My First Period पर आधारित माँ-बेटी के बीच बातचीत के रूप में लिखा गया पूरा, भावनात्मक और समझदारी भरा लेख — ताकि यह कहानी जानकारी भी दे और अपनापन भी महसूस कराए..
“माँ, मुझे डर लग रहा है…”
“माँ…”
उसकी आवाज़ काँप रही थी।
माँ रसोई में थीं। आवाज़ सुनते ही भागकर आईं।
“क्या हुआ बेटा?”
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वह कुछ बोल नहीं पाई। बस चुपचाप खड़ी रही, आँखें झुकी हुईं। हाथ काँप रहे थे।
माँ ने उसका हाथ पकड़ा।
“देखो मुझे। क्या हुआ है?”
धीरे-धीरे, बहुत मुश्किल से उसने कहा—
“माँ… कपड़ों पर… लाल…”
माँ एक पल चुप रहीं। फिर बहुत प्यार से मुस्कुराईं।
“आ गया?”
वह डर के मारे रो पड़ी।
“माँ, मुझे दर्द हो रहा है… और डर भी… क्या अब मैं ठीक नहीं हूँ?”
माँ ने उसे सीने से लगा लिया।
“नहीं बेटा, तुम बिल्कुल ठीक हो। आज कुछ गलत नहीं हुआ। आज कुछ बहुत ख़ास हुआ है।”
“पर माँ… खून… लोग कहते हैं ये गंदा होता है…”
उसकी आवाज़ टूट गई।
माँ ने उसे थोड़ा दूर किया, आँखों में देखा।
“किसने कहा गंदा?”
आवाज़ सख़्त नहीं थी, बस सच से भरी हुई।
“ये वही खून है जिससे एक दिन कोई माँ बनती है। इसमें शर्म नहीं, इसमें ताक़त है।”
वह धीरे से बोली—
“पर माँ, पेट बहुत दर्द कर रहा है…”

माँ ने उसका सिर सहलाया।
“दर्द होगा। क्योंकि तुम्हारा शरीर तुम्हें बड़ा बना रहा है। जैसे पौधा बढ़ते समय मिट्टी को चीरता है।”
वह चुप हो गई। आँसू रुक गए, लेकिन सवाल अब भी थे।
“माँ… क्या अब मैं बच्ची नहीं रही?”
माँ मुस्कुराईं।
“बच्ची भी हो, और अब थोड़ी समझदार भी। बड़ा होना एक दिन में नहीं होता, बेटा। ये धीरे-धीरे होता है।”
माँ ने उसे पैड (pads) दिया, सब कुछ समझाया—
कैसे बदलना है,
कैसे ध्यान रखना है,
कैसे खुद से प्यार करना है।
“अगर किसी दिन दर्द ज़्यादा हो, मन भारी लगे—तो मुझे बताना। चुप मत रहना।”
उसने माँ का हाथ कसकर पकड़ लिया।
“माँ… आप नाराज़ नहीं हो?”
माँ की आँखें भर आईं।
“नाराज़? नहीं बेटा। मुझे तुम पर गर्व है।”
उस रात वह माँ की गोद में सिर रखकर लेटी रही।
पेट में दर्द था, पर दिल में सुकून।
आज उसका शरीर बदला था,
पर उससे भी ज़्यादा…
उसका रिश्ता माँ से और गहरा हो गया था।
वो सिर्फ़ पहली माहवारी नहीं थी—
वो माँ-बेटी के भरोसे की शुरुआत थी।
समाज और सोच पर हमारी सीख
माँ:
याद रखना बेटा —
पीरियड्स कोई गंदी चीज़ नहीं है।
यह हमारी ताकत की पहचान है।
अगर कभी कोई तुम्हें इसके लिए शर्मिंदा करे,
तो समझ लेना —
गलत वो है, तुम नहीं।
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Note :-
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