बांग्लादेश की राजनीति में आज एक ऐसा मोड़ आया है, जिसे आने वाले सालों तक याद किया जाएगा। दशकों से दो नामों के इर्द-गिर्द घूमती सत्ता की धुरी — शेख हसीना और खालिदा जिया — अब एक नए चेहरे के हाथों में जाती दिख रही है।
करीब 35 वर्षों बाद बांग्लादेश को नया प्रधानमंत्री मिलने जा रहा है — तारिक रहमान।
यह सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं है, बल्कि एक ऐसे व्यक्ति की वापसी है, जिसने निर्वासन, जेल, आरोपों और राजनीतिक तूफानों के बीच खुद को फिर से खड़ा किया। आज जब तारिक रहमान प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने जा रहे हैं, तो यह पल उनके जीवन के हर दर्द, हर संघर्ष और हर उम्मीद का प्रतीक बन गया है।
दो परिवारों की राजनीति से बाहर निकलता बांग्लादेश
बांग्लादेश की राजनीति लंबे समय तक दो ध्रुवों में बंटी रही — एक तरफ अवामी खेमे की शेख हसीना, दूसरी ओर राष्ट्रवादी धारा की खालिदा जिया। इन दोनों की विरासत के बीच आम जनता कहीं दबती रही। लेकिन 2026 के आम चुनावों में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की ऐतिहासिक जीत ने साफ संकेत दे दिया कि देश अब बदलाव चाहता है। युवाओं, बेरोज़गारों और मध्यम वर्ग ने इस बार भावनाओं के साथ वोट किया — और वही भावनाएं तारिक रहमान को सत्ता के दरवाज़े तक ले आईं।
चार साल की उम्र में जेल, बचपन से संघर्ष की कहानी
बहुत कम लोग जानते हैं कि तारिक रहमान जब महज़ चार साल के थे, तब 1971 के मुक्ति संग्राम के दौरान उन्हें कुछ समय के लिए हिरासत में रखा गया था।
बीएनपी आज भी उन्हें “सबसे कम उम्र के युद्ध बंदियों” में गिनती है।
सोचिए — एक बच्चा, जिसने जेल की दीवारें देखीं, वही बच्चा आज पूरे देश की जिम्मेदारी संभालने जा रहा है। शायद यही वजह है कि उनके भाषणों में दर्द भी है और जज़्बा भी।
शिक्षा से राजनीति तक का सफर
20 नवंबर 1965 को जन्मे तारिक रहमान की शुरुआती पढ़ाई ढाका के BAF Shaheen College से हुई। इसके बाद उन्होंने Dhaka Residential Model College में पढ़ाई की और आगे चलकर Dhaka University से उच्च शिक्षा प्राप्त की। यहीं से उन्होंने राजनीति में सक्रिय भूमिका निभानी शुरू की।
राजनीतिक विरासत: पिता शहीद, मां प्रधानमंत्री
तारिक रहमान किसी आम परिवार से नहीं आते। उनके पिता Ziaur Rahman बांग्लादेश के राष्ट्रपति और स्वतंत्रता सेनानी थे, जिनकी 1981 में हत्या कर दी गई। वही
उनकी मां खालिदा जिया देश की पहली महिला प्रधानमंत्री रहीं है। ऐसे परिवार में जन्म लेने वाला बच्चा राजनीति से दूर कैसे रह सकता है?
छोटे भाई अराफात रहमान (कोको) के निधन और मां की बीमारी ने तारिक को भीतर से तोड़ा, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।

2001 से तेज़ उभार, संगठन पर मजबूत पकड़
2001 में महज़ 35 साल की उम्र में तारिक सक्रिय राजनीति में उभरे। 2002 तक वे बीएनपी के वरिष्ठ नेतृत्व में शामिल हो गए। आरोप लगे कि यह भाई-भतीजावाद है, लेकिन उनके समर्थक कहते हैं — “तारिक मैदान में उतरने वाले नेता हैं।”
बिना संसद सदस्य बने भी उन्होंने पार्टी की पूरी कमान संभाली और कार्यवाहक अध्यक्ष से लेकर पूर्ण अध्यक्ष तक का सफर तय किया।
कानूनी मामलों का बोझ और जेल की यातनाएं
Awami League शासन के दौरान तारिक रहमान पर भ्रष्टाचार, धन शोधन और हत्या की साजिश जैसे गंभीर आरोप लगे।
2007 में उन्हें गिरफ्तार किया गया, करीब 17 महीने हिरासत में रहे।
उन्होंने जेल में मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न का आरोप लगाया।
उनके समर्थकों के लिए यह राजनीतिक प्रतिशोध था, आलोचकों के लिए कानून की कार्रवाई।
सच जो भी हो — इन मामलों ने उनके जीवन की दिशा बदल दी।
लंदन का लंबा निर्वासन और दूर से पार्टी संचालन
2008 में अवामी लीग की भारी जीत के बाद तारिक इलाज के बहाने लंदन चले गए — और वहीं करीब 17 साल रह गए।
दुनिया की राजनीति में यह अनोखा उदाहरण है कि कोई नेता विदेश में रहकर भी पार्टी की रणनीति, उम्मीदवार चयन और जनआंदोलन को नियंत्रित करता रहा।
उन्होंने सोशल मीडिया, ज़मीनी कार्यकर्ताओं और युवा नेताओं के जरिए बीएनपी को फिर से खड़ा किया।
‘डार्क प्रिंस’ से प्रधानमंत्री तक
जब बीएनपी गठबंधन सत्ता में था और Jamaat-e-Islami साथ में थी, उसी दौर में तारिक रहमान को आलोचकों ने “डार्क प्रिंस” का उपनाम दिया। आज वही “डार्क प्रिंस” प्रधानमंत्री बनने जा रहा है।
समय कितना बदल जाता है।
जनता की उम्मीदों का भार
तारिक रहमान कभी सांसद नहीं रहे।
उनकी ताकत रही — संगठन, परिवार की विरासत और जनता का भरोसा।
आज उनके कंधों पर एक पूरे देश की उम्मीदें हैं — रोज़गार, लोकतंत्र, न्याय, और स्थिरता।
उनके समर्थक उन्हें बदलाव का प्रतीक मानते हैं, विरोधी वंशवादी राजनीति का चेहरा।
लेकिन सच यह है कि अब फैसला इतिहास करेगा।
एक भावुक अंत
चार साल की उम्र में जेल देखने वाला बच्चा… पिता की शहादत झेलने वाला बेटा… मां की बीमारी के बीच पार्टी संभालने वाला नेता… लंदन के अकेलेपन में रणनीति गढ़ने वाला संगठनकर्ता…
आज वही तारिक रहमान बांग्लादेश का प्रधानमंत्री बनने जा रहा है।
यह सिर्फ एक राजनीतिक जीत नहीं — यह धैर्य, दर्द और दृढ़ता की कहानी है।
बांग्लादेश आज नए दौर में कदम रख रहा है।
और पूरा दक्षिण एशिया सांस रोककर देख रहा है — क्या तारिक रहमान उम्मीदों पर खरे उतर पाएंगे?
