देश की राजनीति में एक बार फिर बड़ा मुद्दा गर्माने जा रहा है। लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं की सीटों में बढ़ोतरी के लिए प्रस्तावित परिसीमन को लेकर केंद्र सरकार और विपक्ष आमने-सामने खड़े नजर आ रहे हैं। गुरुवार से शुरू हो रहे संसद के विस्तारित सत्र में इस पर निर्णायक बहस और मतदान होना तय है। जहां सरकार इसे “समय की जरूरत” बता रही है, वहीं विपक्ष इसके संभावित राजनीतिक असर को लेकर सतर्क और विरोध में है।
क्या है पूरा मामला?
केंद्र सरकार संसद में संविधान (131वां) संशोधन विधेयक-2026 पेश करने जा रही है। इस विधेयक के जरिए लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं की सीटों की संख्या बढ़ाने का रास्ता साफ किया जाएगा। इसी के साथ परिसीमन विधेयक-2026 और संघ शासित क्षेत्र कानून (संशोधन) विधेयक-2026 भी पेश किए जाएंगे।
सरकार का दावा है कि यह कदम देश की बढ़ती आबादी और बदलते
जनसांख्यिकीय संतुलन को ध्यान में रखते हुए उठाया जा रहा है।
महिला आरक्षण भी इसी प्रस्ताव का हिस्सा
इस पूरे विधायी पैकेज में महिला आरक्षण को भी जोड़ा गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पहले ही महिला आरक्षण को एक बड़ा राजनीतिक और सामाजिक मुद्दा बना चुके हैं। ऐसे में विपक्ष के लिए इस प्रस्ताव का सीधा विरोध करना आसान नहीं है, क्योंकि इससे महिला सशक्तिकरण के खिलाफ संदेश जा सकता है। यही वजह है कि विपक्ष परिसीमन के मुद्दे पर जोरदार विरोध कर रहा है, लेकिन महिला आरक्षण पर सीधी आपत्ति से बचता नजर आ रहा है।

सरकार का पक्ष: क्यों जरूरी है परिसीमन?
सरकार का कहना है कि देश में आखिरी बार 1976 में लोकसभा सीटों का पुनर्निर्धारण हुआ था। तब से जनसंख्या में भारी बदलाव आ चुका है, लेकिन प्रतिनिधित्व का ढांचा लगभग वैसा ही बना हुआ है।
सरकार के मुख्य तर्क:
- 1976 के बाद से सीटों में कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ
- जनसंख्या के अनुसार प्रतिनिधित्व असंतुलित हो गया है
- लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए नया परिसीमन जरूरी है
- हर राज्य में सीटों की संख्या लगभग 50% तक बढ़ाई जाएगी
- लोकसभा सीटों की अधिकतम सीमा 850 तय की गई है
सरकार ने यह भी साफ किया है कि किसी भी राज्य की सीटों में कटौती नहीं की जाएगी।
दक्षिणी राज्यों की चिंता क्या है?
दक्षिण भारत के कई राज्यों को इस प्रस्ताव को लेकर गंभीर आशंका है। उनका कहना है कि उन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है, लेकिन नए परिसीमन में उन्हें नुकसान हो सकता है।
उनकी मुख्य चिंताएं:
- जनसंख्या के आधार पर सीटें तय होने से उनकी हिस्सेदारी कम हो सकती है
- उत्तर भारत के अधिक आबादी वाले राज्यों को ज्यादा फायदा मिल सकता है
हालांकि, केंद्र सरकार ने इन सभी आशंकाओं को खारिज करते हुए कहा है कि हर राज्य के साथ समान व्यवहार होगा और किसी के साथ अन्याय नहीं होगा।
कैसे होगा परिसीमन?
सरकार ने प्रक्रिया को लेकर भी स्पष्ट रोडमैप दिया है:
- परिसीमन 2011 की जनगणना के आधार पर किया जाएगा
- हर राज्य के लिए अलग-अलग परिसीमन आयोग गठित होगा
- आयोग सभी राजनीतिक दलों और हितधारकों से चर्चा करेगा
इसके बाद अंतिम रूप से सीटों का निर्धारण किया जाएगा
संसद के विस्तारित सत्र का पूरा शेड्यूल
इस अहम मुद्दे पर संसद में तीन दिनों तक गहन चर्चा और प्रक्रिया चलेगी:
- 16 अप्रैल: लोकसभा में तीनों विधेयकों पर चर्चा (18 घंटे निर्धारित)
- 17 अप्रैल: लोकसभा में मतदान और पारित करने की प्रक्रिया
- 18 अप्रैल: राज्यसभा में पेश, 10 घंटे चर्चा के बाद मतदान
विपक्ष का रुख: समर्थन भी, विरोध भी
कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्षी दल इस प्रस्ताव को लेकर दोहरी रणनीति अपनाए हुए हैं।
- महिला आरक्षण का खुला विरोध नहीं
- लेकिन परिसीमन के संभावित राजनीतिक असर को लेकर कड़ा विरोध
विपक्ष का मानना है कि यह कदम सत्ता संतुलन को बदल सकता है और कुछ राज्यों के राजनीतिक प्रभाव को बढ़ा या घटा सकता है।
आगे क्या होगा?
अगर यह विधेयक संसद से पास हो जाता है, तो देश की राजनीतिक तस्वीर में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। लोकसभा की सीटों में वृद्धि, राज्यों की विधानसभा का पुनर्गठन और महिला आरक्षण का लागू होना—ये सभी बदलाव भारतीय लोकतंत्र के नए अध्याय की शुरुआत कर सकते हैं।
लेकिन फिलहाल नजरें संसद के इस सत्र पर टिकी हैं, जहां यह तय होगा कि यह ऐतिहासिक प्रस्ताव सहमति से आगे बढ़ेगा या फिर सियासी टकराव के बीच उलझ कर रह जाएगा।
