शायद ज़िंदगी का वो था ही नहीं..
सिर्फ़ पंखा जानता है, बोझ जिस्म का
शायद ज़िंदगी का वो था ही नहीं..
सिर्फ़ पंखा जानता है, बोझ जिस्म का था ही नहीं,
वो जो लटक गया था, शायद ज़िंदगी का था ही नहीं।
सबने हँसते चेहरे को समझा जीता-जागता,
क्या ख़बर कि अंदर कोई ज़िंदा था ही नहीं।
हर शाम वो तन्हा कमरे से बातें करता था,
और लोग समझते थे, उसे किसी बात का ग़म था ही नहीं।
दिल पे जो गुज़री, लफ़्ज़ों ने बयां कर ही न पाए,
आँखों ने जो कहा, वो आवाज़ में था ही नहीं।
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जिस्म से रूह को तलाशता रहा उम्र भर,
शायद वो ख़ुदा था ही नहीं।

वो रोज़ आईने में अपना चेहरा देखता रहा,
चेहरा तो वही था, मगर उसमें वो ख़ुद था ही नहीं।
कितनी बार उसने पुकारा किसी अपने को रात में,
दरवाज़ा खुला रहा, मगर कोई अपना था ही नहीं।
तकिए ने सुनीं उसकी सारी ख़ामोश सिसकियाँ,
कमरे में उसके दर्द के सिवा कोई गवाह था ही नहीं।
जिसे अपना समझकर उसने उम्र सौंप दी,
उसके दिल में शायद उसके लिए कोई जगह था ही नहीं।
वो टूटता रहा रिश्तों को बचाने की ख़ातिर,
और किसी को उसके टूटने का अंदाज़ा था ही नहीं।
कुछ लोग छोड़ जाते हैं इस कदर ये जहां..
उनके जाने ग़म जिंदगी भर रहा जाता है।
सुझाव:- अगर यह कविता किसी वास्तविक व्यक्ति की स्थिति से जुड़ी है और “लटक गया था” आत्महत्या की ओर इशारा करता है, तो कृपया उस व्यक्ति को अकेला न छोड़ें और तुरंत किसी भरोसेमंद व्यक्ति या स्थानीय आपातकालीन सेवा से संपर्क करें।
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Note :-
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