कहीं मैं कृष्ण जैसा बदनसीब तो नहीं?
कभी-कभी जीवन के किसी मोड़ पर खड़े होकर मन खुद से सवाल करता है—
“क्या मैं भी कृष्ण जैसा बदनसीब हूँ?”
कृष्ण…
नाम लेते ही लोग भगवान देख लेते हैं,
लेकिन शायद ही कोई उस “मनुष्य कृष्ण” को देख पाता है,
जिसने मुस्कुराते हुए सबसे ज़्यादा दर्द सहा।
कृष्ण का जन्म जेल में हुआ,
मौत सिर पर थी,
माता-पिता होते हुए भी गोद नसीब नहीं हुई।
बचपन दूसरों के आँगन में बीता,
अपनों से दूर, अपनी पहचान से दूर।
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आज जब मैं खुद को देखता हूँ,
तो लगता है—
मेरे आसपास लोग हैं,
फिर भी मैं अकेला हूँ।
मेरी हँसी लोगों को दिखती है,
पर मेरे अंदर का रोना कोई नहीं सुनता।
कृष्ण ने कभी अपने लिए कुछ नहीं माँगा।
उन्होंने सबके लिए जिया—
माँ-बाप के लिए,
मित्रों के लिए,
धर्म के लिए,
और अंत में…
उन लोगों के लिए भी,
जिन्होंने उन्हें समझा ही नहीं।
क्या यही बदनसीबी नहीं?
राधा से प्रेम था,
लेकिन विवाह किसी और से हुआ।
जिसे आत्मा चाहती थी,
उसे समाज ने स्वीकार नहीं किया।
और जिसे समाज ने स्वीकार किया,
वो दिल से कभी जुड़ नहीं पाया।
आज मेरे जीवन में भी कुछ ऐसा ही है।
जिसे चाहता हूँ,
वो मेरी नहीं हो पाती।
और जो साथ है,
वो मुझे समझ नहीं पाता।
कृष्ण ने अर्जुन को गीता दी,
सबको राह दिखाई,
लेकिन जब दर्द उनके हिस्से आया,
तो कोई गीता उन्हें समझाने नहीं आया।
मैं भी तो यही करता हूँ—
सबको समझाता हूँ,
सबको संभालता हूँ,
लेकिन जब मैं टूटता हूँ,
तो लोग कहते हैं—
“तुम तो मजबूत हो, तुम्हें क्या होगा?”
सबसे बड़ी बदनसीबी ये नहीं होती
कि लोग साथ छोड़ दें,
सबसे बड़ी बदनसीबी ये होती है
कि लोग ये मान लें
कि “तुम्हें दर्द होता ही नहीं।”
कृष्ण ने कभी शिकायत नहीं की।
उन्होंने मुस्कान को अपना कवच बना लिया।
और शायद…
मैं भी वही कर रहा हूँ।
इसलिए जब मन बहुत भारी हो जाता है,
तो खुद से पूछता हूँ—
“कहीं मैं कृष्ण जैसा बदनसीब तो नहीं?”
लेकिन फिर याद आता है—
कृष्ण बदनसीब नहीं थे।
वो तो इतने मजबूत थे
कि ईश्वर बन गए।
शायद…
जो सबसे ज़्यादा सहता है,
वही सबसे ऊँचा उठता है।
और अगर मेरा दर्द भी
मुझे बेहतर इंसान बना रहा है,
तो शायद मैं बदनसीब नहीं…
बस “चुपचाप मजबूत बन रहा हूँ।”

मैं कृष्ण तो नहीं,
किंतु..
उनसे सीख तो सकता हूँ ..
बुरा न सही,
परन्तु..
उनसे कुछ अच्छा सीख तो सकता हूं..
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