भारत-अमेरिका ट्रेड डील के मुद्दे पर सियासत तेज हो गई है। कांग्रेस ने 24 फरवरी से देशव्यापी किसान आंदोलन शुरू करने का ऐलान किया है। इस अभियान की पहली बड़ी किसान महाचौपाल मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में आयोजित की जाएगी। इस महाचौपाल में लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे शामिल होंगे। कांग्रेस की रणनीति साफ है—किसान मुद्दे को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में लाया जाए और भाजपा के मजबूत गढ़ माने जाने वाले मध्य प्रदेश से राजनीतिक संदेश दिया जाए।
मध्य प्रदेश से ही क्यों शुरू हो रहा अभियान?
मध्य प्रदेश को लंबे समय से भाजपा का मजबूत किला माना जाता है। ऐसे में कांग्रेस यहां से आंदोलन की शुरुआत कर यह दिखाना चाहती है कि वह मुकाबले से पीछे नहीं है।
राज्य में करीब 80 लाख किसान परिवार हैं, जिनमें से लगभग 70 प्रतिशत सीमांत किसान हैं—यानी जिनके पास 1 हेक्टेयर से कम जमीन है। कांग्रेस का दावा है कि संभावित ट्रेड डील का सबसे ज्यादा असर इन्हीं छोटे और सीमांत किसानों पर पड़ेगा। दिलचस्प बात यह भी है कि मध्य प्रदेश सरकार ने वर्ष 2026 को “किसान कल्याण वर्ष” घोषित किया है। ऐसे में किसान मुद्दे पर राजनीतिक बहस और तेज होने की संभावना है।
भाजपा के गढ़ में चुनौती देने की तैयारी
साल 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने किसानों की कर्जमाफी को बड़ा मुद्दा बनाया था और 114 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनी थी। भाजपा को 109 सीटें मिली थीं। कांग्रेस ने बसपा और निर्दलीय विधायकों के समर्थन से सरकार बनाई, लेकिन यह सरकार 18 महीने ही चल सकी।
हालांकि 2023 के चुनाव में कांग्रेस को 66 सीटों पर सिमटना पड़ा। अब पार्टी फिर से किसान मुद्दे को केंद्र में लाकर अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की कोशिश में है।
संगठन को मजबूती देने की कवायद
मध्य प्रदेश में कांग्रेस लंबे समय से सत्ता से बाहर है, लेकिन जमीनी स्तर पर संगठन सक्रिय बताया जाता है। पार्टी नेतृत्व का मानना है कि शीर्ष नेताओं की मौजूदगी कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाएगी। प्रदेश में गुटबाजी भी कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती रही है। वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी से संगठन को एकजुट करने और 2028 के विधानसभा चुनाव की तैयारी को धार देने की कोशिश मानी जा रही है।
केंद्रीय कृषि मंत्री का गृह राज्य होने से बढ़ी राजनीतिक अहमियत
मध्य प्रदेश, केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान का गृह राज्य भी है। इसलिए यहां से उठने वाला कोई भी राजनीतिक संदेश राष्ट्रीय स्तर पर असर डाल सकता है। कांग्रेस की रणनीति यह भी बताई जा रही है कि भोपाल से शुरू हुआ अभियान महाराष्ट्र, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों तक आसानी से फैल सकता है।
क्या है भारत-अमेरिका ट्रेड डील?
भारत और अमेरिका के बीच एक संभावित व्यापार समझौते को लेकर बातचीत चल रही है। इसमें कृषि और डेयरी उत्पादों पर आयात शुल्क में कटौती, अमेरिकी कृषि उत्पादों को भारतीय बाजार में ज्यादा पहुंच और भारत के आईटी, फार्मा और टेक्सटाइल निर्यात को अमेरिका में राहत जैसे मुद्दे शामिल बताए जा रहे हैं। हालांकि अभी तक कोई अंतिम समझौता लागू नहीं हुआ है, लेकिन संभावित शर्तों को लेकर राजनीतिक बहस तेज है। कांग्रेस का आरोप है कि यदि अमेरिका से सस्ता गेहूं, मक्का, सोयाबीन और डेयरी उत्पाद भारत में शून्य या कम टैक्स पर आने लगते हैं, तो भारतीय किसानों को अपनी फसल कम दाम में बेचनी पड़ सकती है। इससे एमएसपी और सब्सिडी व्यवस्था पर भी असर पड़ सकता है।
कांग्रेस का आरोप: “आत्मघाती कदम”
कांग्रेस नेता सज्जन सिंह वर्मा ने इस ट्रेड डील को किसानों के लिए “आत्मघाती कदम” बताया है। उनका कहना है कि यदि अमेरिकी कृषि उत्पादों पर शून्य टैक्स लागू हुआ तो भारतीय किसानों की प्रतिस्पर्धा क्षमता कमजोर हो जाएगी और उनकी आय पर सीधा असर पड़ेगा।
भाजपा का पलटवार: राहुल पर व्यक्तिगत हमला
मध्य प्रदेश के स्कूल शिक्षा मंत्री राव उदय प्रताप सिंह ने कांग्रेस के आंदोलन पर तंज कसते हुए कहा कि राहुल गांधी भोपाल आकर “पर्यटन” करेंगे और फिर विदेश चले जाएंगे। उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें “चने और धने के पौधे में अंतर नहीं पता।” इस बयान के बाद सियासत और गरमा गई है। कांग्रेस इसे किसानों के मुद्दे से ध्यान भटकाने की कोशिश बता रही है।
राष्ट्रीय बहस की ओर बढ़ता किसान मुद्दा
कांग्रेस की कोशिश है कि भोपाल की किसान महाचौपाल के जरिए ट्रेड डील को राष्ट्रीय मुद्दा बनाया जाए। वहीं भाजपा इसे राजनीतिक स्टंट बता रही है। अब देखना यह होगा कि यह आंदोलन जमीनी स्तर पर कितना असर डालता है और क्या यह आने वाले चुनावों में राजनीतिक समीकरण बदलने की क्षमता रखता है। फिलहाल इतना तय है कि किसान और व्यापार नीति का सवाल आने वाले दिनों में देश की राजनीति के केंद्र में रहने वाला है।

