यह विषय भावनात्मक भी है और सामाजिक भी, इसलिए इसे गुस्से या सनसनी के बजाय समझदारी और संतुलन के साथ देखना ज़रूरी है। नीचे इसी दृष्टिकोण से यह लेख प्रस्तुत किया है।
फेमस होने के लिए कैमरे के सामने शरीर को खोल देना: यह कैसी मानसिकता है?, पार्ट – 2
आज का दौर डिजिटल क्रांति का दौर है। सोशल मीडिया, रील्स, शॉर्ट वीडियो और ओटीटी प्लेटफॉर्म्स ने हर व्यक्ति को मंच दिया है। लेकिन इसी के साथ एक सवाल भी लगातार उठ रहा है—
क्या प्रसिद्धि पाने के लिए शरीर को दिखाना ज़रूरी हो गया है?
और अगर हाँ, तो इसके पीछे कौन-सी मानसिकता काम कर रही है?

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प्रसिद्धि की भूख और तुरंत पहचान की चाह
आज “फेमस” होना कई लोगों के लिए सफलता का पैमाना बन गया है।
जहाँ पहले पहचान पाने में सालों की मेहनत, कला और संघर्ष लगता था, वहीं आज कुछ सेकंड की वीडियो से लाखों व्यूज़ मिल सकते हैं।
- लाइक्स = आत्म-मूल्य
- फॉलोअर्स = सफलता
- वायरल होना = जीत
इस त्वरित पहचान की भूख में कुछ लोग आसान रास्ता चुनते हैं—शरीर को वस्तु की तरह प्रस्तुत करना।
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सोशल मीडिया का एल्गोरिदम और बाज़ार की सच्चाई
यह केवल व्यक्ति की मानसिकता नहीं, बल्कि सिस्टम की भी सच्चाई है।
- एल्गोरिदम वही कंटेंट आगे बढ़ाता है जो ज्यादा देखा जाए
- यौनिकता (Sexualization) ध्यान जल्दी खींचती है
- ब्रांड्स व्यूज़ देखते हैं, मूल्य नहीं
नतीजा यह होता है कि धीरे-धीरे यह संदेश जाता है कि
“अगर दिखाओगे, तभी बिकोगे।”
यह भी पढ़े: फेमस होने के लिए शरीर को कैमरे के सामने खोल देना, यह कैसी मानसिकता है? पार्ट – 1 !
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आत्म-सम्मान बनाम बाहरी मान्यता
कई बार यह व्यवहार आत्म-विश्वास का नहीं, बल्कि आत्म-असुरक्षा का संकेत होता है।
- “मुझे तभी देखा जाएगा जब मैं खुद को खोलूँ”
- “मेरी सोच, मेरी कला शायद काफी नहीं है”
जब व्यक्ति खुद को भीतर से मूल्यवान नहीं समझ पाता, तो वह बाहरी स्वीकृति पाने के लिए अपने शरीर को माध्यम बना लेता है।
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महिला और पुरुष: दोहरा मापदंड
इस मुद्दे पर समाज का पाखंड भी साफ दिखता है।
- एक तरफ शरीर दिखाने वाला कंटेंट खूब देखा जाता है
- दूसरी तरफ उसी व्यक्ति को “चरित्रहीन” कहा जाता है
खासतौर पर महिलाओं के मामले में यह दोहरा मापदंड और भी कठोर है।
समाज खुद उपभोग करता है और फिर नैतिकता का झंडा उठा लेता है।
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क्या यह पूरी तरह गलत है?
यह सवाल ज़रूरी है।
- अगर कोई व्यक्ति स्वेच्छा, समझदारी और सीमाओं के साथ अपने शरीर को अभिव्यक्ति का माध्यम बनाता है, तो वह उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता है
- लेकिन अगर यह मजबूरी, दबाव, या मान्यता की भूख से हो, तो यह चिंता का विषय है
समस्या शरीर से नहीं,
शरीर को एकमात्र पहचान बना देने से है।
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समाज पर इसका असर
इस प्रवृत्ति का असर सिर्फ कंटेंट क्रिएटर पर नहीं, बल्कि पूरी पीढ़ी पर पड़ता है।
- किशोरों में गलत आदर्श
- रिश्तों में सतही सोच
- आत्म-सम्मान का बाहरी चीज़ों पर निर्भर होना
धीरे-धीरे इंसान की पहचान उसके विचारों से नहीं, उसकी “पैकेजिंग” से होने लगती है।
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समाधान क्या है?
- डिजिटल साक्षरता (Digital Literacy)
- आत्म-मूल्य की शिक्षा
- कंटेंट की गुणवत्ता को बढ़ावा
- दर्शकों की भी जिम्मेदारी—हम क्या देख रहे हैं और क्यों?
जब तक देखने वाला सिर्फ शरीर देखता रहेगा, दिखाने वाला भी वही दिखाएगा।
निष्कर्ष
फेमस होने के लिए कैमरे के सामने शरीर खोल देना सिर्फ एक व्यक्ति की मानसिकता नहीं, बल्कि हमारे समय की सामूहिक सोच का प्रतिबिंब है।
- यह सवाल हमें दूसरों से कम और खुद से ज्यादा पूछना चाहिए
- क्या हम इंसान को उसके शरीर से आंक रहे हैं या उसके विचारों से?
- जब समाज सोच बदलेगा, तो प्रसिद्धि के रास्ते भी बदलेंगे।
Note :-
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