देश की राजनीति में जब भी विपक्ष आक्रामक तेवर दिखाता है, सियासी तापमान बढ़ना तय माना जाता है। इन दिनों यही हालात देखने को मिल रहे हैं। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के लगातार हमलों से सत्तारूढ़ दल भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) असहज नजर आ रही है। सवाल उठ रहा है कि आखिर राहुल के वार से भाजपा क्यों बौखलाई हुई दिखती है?

नेता प्रतिपक्ष का संसद से सड़क तक तेज हुए हमले

हाल के महीनों में राहुल गांधी ने बेरोजगारी, महंगाई, किसान संकट, अग्निपथ योजना, और बड़े उद्योगपतियों को लेकर सरकार पर सीधे-सीधे सवाल उठाए हैं। उन्होंने बार-बार आरोप लगाया है कि देश में आर्थिक असमानता बढ़ रही है और युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ हो रहा है।
राहुल के भाषणों का अंदाज पहले से ज्यादा आक्रामक और आत्मविश्वास भरा दिख रहा है। संसद में उनके सवालों ने कई बार सत्ता पक्ष को असहज किया है। यही वजह है कि भाजपा के कई वरिष्ठ नेता उनके बयानों का तुरंत और तीखा जवाब देते नजर आते हैं।

भाजपा की रणनीति: पलटवार या बचाव?

भाजपा की ओर से यह कहा जा रहा है कि राहुल गांधी देश की छवि खराब कर रहे हैं और तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश कर रहे हैं। पार्टी नेताओं का दावा है कि मोदी सरकार के कार्यकाल में देश ने इंफ्रास्ट्रक्चर, डिजिटल क्रांति और वैश्विक मंच पर मजबूत स्थिति हासिल की है। लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा की तीखी प्रतिक्रियाएं इस बात का संकेत हैं कि राहुल अब सिर्फ नाममात्र के विपक्षी नेता नहीं रहे, बल्कि वे लगातार सरकार को घेरने की रणनीति पर काम कर रहे हैं।

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फाइल फोटो:पीएम नरेंद्र मोदी

भावनात्मक जुड़ाव की कोशिश

राहुल गांधी की राजनीति में अब सिर्फ आरोप-प्रत्यारोप नहीं, बल्कि भावनात्मक अपील भी दिखने लगी है। भारत जोड़ो यात्रा के दौरान उन्होंने सीधे जनता से संवाद साधा, बेरोजगार युवाओं, किसानों और छोटे व्यापारियों की परेशानियां सुनीं। इससे उनके प्रति एक वर्ग में सहानुभूति और समर्थन बढ़ा है।
भाजपा के लिए यह चुनौती इसलिए भी बड़ी है क्योंकि वह लंबे समय से कांग्रेस को कमजोर विपक्ष के रूप में पेश करती रही है। लेकिन अगर विपक्ष का नेता लगातार मुद्दों पर मुखर रहे और जनता के बीच सक्रिय दिखे, तो सत्तारूढ़ दल के लिए जवाब देना जरूरी हो जाता है।

सियासी लड़ाई या लोकतंत्र की मजबूती?

लोकतंत्र में सशक्त विपक्ष सरकार के लिए आईना होता है। राहुल गांधी के हमलों को भाजपा जहां राजनीतिक साजिश बताती है, वहीं कांग्रेस इसे जनहित की आवाज कहती है। सच्चाई यह है कि जब सवाल तीखे होते हैं, तो जवाब भी उतने ही कड़े होते हैं। आज देश का आम नागरिक रोजगार, महंगाई और भविष्य की सुरक्षा को लेकर चिंतित है। अगर विपक्ष इन मुद्दों को जोर-शोर से उठाता है, तो सत्ता पक्ष की जिम्मेदारी बनती है कि वह ठोस जवाब दे। राजनीति में वार और पलटवार चलते रहेंगे, लेकिन असली मुद्दा यह है कि इन बहसों से देश को क्या मिलता है। अगर यह टकराव जनता के सवालों को केंद्र में लाता है, तो यह लोकतंत्र की सेहत के लिए अच्छा संकेत है। लेकिन अगर यह सिर्फ आरोप-प्रत्यारोप तक सिमट जाए, तो नुकसान आम जनता का ही होगा।
फिलहाल इतना तय है कि राहुल के तेवर बदले हैं, और भाजपा की बेचैनी भी साफ झलक रही है। आने वाले चुनावी मौसम में यह टकराव और तेज होने के आसार हैं।

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