मुझे नहीं पता मैं सही हूँ या गलत? – the untold truth..
कभी-कभी ज़िंदगी के कुछ मोड़ों पर हम खुद से ही सवाल करने लगते हैं —
“क्या मैं सही हूँ या गलत?”
यह सवाल बाहर की दुनिया से ज्यादा हमारे अंदर की आवाज़ से जुड़ा होता है। जब रिश्तों में गलतफहमियाँ बढ़ती हैं, जब फैसले भारी पड़ने लगते हैं, जब लोग हमें समझ नहीं पाते — तब यह सवाल और भी गहरा हो जाता है।
यह लेख उन्हीं भावनाओं की कहानी है।
जब मन खुद के खिलाफ खड़ा हो जाता है
सबसे कठिन लड़ाई बाहर की नहीं, अंदर की होती है।
हम अपने ही विचारों के कटघरे में खड़े हो जाते हैं।
हम अपने ही फैसलों पर शक करने लगते हैं।
- क्या मैंने ज़्यादा बोल दिया?
- क्या मुझे चुप रहना चाहिए था?
- क्या मेरी सोच गलत है?
- या फिर मैं ही गलत इंसान हूँ?
धीरे-धीरे यह सवाल हमारे आत्मविश्वास को खा जाता है। हम दूसरों की नजरों से खुद को देखने लगते हैं, और खुद की नजरें धुंधली हो जाती हैं।

सही और गलत का सच
सच यह है कि “सही” और “गलत” हमेशा काले-सफेद नहीं होते।
अक्सर वे परिस्थितियों, अनुभवों और भावनाओं के रंगों से बने होते हैं।
जो बात आपको सही लगती है, वह किसी और को गलत लग सकती है।
जो फैसला आपने अपनी समझ और नीयत से लिया, वह परिणाम में गलत साबित हो सकता है — लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि आप गलत इंसान हैं।
इंसान की नीयत और इरादा उसे परिभाषित करते हैं, हर परिणाम नहीं।
जब लोग समझ नहीं पाते
कभी-कभी हम सही होते हैं, लेकिन लोग हमें गलत ठहरा देते हैं।
कभी हम गलत भी होते हैं, लेकिन हमारा इरादा बुरा नहीं होता।
दर्द तब होता है जब:
- आपकी चुप्पी को कमजोरी समझ लिया जाए
- आपकी सच्चाई को जिद कहा जाए
- आपकी भावनाओं को नाटक कहा जाए
ऐसे में मन टूटता है, और वही सवाल फिर उठता है —
“क्या मैं सच में गलत हूँ?”
खुद को खो देना सबसे बड़ी गलती है
दुनिया को खुश करने की कोशिश में हम खुद को खोने लगते हैं।
हम अपने विचार बदलते हैं, अपने सपने बदलते हैं, अपनी आवाज़ दबाते हैं — सिर्फ इसलिए कि कोई हमें गलत न कहे।
लेकिन याद रखिए:
- अगर आप हर बार खुद को बदलते रहेंगे,
- अगर आप हर बार अपनी भावनाओं को दबाते रहेंगे,
तो एक दिन आप खुद से दूर हो जाएंगे।
और खुद से दूर होना, किसी भी “गलत” फैसले से ज्यादा खतरनाक है।
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गलती करना इंसान होने की पहचान है
गलतियाँ करना कमजोरी नहीं है।
गलतियों से सीखना ताकत है।
अगर आपने कुछ गलत किया है, तो उसे स्वीकार करना ही सबसे बड़ी बहादुरी है।
और अगर आप सही हैं, तो अपने सच पर टिके रहना भी उतना ही जरूरी है।
हर गिरना हार नहीं होता।
कभी-कभी गिरना हमें बेहतर इंसान बनाता है।
अपने आप से ये सवाल पूछिए
जब मन उलझ जाए, तो खुद से ईमानदारी से पूछिए:
- क्या मेरा इरादा साफ था?
- क्या मैंने किसी को जानबूझकर चोट पहुँचाई?
- क्या मैं सीखने और सुधारने के लिए तैयार हूँ?
अगर जवाब “हाँ” में है — तो आप गलत नहीं हैं, आप बस इंसान हैं।
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खुद को माफ करना सीखिए
हम दूसरों को तो माफ कर देते हैं, लेकिन खुद को माफ करना भूल जाते हैं।
अपने आप से नाराज़ रहना आत्मा को थका देता है।
अपने दिल से कहिए:
- “मैं पूर्ण नहीं हूँ, लेकिन मैं सच्चा हूँ।
- मैं हर दिन सीख रहा हूँ।
- और मैं खुद को स्वीकार करता हूँ।”
निष्कर्ष: आप सही हैं या गलत?
शायद इसका कोई एक जवाब नहीं है।
क्योंकि जीवन कोई गणित का सवाल नहीं, बल्कि अनुभवों की यात्रा है।
आप कभी सही होंगे, कभी गलत।
लेकिन अगर आपकी नीयत साफ है, दिल सच्चा है और आप सीखने को तैयार हैं —
तो आप गलत नहीं, बस इंसान हैं।
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