बिहार के जमुई जिले में इस बार मौसम की बेरुखी ने किसानों की कमर तोड़ दी है। बेमौसम बारिश, ओलावृष्टि और तेज पछुआ हवा ने खेतों में खड़ी और कटी फसलों को बर्बाद कर दिया है। खासकर तेलहन और दलहन फसलें—सरसों, तीसी, अरहर और आलू—इस मार से बुरी तरह प्रभावित हुई हैं। किसानों के सामने अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि महीनों की मेहनत के बाद भी क्या उनकी लागत निकल पाएगी?

फूल आने के समय बारिश बनी आफत

रबी फसलों के लिए यह समय बेहद अहम होता है। सरसों और अन्य तिलहन फसलों में फूल आने का दौर चल रहा था, लेकिन अचानक आई बारिश और ओलावृष्टि ने इन फूलों को झाड़ दिया। इससे दाने बनने की प्रक्रिया प्रभावित हो गई है और पैदावार आधी से भी कम होने का खतरा पैदा हो गया है। खेतों में अधिक नमी के कारण फसलें गलने लगी हैं, वहीं कई जगहों पर तेज हवा से पौधे गिरकर बर्बाद हो गए।

ओलावृष्टि और तूफान से खेत हुए बर्बाद

पंचदेवरी प्रखंड के कोईसा खुर्द गांव के किसान डी.के. राय बताते हैं कि उन्होंने 10 एकड़ में अगेती रबी फसल लगाई थी, लेकिन ओलावृष्टि और तूफान ने सब कुछ चौपट कर दिया। सरसों, आलू और अरहर की फसलें फूल के समय ही झड़ गईं। आलू में पाला पड़ने का डर है, जबकि गन्ने की तैयार फसल खेतों में ही गिरकर खराब हो गई है। यह नुकसान सिर्फ फसल का नहीं, बल्कि किसानों के पूरे साल की उम्मीदों का है।

सूखे के बाद अब बारिश की मार

जमुई के किसानों के लिए यह दोहरी मार साबित हो रही है। खरीफ फसल पहले ही सूखे की चपेट में आकर बर्बाद हो चुकी थी, और अब रबी फसल पर बेमौसम बारिश कहर बनकर टूट पड़ी है। किसान लाल सिंह कहते हैं कि

“अब तो हालत ऐसी हो गई है कि लागत पूंजी भी निकलने की उम्मीद नहीं बची है।”

किसान
जमुई के किसान गहरे संकट में

कीट प्रकोप ने बढ़ाई मुश्किलें

मौसम में बदलाव के कारण लाही कीट का प्रकोप भी बढ़ गया है, जो सरसों की फसल को तेजी से नुकसान पहुंचा रहा है। इससे फसल की गुणवत्ता और उत्पादन दोनों पर असर पड़ा है।

किसानों का दर्द: मेहनत पर फिरा पानी गांव-गांव में किसानों का दर्द साफ झलक रहा है—

लालचुन तिवारी कहते हैं,

“कटी हुई सरसों खेत में पड़ी थी, बारिश ने उसे सड़ा दिया। अब लागत निकालना भी मुश्किल है।”

सुधाकर सिंह का कहना है कि

“सरकारी मंडी नहीं होने के कारण हमें औने-पौने दाम पर फसल बेचनी पड़ती है।”

कामदेव सिंह बताते हैं कि

“नीलगाय रात में फसल चट कर जाती हैं, लेकिन रोकने का कोई उपाय नहीं है।”

उपेंद्र पांडेय कहते हैं कि

“मंडी तक फसल ले जाने का खर्च इतना ज्यादा है कि मुनाफा खत्म हो जाता है।”

जवाहर सिंह का दर्द है कि

“मुआवजा मिलता भी है तो बहुत देर से और बहुत कम।”

गोपाल यादव बताते हैं कि

“बारिश के कारण दाने काले पड़ गए हैं, उपज आधी रह गई है।”

सरकारी दावे बनाम जमीनी हकीकत

जिला कृषि पदाधिकारी ब्रजेश कुमार सिंह का कहना है कि किसानों को समय पर बीज उपलब्ध कराए जा रहे हैं और कई योजनाएं भी चलाई जा रही हैं। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि प्राकृतिक आपदाओं के सामने ये योजनाएं कमजोर पड़ती दिख रही हैं।

मौसम बदलाव का खामियाजा किसान भुगत रहे

लगातार बदलते मौसम, वनों की कटाई और पर्यावरण में हो रहे बदलाव का सबसे बड़ा असर खेती पर पड़ रहा है। कभी सूखा तो कभी बेमौसम बारिश—इन सबके बीच किसान ही सबसे ज्यादा पीड़ित है।

उम्मीद और संघर्ष के बीच किसान

जमुई के किसान आज एक ऐसे मोड़ पर खड़े हैं जहां मेहनत है, लेकिन उसका फल अनिश्चित है। खेतों में बर्बाद फसलें सिर्फ नुकसान नहीं, बल्कि टूटती उम्मीदों की कहानी कह रही हैं।
सरकार और प्रशासन के लिए यह समय है कि वे सिर्फ योजनाएं नहीं, बल्कि ज़मीनी स्तर पर ठोस मदद पहुंचाएं—ताकि किसान फिर से खड़ा हो सके और खेती की उम्मीद जिंदा रह सके।

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