बिहार में शराबबंदी लागू हुए कई साल हो चुके हैं। सरकार का उद्देश्य साफ था-समाज को नशे की बुराई से मुक्त करना, घरेलू हिंसा और अपराध पर लगाम लगाना। लेकिन आज जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। गलियों, मोहल्लों और गांवों में आज भी लोग खुलेआम शराब के नशे में धुत नजर आते हैं। सवाल उठता है-जब शराबबंदी है, तो ये शराब आ कहां से रही है?
कानून सख्त, लेकिन अमल ढीला
बिहार में शराबबंदी कानून देश के सबसे सख्त कानूनों में गिना जाता है। इसके तहत शराब बनाना, बेचना और पीना-तीनों अपराध हैं। बावजूद इसके, शराब की उपलब्धता कम नहीं हुई। इसका सीधा मतलब है कि कहीं न कहीं कानून के पालन में बड़ी चूक हो रही है।

जिम्मेदार कौन?
इस सवाल का जवाब बिलकुल आसान नहीं है, लेकिन कुछ कड़वी सच्चाइयों से इनकार भी नहीं किया जा सकता—
प्रशासनिक लापरवाही: कई जगहों पर पुलिस और प्रशासन की निष्क्रियता साफ नजर आती है। छापेमारी होती भी है तो सिर्फ दिखावे के लिए।
भ्रष्टाचार का खेल: स्थानीय स्तर पर कुछ अधिकारियों की मिलीभगत से अवैध शराब का धंधा फल-फूल रहा है।
सिस्टम की कमजोरी: सीमावर्ती जिलों से शराब की तस्करी लगातार जारी है, जिस पर प्रभावी रोक नहीं लग पाई है।
समाज पर असर
शराबबंदी का सपना था-एक सुरक्षित और स्वस्थ समाज। लेकिन जब चोरी-छिपे शराब बिकती है, तो उसकी गुणवत्ता भी संदिग्ध होती है। कई बार जहरीली शराब से लोगों की जान तक चली जाती है। गरीब परिवारों पर इसका सबसे ज्यादा असर पड़ता है-कमाई नशे में बर्बाद होती है, घर में कलह बढ़ती है।
- तथ्य जो सोचने पर मजबूर करते हैं
- हर साल हजारों लीटर शराब जब्त
- कई जिलों में जहरीली शराब से मौतें
- जेलों में शराबबंदी के मामलों में कैदियों की संख्या बढ़ी ये आंकड़े बताते हैं कि समस्या खत्म नहीं हुई, बल्कि रूप बदलकर और खतरनाक हो गई है।
सरकार की मंशा पर सवाल नहीं, लेकिन…
यह मानना होगा कि सरकार की मंशा गलत नहीं थी। लेकिन सिर्फ कानून बना देने से बदलाव नहीं आता। जब तक जमीनी स्तर पर ईमानदारी से उसे लागू नहीं किया जाएगा, तब तक हालात ऐसे ही बने रहेंगे।
प्रशासन की खामोशी क्यों?
सबसे बड़ा सवाल यही है—जब सब कुछ सामने हो रहा है, तो प्रशासन खामोश क्यों है?
क्या उन्हें इसकी जानकारी नहीं?
या जानकारी होते हुए भी कार्रवाई नहीं हो रही?
क्या राजनीतिक दबाव भी एक कारण है?
इन सवालों के जवाब आम जनता जानना चाहती है।
समाधान क्या हो?
सख्त और निष्पक्ष कार्रवाई: सिर्फ छोटे लोगों पर नहीं, बल्कि बड़े सप्लायर और नेटवर्क पर भी कार्रवाई हो।
पुलिस की जवाबदेही तय हो: हर क्षेत्र में नियमित जांच और निगरानी हो।
जनजागरूकता: लोगों को नशे के नुकसान के प्रति जागरूक करना जरूरी है।
टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल: तस्करी रोकने के लिए आधुनिक तकनीक और निगरानी सिस्टम को मजबूत किया जाए।
सिर्फ कानून बनाना काफी नहीं, उसे सख्ती से लागू करना जरूरी है:
सीमावर्ती इलाकों पर कड़ी निगरानी
स्थानीय स्तर पर जवाबदेही तय हो
भ्रष्टाचार पर सख्त कार्रवाई
नशा मुक्ति अभियान को मजबूत किया जाए
जनता की भागीदारी बढ़ाई जाए
बिहार में शराबबंदी एक अच्छा कदम था, लेकिन इसकी सफलता केवल कागजों तक सीमित
बिहार में शराबबंदी एक अच्छा कदम था, लेकिन इसकी सफलता केवल कागजों तक सीमित होती जा रही है। जब तक प्रशासन अपनी जिम्मेदारी पूरी ईमानदारी से नहीं निभाएगा और समाज भी जागरूक नहीं होगा, तब तक “शराबबंदी” सिर्फ एक कानून बनकर रह जाएगी, हकीकत नहीं।
अब वक्त है सवाल पूछने का… क्योंकि खामोशी भी कभी-कभी सबसे बड़ा अपराध बन जाती है।
