चलने-बोलने की मुश्किलें भी नहीं रोक सकीं, मानवेंद्र ने पास किया UPSC एग्जाम..
अगर हौसले मजबूत हों, तो हालात रास्ता नहीं रोक पाते। यही साबित कर दिखाया है मानवेंद्र ने, जिन्होंने शारीरिक चुनौतियों के बावजूद देश की सबसे कठिन परीक्षाओं में गिनी जाने वाली UPSC सिविल सेवा परीक्षा पास कर इतिहास रच दिया।
New delhi। संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) की सिविल सेवा परीक्षा को देश की सबसे कठिन परीक्षाओं में माना जाता है। हर साल लाखों अभ्यर्थी इस परीक्षा में बैठते हैं, लेकिन सफलता कुछ ही को मिलती है। ऐसे में मानवेंद्र की सफलता सिर्फ एक परीक्षा पास करने की कहानी नहीं है, बल्कि जज्बे, मेहनत और आत्मविश्वास की मिसाल है।
संघ लोक सेवा आयोग यानी UPSC परीक्षाओं में सफलता पाने के लिए सिर्फ किताबों का ज्ञान ही नहीं, बल्कि धैर्य, लगातार मेहनत और खुद पर भरोसा भी जरूरी होता है. उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर के रहने वाले मानवेंद्र की कहानी इसी सच्चाई को साबित करती है. शारीरिक चुनौतियों, पारिवारिक दुखों और कठिन हालातों के बावजूद मानवेंद्र ने न सिर्फ अपनी पढ़ाई में बेहतरीन प्रदर्शन किया, बल्कि भारतीय इंजीनियरिंग सेवा यानी IES में सफलता हासिल कर एक मिसाल कायम की है.
बचपन से ही चुनौतियों से भरा सफर
मानवेंद्र की जिंदगी की शुरुआत आसान नहीं रही. बचपन से ही उन्हें चलने-फिरने और बोलने में परेशानी थी. उनकी मां रेनु सिंह बताती हैं कि शुरुआती दिनों में डॉक्टरों ने भी साफ कह दिया था कि मानवेंद्र को शारीरिक रूप से कई समस्याएं हैं. यह सुनकर किसी भी परिवार का हौसला टूट सकता था, लेकिन मानवेंद्र के घर में ऐसा नहीं हुआ.
परिवार ने उनकी कमजोरियों पर ध्यान देने के बजाय उनकी ताकत को पहचानने का फैसला किया. मां रेनु के अनुसार, मानवेंद्र शुरू से ही चीजों को गहराई से समझते थे. उनकी सोच उम्र से कहीं ज्यादा परिपक्व थी. ऐसे में परिवार ने तय किया कि शारीरिक सीमाओं को आड़े नहीं आने दिया जाएगा और उनकी पढ़ाई व मानसिक विकास पर पूरा ध्यान दिया जाएगा.
कई बार लोगों की नकारात्मक सोच और सीमित संसाधनों ने रास्ता मुश्किल बना दिया, लेकिन मानवेंद्र ने कभी हार नहीं मानी।
उनका मानना था कि शारीरिक सीमाएं किसी के सपनों की सीमा तय नहीं कर सकतीं। इसी सोच के साथ उन्होंने पढ़ाई जारी रखी और UPSC जैसी बड़ी परीक्षा का लक्ष्य तय किया।
पढ़ाई में दिखने लगी प्रतिभा
सही मार्गदर्शन, नियमित अभ्यास और परिवार के सहयोग से मानवेंद्र की प्रतिभा धीरे-धीरे निखरने लगी. स्कूल के दिनों में ही यह साफ हो गया था कि वह पढ़ाई में काफी तेज हैं. 10वीं तक आते-आते उनके शिक्षक भी मानने लगे थे कि मानवेंद्र कुछ अलग कर सकते हैं.
12वीं की पढ़ाई के साथ-साथ मानवेंद्र ने जेईई (JEE) एडवांस की तैयारी शुरू की. यह दौर उनके लिए काफी चुनौती भरा था, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी. कड़ी मेहनत का नतीजा यह रहा कि उन्होंने जेईई (JEE) एडवांस में 63वीं रैंक हासिल की. यह उपलब्धि अपने आप में बड़ी थी और पूरे इलाके में उनकी चर्चा होने लगी.
इसके बाद मानवेंद्र का चयन IIT Patna में हुआ, जहां से उन्होंने बीटेक (B. tech) की पढ़ाई पूरी की. आईआईटी जैसे संस्थान में पढ़ाई करना आसान नहीं होता, लेकिन मानवेंद्र ने यहां भी खुद को साबित किया.

पिता का निधन और मां का सहारा
मानवेंद्र की जिंदगी में एक बड़ा दुख उस समय आया, जब उनके पिता का अचानक निधन हो गया. इस घटना ने पूरे परिवार को झकझोर कर रख दिया. पिता के जाने से घर की जिम्मेदारियां और बढ़ गईं, लेकिन मां रेनु सिंह ने हिम्मत नहीं हारी. रेनु सिंह खुद एक स्कूल की प्रिंसिपल हैं और शिक्षा की ताकत को अच्छी तरह समझती हैं. उन्होंने बेटे को कमजोर पड़ने नहीं दिया और हर कदम पर उसका साथ दिया. मां का यही भरोसा मानवेंद्र के लिए सबसे बड़ी ताकत बन गया.
नानी के घर रहकर की IES की तैयारी
आईआईटी (IIT) से पढ़ाई पूरी करने के बाद मानवेंद्र ने भारतीय इंजीनियरिंग सेवा परीक्षा की तैयारी शुरू की. इसके लिए उन्होंने नानी के घर पर रहना चुना, जहां उन्हें शांत माहौल और पढ़ाई के लिए पूरा समय मिल सका. मां का भरोसा, परिवार का साथ और खुद पर विश्वास—यही उनकी तैयारी की नींव बनी.
पढ़ाई में अनुशासन और आत्मविश्वास
मानवेंद्र की तैयारी आसान नहीं थी। बोलने में कठिनाई होने के कारण कोचिंग और इंटरव्यू की तैयारी चुनौतीपूर्ण थी, वहीं चलने में परेशानी के चलते लंबे समय तक पढ़ाई करना भी कठिन हो जाता था। इसके बावजूद उन्होंने अपनी रणनीति खुद बनाई—
- नियमित अध्ययन का सख्त टाइमटेबल
- सीमित लेकिन भरोसेमंद किताबों से पढ़ाई
- मॉक टेस्ट और आत्ममूल्यांकन
- मानसिक मजबूती पर विशेष ध्यान
परिवार का सहयोग और शिक्षकों का मार्गदर्शन इस सफर में उनके लिए संबल बना।
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UPSC में सफलता: संघर्ष की जीत
कई असफल प्रयासों और कठिन दिनों के बाद आखिरकार मेहनत लाई रंग
लंबे संघर्ष और कड़ी मेहनत के बाद वह दिन भी आया, जब UPSC परीक्षा का परिणाम घोषित हुआ और मानवेंद्र ने UPSC सिविल सेवा परीक्षा पास कर ली। मानवेंद्र ने इसमें 112वीं रैंक हासिल की. यह पल उनके और उनके परिवार के लिए गर्व का क्षण था. आज मानवेंद्र एक IES अधिकारी हैं और देश की सेवा कर रहे हैं.उनकी सफलता ने न सिर्फ उनके परिवार, बल्कि उन हजारों युवाओं को प्रेरित किया है, जो किसी न किसी चुनौती के कारण अपने सपनों से पीछे हट जाते हैं।
मानवेंद्र कहते हैं,
“मुश्किलें हर किसी की जिंदगी में होती हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि हम उनसे डरते हैं या उन्हें पार करने की कोशिश करते हैं।”
समाज के लिए संदेश
मानवेंद्र की कहानी यह संदेश देती है कि दिव्यांगता कमजोरी नहीं होती। सही अवसर, समर्थन और सकारात्मक सोच के साथ कोई भी व्यक्ति अपने लक्ष्य तक पहुंच सकता है। उनकी सफलता सिस्टम और समाज—दोनों के लिए यह सोचने का मौका है कि कैसे हर प्रतिभा को बराबर अवसर दिए जाएं।
प्रेरणा बनता एक नाम
आज मानवेंद्र सिर्फ एक सफल अभ्यर्थी नहीं, बल्कि संघर्ष से जीत तक का प्रतीक बन चुके हैं। उनकी कहानी आने वाली पीढ़ियों को यह सिखाती है कि हालात चाहे जैसे भी हों, अगर इरादे मजबूत हों तो कोई भी सपना अधूरा नहीं रहता।
“मानवेंद्र की यह उपलब्धि बताती है कि असली ताकत शरीर में नहीं, बल्कि हौसले और विश्वास में होती है।”
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Note :-
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By: KP
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