15 अगस्त 1947 को भारत आज़ाद तो हो गया, लेकिन असली परीक्षा इसके बाद शुरू हुई। सवाल यह था कि आज़ाद भारत चलेगा कैसे? देश का शासन कौन करेगा? अधिकार किसके होंगे? और सबसे ज़रूरी—आम आदमी की आवाज़ की कीमत क्या होगी? इन्हीं सवालों का जवाब बना 26 जनवरी 1950, जब भारत ने खुद को एक संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित किया। यही दिन था जब भारत को सिर्फ आज़ादी ही नहीं, बल्कि संविधान के ज़रिये आत्मसम्मान और पहचान मिली। संविधान के लागू होने के बाद ही आम भारतीय को यह भरोसा मिला कि अब उसका भविष्य कानून, अधिकार और न्याय के सहारे चलेगा — किसी राजा, किसी हुक्मरान की मर्जी से नहीं।

संविधान लागू होने के बाद कितना बदला भारत?
संविधान लागू होने के समय भारत के सामने चुनौतियों का पहाड़ था —अशिक्षा, गरीबी, जातिवाद, महिलाओं की बदहाल स्थिति और सामाजिक असमानता।
लेकिन बीते 76 वर्षों में भारत ने कई मोर्चों पर लंबी छलांग लगाई है।
मताधिकार: कभी गिने-चुने लोगों तक सीमित वोट का अधिकार आज हर 18 साल के नागरिक के पास है।
सामाजिक न्याय: अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण ने लाखों लोगों को मुख्यधारा से जोड़ा।
महिलाओं के अधिकार: संपत्ति में अधिकार, शिक्षा, पंचायती राज में भागीदारी और अब संसद में महिला आरक्षण—यह सब संविधान की देन है।
संघीय ढांचा: राज्यों को अधिकार देकर देश को एकजुट रखा गया।
आज भारत चांद तक पहुंच गया है, डिजिटल इंडिया बना है, दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। यह बदलाव सिर्फ सरकारों से नहीं आया, बल्कि उस संविधान से आया जिसने हर नागरिक को बराबरी का हक दिया।
भारत के संविधान के कुछ मूल स्तंभ
अनुच्छेद 14 — कानून के सामने सब बराबर
अनुच्छेद 19 — बोलने, लिखने और विरोध करने की आज़ादी
अनुच्छेद 21 — सम्मान के साथ जीने का अधिकार देती है
इन्हीं अधिकारों की बदौलत आज भारत—दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, तकनीक में आगे है,अर्थव्यवस्था में मजबूत हो रहा है। यह बदलाव किसी एक सरकार का नहीं,
संविधान की ताक़त का नतीजा है।

लेकिन क्या आज संविधान का सही पालन हो रहा है?
यहीं से सवाल थोड़े कड़वे हो जाते हैं।
संविधान की किताब आज भी उतनी ही पवित्र है, लेकिन उसकी आत्मा पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
अभिव्यक्ति की आज़ादी: सवाल पूछने वालों को देशद्रोही कहा जाना, पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं पर दबाव — क्या यह संविधान की भावना है?
समानता का अधिकार: कानून सबके लिए बराबर है, लेकिन ज़मीनी हकीकत में आम आदमी और ख़ास आदमी के लिए न्याय का पैमाना अलग दिखता है।
धर्मनिरपेक्षता: संविधान धर्म से ऊपर नागरिक को रखता है, लेकिन आज राजनीति में धर्म की भूमिका बढ़ती दिख रही है।
संस्थाओं की स्वतंत्रता: न्यायपालिका, चुनाव आयोग और मीडिया जैसी संस्थाओं की निष्पक्षता पर सवाल उठना लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है।
संविधान सिर्फ कागज़ पर लागू हो, और ज़िंदगी में नहीं—तो वह संविधान अधूरा रह जाता है।
आम जनता के लिए संविधान क्या है?
आम आदमी के लिए संविधान कोई मोटी किताब नहीं, बल्कि उसका ढाल और हथियार है।
जब गरीब को वोट देने का हक मिलता है
जब मज़दूर को न्यूनतम मज़दूरी का अधिकार मिलता है
जब महिला को बराबरी और सुरक्षा मिलती है
जब अल्पसंख्यक खुद को सुरक्षित महसूस करता है तब संविधान ज़िंदा रहता है।
लेकिन जब आम नागरिक डर, बेरोज़गारी, महंगाई और अन्याय के बीच अपनी आवाज़ खो देता है, तब संविधान सिर्फ समारोहों तक सिमट जाता है।
ख़ास वर्ग और संविधान
दुर्भाग्य यह है कि सत्ता, पैसा और प्रभाव रखने वालों के लिए संविधान अक्सर लचीला हो जाता है।
कानून की धार गरीब के लिए तेज़ और ताक़तवर के लिए कुंद दिखे — तो यह संविधान की नहीं, उसके पालन की विफलता है।
संविधान की असली परीक्षा
संविधान की असली परीक्षा किसी परेड, भाषण या पोस्टर में नहीं होती।
वह परीक्षा होती है—थाने में न्याय मांगते आम आदमी के साथ।
कोर्ट के बाहर सालों से इंतजार करते गरीब के साथ।
सवाल पूछते छात्र और पत्रकार के साथ।
अगर ये सुरक्षित हैं, तो संविधान सुरक्षित है।
रास्ता अभी बाकी है
भारत बदल गया है, इसमें कोई शक नहीं।
लेकिन सवाल यह नहीं कि भारत कितना आगे बढ़ा —सवाल यह है कि क्या हम संविधान की मूल भावना के साथ आगे बढ़े?
संविधान सरकार का नहीं, जनता का दस्तावेज़ है।
जब तक जनता सजग रहेगी, सवाल पूछेगी और अपने अधिकार पहचानेगी—तब तक लोकतंत्र जिंदा रहेगा।
क्योंकि संविधान सिर्फ कानून नहीं, यह भारत की आत्मा है।

