जमुई/बिहार: सरकार की तमाम योजनाओं और बड़े-बड़े दावों के बावजूद जमुई जिले के किसानों की हालत आज भी चिंताजनक बनी हुई है। खेती अब लाभ का नहीं, बल्कि घाटे का सौदा बनती जा रही है। हालात ऐसे हैं कि किसान दिन-रात मेहनत कर भी अपने परिवार का गुजारा करने के लिए संघर्ष कर रहा है।
तीन गुना बढ़ी लागत, लेकिन आय नहीं बढ़ी उसी अनुपात में
पिछले 10 वर्षों में खेती की लागत में जबरदस्त इजाफा हुआ है। जहां पहले एक हेक्टेयर में खेती लगभग 10 से 11 हजार रुपये में हो जाती थी, वहीं अब यह लागत बढ़कर 30 से 40 हजार रुपये तक पहुंच गई है।
दूसरी ओर, फसलों का समर्थन मूल्य (MSP) इस अनुपात में नहीं बढ़ा। करीब 10 साल पहले जो समर्थन मूल्य 1200-1300 रुपये प्रति क्विंटल था, वह अब बढ़कर लगभग 2500-2600 रुपये तक ही पहुंच पाया है।
यानी साफ है—लागत तीन गुना और आमदनी सिर्फ दोगुनी, जिससे किसान लगातार आर्थिक नुकसान झेल रहा है।
कर्ज के जाल में फंसता किसान
खेती के बढ़ते खर्च को पूरा करने के लिए किसान को मजबूरी में कर्ज लेना पड़ता है। बीज, खाद, कीटनाशक, डीजल और मजदूरी के लिए लिया गया यह कर्ज उसकी कमर तोड़ देता है।
फसल तैयार होने के बाद भी किसान अपनी पूरी उपज को सरकारी दर पर नहीं बेच पाता। मंडी में सीमित मात्रा ही खरीदी जाती है, बाकी बचा अनाज उसे खुले बाजार में औने-पौने दाम पर बेचना पड़ता है।
इस स्थिति में किसान की मेहनत का सही मूल्य उसे कभी नहीं मिल पाता।
आधुनिकीकरण बना वरदान या अभिशाप?
खेती में आधुनिक तकनीकों का उपयोग जरूर बढ़ा है। ट्रैक्टर, कंबाइन हार्वेस्टर और अन्य मशीनों से काम तेज और बड़े स्तर पर होने लगा है।
लेकिन इसके साथ ही खर्च भी तेजी से बढ़ा है।
- मशीनों का किराया
- डीजल की बढ़ती कीमत
- उन्नत बीज और कीटनाशकों की लागत
- कृषि उपकरणों पर 5% से 18% तक GST
- इन सबने खेती को और महंगा बना दिया है।
- उत्पादन बढ़ा जरूर है, लेकिन मुनाफा नहीं।
मजदूरी और सिंचाई: बढ़ता बोझ
गांवों में मजदूरों की कमी के कारण मजदूरी दर लगातार बढ़ रही है। वहीं सिंचाई के लिए डीजल पंप का इस्तेमाल महंगा साबित हो रहा है।
पानी के लिए किसान अब पूरी तरह से ट्यूबवेल पर निर्भर हो गया है, जिससे खर्च बढ़ रहा है। भूमिगत जल स्तर तेजी से गिर रहा है । यह स्थिति आने वाले समय में और भी गंभीर संकट का संकेत दे रही है।
जलवायु परिवर्तन: खेती पर सबसे बड़ा खतरा
मौसम की अनिश्चितता ने किसानों की कमर तोड़ दी है।
- बेमौसम बारिश
- ओलावृष्टि
- सूखा और बाढ़ ये सब अब आम हो चुके हैं।
अप्रैल 2026 तक के आंकड़ों के अनुसार, जिले में गेहूं, सरसों और जीरा जैसी फसलें कटाई के समय बारिश से बर्बाद हो चुकी हैं।
इससे न केवल उत्पादन घटा है, बल्कि अनाज की गुणवत्ता भी खराब हुई है, जिससे बाजार में दाम और गिर गए हैं।
घटती पैदावार का खतरा
विशेषज्ञों के अनुसार, बढ़ते तापमान के कारण
- गेहूं उत्पादन में 40-50% तक कमी
- चावल में 30-40% तक गिरावट का अनुमान है।
बारिश और आंधी के कारण तैयार फसलें खराब हो जाती हैं, दाने काले पड़ जाते हैं या ओलों से गिर जाते हैं—जिससे उनका बाजार मूल्य आधा रह जाता है।

सूखते तालाब और खत्म होती परंपराएं
एक समय था जब खेती तालाबों, कुओं ,नदियों और नहरों पर निर्भर थी। आज ये पारंपरिक जल स्रोत लगभग खत्म हो चुके हैं।
इसके कारण:
नदियों से अंधा धुंध खनन यानी बालू का उठना और पर्यावरण को ताक पर रख के खनन करने से खेतों को पर्याप्त पानी नहीं मिल पाता। ट्यूबवेल पर निर्भरता बढ़ गई है मगर भूजल स्तर लगातार नीचे जा रहा है । यह संकट सिर्फ खेती ही नहीं, बल्कि पूरे ग्रामीण जीवन को प्रभावित कर रहा है।
सरकारी वादे: जमीन पर नहीं, सिर्फ कागजों में
सरकार की ओर से किसानों के लिए कई योजनाओं की घोषणा की जाती है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां करती है।
किसानों का कहना है कि
- योजनाएं सिर्फ कागजों और भाषणों तक सीमित हैं
- लाभ सही समय पर और सही तरीके से नहीं पहुंचता
- समर्थन मूल्य और खरीद प्रणाली में सुधार की जरूरत है
जमुई के किसानों का संघर्ष जारी है
जमुई का किसान आज भी उम्मीद के सहारे जी रहा है। हर मौसम में नई उम्मीद के साथ बीज बोता है, लेकिन हर बार हालात उसे तोड़ देते हैं। अगर जल्द ही
लागत कम करने,सही समर्थन मूल्य देने
सिंचाई और बाजार व्यवस्था सुधारने
के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो खेती का भविष्य और भी संकट में पड़ सकता है।
किसान आज भी वही सवाल पूछ रहा है—क्या उसकी मेहनत का सही मूल्य कभी मिलेगा, या वह यूं ही कर्ज और संघर्ष में जिंदगी गुजारता रहेगा?
