New Delhi । लोकसभा में सरकार और विपक्ष के बीच जारी टकराव अब सिर्फ प्रक्रिया का नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक गरिमा का सवाल बनता जा रहा है। आम बजट पर चर्चा से पहले भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता पर संक्षिप्त चर्चा की मांग को लेकर विपक्ष अड़ा है, जबकि सरकार नेता प्रतिपक्ष से पहले खेद जताने की शर्त रख रही है।

नतीजा यह है कि संसद की कार्यवाही सुचारु रूप से चलने का मसला अब शर्त बनाम शर्त में उलझ गया है। अब संकेत साफ हैं—बजट सत्र का पहला चरण हंगामे की भेंट चढ़ सकता है।

राहुल गांधी की मांग: पहले देश, फिर बजट

सोमवार को नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने साफ कहा कि आम बजट जैसे अहम विषय से पहले भारत-अमेरिका व्यापार समझौते पर सदन में संक्षिप्त चर्चा जरूरी है। उनका तर्क है कि यह मुद्दा सीधे देश की अर्थव्यवस्था, किसानों, छोटे व्यापारियों और रोजगार से जुड़ा है।

राहुल गांधी सपा प्रमुख अखिलेश यादव और टीएमसी सांसद अभिषेक बनर्जी के साथ लोकसभा अध्यक्ष से मिले भी। करीब आधे घंटे चली बैठक के बाद उम्मीद जगी कि रास्ता निकल आएगा। राहुल ने दावा किया कि अध्यक्ष ने उन्हें बजट से पहले बोलने का आश्वासन दिया है।

लेकिन सरकार की ओर से संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने अलग तस्वीर पेश की। उनका कहना है कि यह सहमति बनी थी कि व्यापार समझौते पर बोलने के बाद सदन सामान्य रूप से चलेगा।यहीं से अविश्वास की दीवार और ऊंची हो गई।

विपक्ष
लोकसभा में नेता विपक्ष राहुल गांधी और सपा प्रमुख अखिलेश यादव

सरकार की शर्त: पहले खेद, फिर संवाद

सरकारी सूत्रों के मुताबिक, सत्ता पक्ष चाहता है कि राहुल गांधी पहले सत्र के दौरान हुई घटनाओं—आसन की अवमानना, प्रधानमंत्री पर कथित टिप्पणियां और विपक्षी सदस्यों के व्यवहार—पर खेद जताएं।

सरकार को आशंका है कि अगर राहुल को पहले बोलने दिया गया, तो उसके बाद भी विपक्ष सदन चलने नहीं देगा। यह डर या रणनीति—जो भी हो—लेकिन इसका असर संसद की कार्यवाही पर साफ दिख रहा है।

लोकसभा में नेता विपक्ष की आवाज़ पर पहरा?

यह सवाल अब संसद के बाहर भी गूंजने लगा है—क्या दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में नेता प्रतिपक्ष को बोलने देने के लिए भी शर्तें तय होंगी?

संविधान में विपक्ष की भूमिका सिर्फ विरोध की नहीं, बल्कि सत्ता से सवाल पूछने की भी है। लेकिन मौजूदा हालात में ऐसा लग रहा है मानो सरकार असहज सवालों से बचने के लिए प्रक्रिया को हथियार बना रही है। भावनात्मक पहलू यह भी है कि करोड़ों मतदाताओं की आवाज़ संसद में राहुल गांधी के जरिए पहुंचती है। अगर वही आवाज़ शर्तों में जकड़ दी जाए, तो लोकतंत्र की आत्मा घायल होती है।

पुराने विवादों ने बढ़ाई खाई

बजट सत्र के दौरान अप्रकाशित किताब का मुद्दा, सांसदों का निलंबन, विपक्षी महिला सांसदों से जुड़ी टिप्पणियां और प्रधानमंत्री पर हमले की कथित साजिश जैसे मामलों ने पहले ही सरकार-विपक्ष के रिश्तों में दरार डाल दी है।

राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा के दौरान हुई घटनाओं को लेकर सरकार का कहना है कि उस दिन विपक्ष बेहद आक्रामक था—कागज फाड़े जा रहे थे, प्रधानमंत्री के रास्ते को घेरा गया था। वहीं विपक्ष इसे सत्ता का दबाव और आवाज़ दबाने की कोशिश बता रहा है।

चार दिन, कई सवाल

बजट सत्र के इस चरण में अब महज चार कार्यदिवस बचे हैं। संकेत हैं कि सरकार को आम बजट पर चर्चा के लिए ध्वनिमत का सहारा लेना पड़ सकता है। सरकारी रणनीतिकार मानते हैं कि दूसरे चरण से पहले कोई बीच का रास्ता निकाला जा सकता है, लेकिन तब तक लोकतंत्र की साख पर सवाल खड़े होते रहेंगे।

संसद चले, संवाद से चले

आज जरूरत इस बात की है कि संसद हंगामे से नहीं, संवाद से चले। शर्तों से नहीं, सहमति से चले। और सबसे अहम—नेता प्रतिपक्ष की आवाज़ को सम्मान मिले। क्योंकि जब संसद में सवाल पूछना मुश्किल हो जाए, तब सड़क ही लोकतंत्र का मंच बन जाती है—और यही किसी भी मजबूत लोकतंत्र के लिए सबसे खतरनाक संकेत होता है।

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