,
भीड़ में चेहरों की दुनिया है,
पर कोई नहीं सहारा मेरा।
हाँ… मैं आवारा हूँ।
टूटे ख्वाबों का मुसाफ़िर,
आँखों में अधूरी नींद लिए,
चलता हूँ बनकर एक मुसाफ़िर।
कभी चाँद से बातें करता,
कभी रातों से रिश्ता जोड़ता,
दिल में दर्द छुपाए इतना,
कि हँसकर भी खुद को तोड़ता।
हाँ… मैं आवारा हूँ।
पर ये आवारापन सज़ा नहीं,
ये मेरी आज़ादी की कीमत है,
जो हर किसी को मिला नहीं।
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मैं चलता रहूँगा यूँ ही,
बिना मंज़िल, बिना ठिकाने,
क्योंकि बंध जाना मेरी फितरत नहीं,
और रुक जाना मेरे बस में नहीं।
हाँ… मैं आवारा हूँ…
और शायद यही मेरी पहचान है।

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