बिहार की राजनीति में बदलते संकेत: बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव का परिणाम सिर्फ एक सीट का फैसला नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे बिहार की बदलती राजनीतिक तस्वीर का संकेत भी माना जा रहा है। इस नतीजे के बाद सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की हो रही है कि क्या राष्ट्रीय जनता दल (राजद) को अब अपनी राजनीतिक रणनीति और संगठन दोनों पर गंभीरता से पुनर्विचार करने की जरूरत है।

राजद (RJD) के कई नेताओं का कहना है कि प्रशांत किशोर को भाजपा (BJP) का अप्रत्यक्ष समर्थन मिला या मुकाबला उनके पक्ष में आसान हो गया। लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनावी हार या जीत का सबसे बड़ा कारण मैदान में दिखाई देने वाली सक्रियता होती है।

सिर्फ बयानबाजी से नहीं, मैदान में उतरने से बनती है राजनीति

किसी भी राजनीतिक दल की असली ताकत चुनाव के समय नहीं, बल्कि चुनावों के बीच जनता के बीच लगातार मौजूद रहने से बनती है।

बांकीपुर उपचुनाव के दौरान यह सवाल उठा कि क्या राजद ने पूरी ताकत से चुनाव लड़ा? पार्टी के कई बड़े चेहरे चुनाव प्रचार में अपेक्षित सक्रियता नहीं दिखा सके। यदि कोई दल किसी चुनाव को पूरी गंभीरता से नहीं लड़ता, तो उसका संदेश भी जनता तक कमजोर ही पहुंचता है।

नीट आंदोलन के दौरान भी विपक्ष की सक्रियता पर सवाल

हाल के महीनों में नीट परीक्षा से जुड़े मुद्दों पर देशभर में छात्रों का आंदोलन चर्चा में रहा। बिहार भी इससे अछूता नहीं था।

ऐसे समय में विपक्षी दलों से उम्मीद रहती है कि वे छात्रों और युवाओं के बीच मजबूती से खड़े दिखाई दें। लेकिन कई जगहों पर राजद की सक्रियता अपेक्षा से कम या यूं बोले न के बराबर ही दिखाई दी। इससे युवाओं के बीच पार्टी की राजनीतिक मौजूदगी को लेकर भी सवाल उठे।

जिला, प्रखंड और पंचायत स्तर पर संगठन मजबूत करना होगा

किसी भी दल की मजबूती सिर्फ विधानसभा या लोकसभा के नेताओं से नहीं होती।

राजनीतिक जानकार मानते हैं कि यदि किसी पार्टी को लंबे समय तक मजबूत रहना है तो उसे :

  • हर जिले में सक्रिय संगठन बनाना होगा।
  • प्रखंड स्तर पर लगातार कार्यक्रम चलाने होंगे।
  • पंचायत स्तर तक कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारी देनी होगी।
  • युवाओं और नए मतदाताओं को जोड़ना होगा।
  • स्थानीय मुद्दों पर नियमित संघर्ष करना होगा।
  • यही मॉडल लंबे समय तक राजनीतिक दलों को मजबूत बनाता है।

सिर्फ एयरकंडिशन रूम में बैठ कर और चमचो की बातों से दूर और जमीनी हक़ीकत से रुबरु होना पड़ेगा वो भी जमीन पर उतरकर।

प्रशांत किशोर की रणनीति से क्या सीख मिलती है?

प्रशांत किशोर की राजनीति को लेकर अलग-अलग राय हो सकती है। उनके समर्थक और विरोधी दोनों हैं।

लेकिन एक बात पर अधिकांश राजनीतिक विश्लेषक सहमत नजर आते हैं कि चुनाव हारने के बाद भी उन्होंने बिहार में लगातार जनसंपर्क अभियान जारी रखा, विभिन्न जिलों का दौरा किया और स्थानीय मुद्दों को उठाने की कोशिश की।

लगातार मैदान में बने रहने से किसी भी नेता की राजनीतिक पहचान मजबूत होती है।

क्या राजद को बहुजन समाज पार्टी जैसी स्थिति से बचना होगा?

उत्तर प्रदेश में कभी बहुजन समाज पार्टी का मजबूत जनाधार था। लेकिन समय के साथ संगठनात्मक कमजोरी और सीमित राजनीतिक सक्रियता के कारण उसका प्रभाव काफी घट गया।

बिहार में भी कुछ राजनीतिक विश्लेषक यह सवाल उठा रहे हैं कि यदि राजद ने संगठन को मजबूत करने, युवाओं से जुड़ने और लगातार जनसंघर्ष करने की दिशा में तेजी नहीं दिखाई, तो भविष्य में उसे भी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।

हालांकि बिहार और उत्तर प्रदेश की राजनीतिक परिस्थितियां अलग हैं, इसलिए दोनों की सीधी तुलना करना उचित नहीं होगा। फिर भी संगठन की मजबूती हर दल के लिए सबसे महत्वपूर्ण होती है।

चुनाव सिर्फ सोशल मीडिया से ही नहीं जीते जाते

आज सोशल मीडिया राजनीति का महत्वपूर्ण माध्यम बन चुका है। लेकिन चुनाव जीतने के लिए सिर्फ ऑनलाइन प्रचार काफी नहीं होता।

जनता के बीच जाना, गांव-गांव बैठक करना, कार्यकर्ताओं को सक्रिय रखना और स्थानीय समस्याओं पर संघर्ष करना आज भी राजनीति की सबसे बड़ी ताकत मानी जाती है।

राजनीति में जरूर है कि पार्टी को संगठन, जनसंपर्क और जमीनी सक्रियता

बांकीपुर यह उपचुनाव का परिणाम बिहार की राजनीति में कई नए सवाल छोड़ गया है। यह कहना अभी बहुत जल्दबाजी होगी कि राजद की राजनीति खतरे में है, लेकिन इतना जरूर है कि पार्टी को संगठन, जनसंपर्क और जमीनी सक्रियता पर पहले से ज्यादा ध्यान देना होगा।

यदि कोई भी राजनीतिक दल लगातार जनता के बीच नहीं रहेगा और केवल चुनाव के समय सक्रिय होगा, तो बदलते राजनीतिक माहौल में उसके सामने नई चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं।

Written & Edit by : Chandan Patelबिहार

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