बिहार की राजनीति में जब-जब सामाजिक न्याय की बात होती है, तब-तब इबीसी (अत्यंत पिछड़ा वर्ग) का नाम सामने आता है। वोट बैंक की राजनीति में ये समाज सबसे अहम भूमिका निभाता है, लेकिन सच्चाई यह है कि आज भी इबीसी समाज खुद को ठगा हुआ महसूस करता है।

नेताओं की भीड़, पर समाज हाशिए पर

बिहार में इबीसी समाज के बड़े-बड़े नेता हैं। कई बार विधानसभा और संसद तक पहुंचे। लेकिन सवाल यह है कि क्या इन नेताओं ने अपने समाज की तकदीर बदली? गाँव-गाँव से लेकर शहर तक, इबीसी समाज अब भी अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए जूझ रहा है। शिक्षा, नौकरी और सम्मान – इन तीनों मोर्चों पर यह समाज खुद को पीछे पाता है।

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फाइल फोटो: सीएम नीतीश कुमार और राजद राष्ट्रीय अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव

वोट के समय याद, बाद में भुला दिए जाते हैं

चुनाव आते ही हर पार्टी को इबीसी समाज की याद आती है। बड़े-बड़े वादे होते हैं, भाषणों में ‘अत्यंत पिछड़ा वर्ग’ का नाम गूंजता है। लेकिन चुनाव जीतते ही ये समाज नेताओं की प्राथमिकता सूची से गायब हो जाता है। यही कारण है कि लोग कहते हैं – “हमारे वोट से सरकार बनती है, लेकिन सरकार बनने के बाद हमें भूल जाते हैं।”

प्रतिनिधित्व है, लेकिन असर नहीं

यह सच है कि बिहार विधानसभा में इबीसी समाज से दर्जनों विधायक हैं। पंचायत से लेकर राज्यसभा तक लोग पहुंचे हैं। मगर असली सवाल है – क्या इन नेताओं ने कभी ईमानदारी से अपने समाज के मुद्दे उठाए? न शिक्षा में सुधार, न रोजगार का रास्ता, न ही सरकारी योजनाओं का सही लाभ। नतीजा यह है कि समाज में निराशा और ठगे जाने का एहसास गहराता जा रहा है।

सपनों और हकीकत के बीच दूरी

इबीसी समाज के बच्चे आज भी सरकारी स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं। कॉलेज में दाखिला मिल भी गया तो नौकरी का अवसर कम है। जो योजनाएँ बनती हैं, उनका लाभ अक्सर कागजों तक ही सिमट जाता है। गाँव के मजदूर, रिक्शा चालक, खेतिहर किसान – सब इस इंतजार में हैं कि कब उनका जीवन सुधरेगा।

बिहार का सामाजिक सच: आंकड़ों की नजर से

2022 की जाति आधारित सर्वेक्षण रिपोर्ट ने साफ किया कि बिहार की सबसे बड़ी आबादी EBC (अत्यंत पिछड़ा वर्ग) है।

बिहार की कुल जनसंख्या – लगभग 13 करोड़

EBC समाज की आबादी – 36.01% (यानी लगभग 4.7 करोड़ लोग)

OBC समाज की आबादी – 27.12%

SC – 19.65%

ST – 1.68%

सवर्ण (उच्च जाति) – 15.52%

यानि अकेले EBC समाज ही राज्य की सबसे बड़ी आबादी है। हर जिले में इनकी संख्या निर्णायक है — चाहे सीवान, गोपालगंज, सारण हो या पूर्णिया, कटिहार, अररिया; चाहे जमुई, लखीसराय, गया हो या दरभंगा, मधुबनी, समस्तीपुर।

जिलेवार हालात की झलक

उत्तर बिहार (मिथिलांचल और सीमांचल): मधुबनी, दरभंगा, समस्तीपुर, पूर्णिया, कटिहार, अररिया में EBC की बड़ी आबादी है। लेकिन शिक्षा और रोज़गार की कमी से यहाँ पलायन सबसे ज्यादा है।

दक्षिण बिहार (मगध और अंग क्षेत्र): गया, नवादा, औरंगाबाद, जमुई, लखीसराय, बांका में भूमिहीन मजदूर और छोटे किसान EBC समाज की रीढ़ हैं। लेकिन गरीबी और बेरोजगारी से त्रस्त।

पश्चिम बिहार (सारण, चंपारण, भोजपुर, बक्सर): यहाँ EBC जातियों का राजनीतिक दबदबा जरूर है, लेकिन असली विकास की रफ्तार धीमी है।

दक्षिण-पूर्व बिहार (पटना, नालंदा, जहानाबाद): यहां भी सत्ता में पास रहने के बावजूद EBC समुदाय विकास और सम्मान दोनों से वंचित महसूस करता है।

क्यों ठगा हुआ महसूस करते हैं लोग?

1. जनसंख्या बल का फायदा नहीं मिला।

2. नेतृत्व है, पर ताकत नहीं।

3. नीतियाँ बनती हैं, पर जमीनी असर नहीं।

4. हर जिले में बेरोजगारी और पलायन सबसे बड़ी समस्या।

5. योजनाओं का लाभ हर बार अधूरा या भ्रष्टाचार में फंसा।

ठगे जाने का दर्द

सबसे बड़ा दर्द यह है कि इबीसी समाज से आए नेता खुद भी बड़े नेताओं की राजनीति में उलझ जाते हैं। वे समाज की आवाज़ बनने के बजाय कुर्सी और सत्ता की राजनीति में खो जाते हैं। यही वजह है कि आम आदमी कहता है –
“हमने वोट दिया, उम्मीद दी, लेकिन बदले में हमें ठगी ही मिली।”

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बिहार में इबीसी समाज की ताकत बहुत बड़ी

बिहार में इबीसी समाज की ताकत बहुत बड़ी है, लेकिन उसे अपनी ताकत का असली इस्तेमाल नहीं मिला। यह समाज तभी आगे बढ़ पाएगा, जब इसके नेता सिर्फ चुनावी वादों तक सीमित न रहकर जमीनी हकीकत बदलने की कोशिश करेंगे। वरना हर बार की तरह अगली पीढ़ी भी यही सवाल पूछेगी –
क्या हम सिर्फ वोट बैंक हैं, या इस लोकतंत्र के बराबरी के हिस्सेदार भी?

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