देश की सर्वोच्च अदालत / सुप्रीम कोर्ट एक बार फिर जनहित याचिकाओं (PIL) के दुरुपयोग को लेकर चिंतित नजर आई। मंगलवार को सुनवाई के दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने साफ शब्दों में कहा कि आजकल कई लोगों का मकसद सिर्फ याचिका दाखिल करना रह गया है। उन्होंने टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसा लगता है जैसे लोग सुबह अखबार पढ़ते हैं और शाम तक उसी खबर पर पीआईएल दाखिल कर देते हैं।अदालत ने माना कि पीआईएल की संख्या में तेजी से इजाफा हो रहा है और यह एक गंभीर चिंता का विषय है।
“जनहित” या “व्यक्तिगत हित”? कोर्ट ने उठाए सवाल
सुप्रीम कोर्ट पहले भी इस मुद्दे पर सख्त रुख अपना चुका है। साल 2022 में अदालत ने कहा था कि कई याचिकाओं का जनता की भलाई से कोई लेना-देना नहीं होता।
कोर्ट के अनुसार:
- कुछ याचिकाएं केवल प्रचार (पब्लिसिटी) के लिए दायर की जाती हैं
- कुछ निजी फायदे के लिए होती हैं
- इनसे अदालत का कीमती समय बर्बाद होता है
अदालत ने साफ कहा था कि ऐसी फालतू याचिकाओं को शुरुआती स्तर पर ही खारिज कर देना चाहिए, ताकि बड़े जनहित और विकास कार्यों में अनावश्यक बाधा न आए।
एआई से तैयार याचिकाओं पर जताई नाराजगी
मामले की सुनवाई कर रही बेंच में सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस जॉयमाल्या बागची शामिल थे। बेंच ने वकीलों द्वारा याचिका तैयार करने के तरीके पर भी सवाल उठाए। खासतौर पर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के इस्तेमाल पर नाराजगी जाहिर की गई।
जजों ने कहा कि एआई से तैयार याचिकाओं में ऐसे फैसलों का हवाला दिया जा रहा है जो कभी अस्तित्व में ही नहीं थे। यह न केवल गैर-जिम्मेदाराना है, बल्कि न्याय प्रक्रिया के साथ खिलवाड़ भी है।

‘मर्सी बनाम मैनकाइंड’ जैसे फर्जी फैसलों का हवाला
अदालत ने उदाहरण देते हुए बताया कि हाल ही में “मर्सी बनाम मैनकाइंड” नाम के एक फैसले का हवाला दिया गया, जबकि ऐसा कोई केस कभी हुआ ही नहीं। जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने कहा कि कई बार असली फैसलों के साथ फर्जी तथ्यों को जोड़ दिया जाता है। इससे यह समझना मुश्किल हो जाता है कि असलियत क्या है और गलती क्या।
जजों पर बढ़ रहा अनावश्यक बोझ
यह टिप्पणी शिक्षाविद रूप रेखा वर्मा की याचिका की सुनवाई के दौरान आई, जिसमें नेताओं के भाषणों को लेकर नियम बनाने की मांग की गई थी। जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने यह भी बताया कि जस्टिस दीपांकर दत्ता की अदालत में भी ऐसे कई फर्जी फैसलों का हवाला दिया जा चुका है। जजों का कहना है कि इस तरह की लापरवाही से अदालत का समय बर्बाद होता है और जजों पर काम का बोझ बेवजह बढ़ जाता है, क्योंकि हर तथ्य की बारीकी से जांच करनी पड़ती है।
जनहित याचिका: लोकतंत्र का हथियार या प्रचार का माध्यम?
पीआईएल को कभी लोकतंत्र का सशक्त औजार माना गया था। इसके जरिए आम नागरिक भी बड़े सामाजिक मुद्दों को अदालत तक पहुंचा सकता है। लेकिन जब यही व्यवस्था प्रचार या निजी लाभ का माध्यम बन जाए, तो सवाल उठना लाजमी है। सुप्रीम कोर्ट की ताजा टिप्पणियां साफ संकेत देती हैं कि अब अदालत पीआईएल के नाम पर हो रहे दुरुपयोग को बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है।
न्यायपालिका का संदेश स्पष्ट है—जनहित की आड़ में निजी एजेंडा नहीं चलेगा।
